लोगों की मौत पर कौन लगाए मुहर?

  • 19 जुलाई 2013
उत्तराखंड बाढ़ पीड़ित रजनीश अवस्थी का परिवार

तेज़ बारिश के बीच हमारी गाड़ी मयाली की दुर्गम घाटी से होती हुई गुप्तकाशी की तरफ़ बढ़ रही थी. जगह जगह भूस्खलन की वजह से कई घंटों का ये लम्बा सफ़र ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था.

जगह जगह जाम और सड़क की मरम्मत के काम के बीच आख़िरकार गुप्तकाशी अब ज्यादा दूर नहीं था.

रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी का पुराना रास्ता पूरी तरह से ध्वस्त है और अब यहाँ पहुँचने के लिए लम्बा रास्ता तय करना पड़ रहा है जो बेहद दुर्गम और जोखिम भरा है.

जल प्रलय की कहानी

इसी बीच राज्य सरकार द्वारा लापता लोगों की मौत का दिन एक बार फिर मुक़र्रर कर दिया गया. वो दिन आया भी और बीत भी गया यानी जो लोग 17 जून को केदारनाथ सहित उत्तराखंड के कई धामों पर प्रलयकारी बारिश और भूस्खलन के बाद से लापता हो गए हैं, उन्हें 15 जुलाई के बाद मरा हुआ मान भी लिया गया.

उत्तराखंड की सरकार की घोषणा के बावजूद राज्य के उखीमठ ब्लाक में कई गाँव ऐसे हैं जहाँ आज भी लोगों को इंतज़ार है अपने लापता परिजनों का.

उन्हें उम्मीद है कि हो सकता है कि प्रलयंकारी बारिश के बाद नदी में बह कर वो कहीं दूर चले गए हों. उन्हें यह भी लगता है कि उनके लापता अपने, एक दिन ज़रूर वापस लौटकर आ जायेंगे.

लामगोंडी में मातम

17 जून को केदारनाथ में मची तबाही के बाद अकेले ऊखीमठ प्रखंड में बसे कई गावों से सैकड़ों लोगों के ग़ायब होने की बात सामने आई है जो केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुंड जैसे तीर्थ स्थलों पर या तो पुरोहित का काम किया करते थे या दुकान चलाया करते थे या फिर तीर्थ यात्रियों को खच्चर पर ले जाने का काम करते थे.

लोगों के साथ साथ इस इलाक़े से कई जानवर भी लापता हैं. हालांकि घटना के एक महीने के बाद भी आज तक इन लापता लोगों का कोई सुराग नहीं मिल पाया है.

गुप्तकाशी से सात किलोमीटर दूर है लामगोंडी गाँव जहाँ मातम छाया हुआ है. सिर्फ इसी गाँव से 25 से ज्यादा लोग केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुंड से लापता हैं. यहाँ छाये मातम का दौर काफी लम्बा खिंच गया है.

लामगोंडी से ऊपर बसा है भनिग्राम जहाँ और भी बड़ी त्रासदी से लोग खुद को दो चार कर रहे हैं. यहाँ के रहने वाले लगभग 45 लोग केदारनाथ में हुई प्रलयकारी बारिश और बाढ़ के बाद से घर वापस नहीं लौटे हैं. इनके घरों में आज भी इनका इंतज़ार हो रहा है

लामगोंडी के अशोक अवस्थी गौरीकुंड में पुरोहित का काम करते थे. वो 17 जून से लापता हैं. अशोक के घरवालों के मन में है कि शायद वो किसी रोज़ लौट आएं.

विनाश का असर

उनके बेटे सर्वेश का कहना है कि उनके आस पड़ोस के कुछ लोगों की लाशें केदारनाथ और गौरीकुंड में मिलीं. मगर उनके गाँव के कई लोगों का कोई सुराग़ नहीं मिल पा रहा है. इन लोगों में सर्वेश के पिता भी शामिल है.

वो कहते हैं, "मुझे पता है कि अब उनका वापस लौटना मुश्किल है. मगर अपनी माँ को कैसे समझाउँ. उन्हें लगता है कि पापा ज़रूर वापस आयेंगे. हम बड़े मुश्किल समय से गुज़र रहे हैं. ये बड़ा कठिन इम्तेहान है."

अशोक अवस्थी की पत्नी नें अपने माथे से सिन्दूर नहीं मिटाया है क्योंकि अभी तक ये नहीं कहाँ जा सकता है कि उनके पति की मौत हुई है. वह कहती हैं, "मेरा दिल बोल रहा है वो ज़रूर वापस आयेंगे."

ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ भनिग्राम और लामगोंडी के रहने वाले अब तक 80 से ज्यादा लोग लापता हैं जबकि उखीमठ प्रखंड से लापता होने वाले स्थानीय ग्रामीणों की संख्या चार सौ से ऊपर है.

यहाँ रहने वाले लोगों का कहना है कि केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरी कुंड में हुए विनाश का असर रोज़गार पर भी पड़ा है क्योंकि इन स्थानों पर उखीमठ प्रखंड के रहने वालों की दुकानें भी थीं जिनका अब नाम ओ निशां मिट चुका है.

तेज़ बारिश के बीच हम भनिग्राम पहुंचे तो यहाँ के रहने वाले एक अन्य ग्रामीण का कहना है कि केदारनाथ में रात के वक़्त जो नदी में बहाव आया उससे ज्यादा नुक़सान नहीं हुआ. अलबत्ता सुबह सुबह जब नदी उफ़ान पर आई तो सब कुछ तबाह हो गया.

खौफनाक मंज़र

भनिग्राम के रहने वाले 15 साल के रजनीश को वो मंज़र भुलाए नहीं भूलता जब नदी के तेज़ बहाव नें उन्हें अपने पिता से अलग कर दिया. रजनीश की किस्मत अच्छी थी कि वो किसी तरह बच गए.

रजनीश नें कहा, "हम दोनों साथ थे तभी अचानक पानी और मलबा आ गया. मैं और पापा दोनों ही उसमें बह गए. कुछ दूर तक बहने के बाद मेरे हाथ में रेलिंग आ गई. मैंने उसे पकड़ लिया और ऊपर की तरफ़ चढ़ गया. मगर पापा कहीं नज़र नहीं आए."

रजनीश के पिता का आज भी कोई अता पता नहीं. उनके घर के लोग तबाही के बाद दोबारा केदारनाथ जाकर उनका पता लगाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं. वो कहते हैं कि वहां के खौफनाक मंज़र के बाद अब कई महीनों तक उनकी वहां जाने की हिम्मत नहीं होगी.

उत्तराखंड के उखीमठ, केदारनाथ, गौरीकुंड, रामबाड़ा और गुप्तकाशी के लोगों के लिए बहुत मुश्किल वाले दिन चल रहे हैं. सरकार नें लापता हुए लोगों को मरा हुआ मान लिया है. मगर सवाल उठता है कि लापता लोगों की मौत पर मुहर आख़िर लगाए तो लगाए कौन ?

भनिग्राम, लामगोंडी और उसके आस पास के इलाकों में आज उमीदें भी उफनती हुई नदी में बहती नज़र आ रहीं हैं. आज इस इलाके में जो नाउम्मीदगी का साया पसरा हुआ है, उससे उबरने में इस इलाक़े को अब कई साल लग जाएंगे.

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