बिहार: खस्सी बकरी जैसा फेंक बच्चों को लादा

  • 20 जुलाई 2013
बिहार मिडडे मील त्रासदी से प्रभावित परिवार

छपरा मिड डे मील त्रासदी में मारे गए बच्चों के परिवार वालों की अपनी-अपनी तकलीफ़ें हैं.

ऐसे ही एक परिवार के बुज़ुर्ग ने बीबीसी को बताया, "हमारे घर में नौ बच्चे थे. आठ बच्चा है और एक महिला जो थोड़ी सयानी है. सबने वहाँ पर खाया था."

लापरवाही से हुई मौत

इस परिवार का भी एक बच्चा मिड डे मील त्रासदी की भेंट चढ़ गया.

उस बच्चे के पिता हरेंद्र कहते हैं, "सुविधा के नाम पर जो वहाँ पर है, वह तो सही है लेकिन बच्चा लोग बोलत बतियात मर जात हैं. डॉक्टर लोग कहते हैं कि भगवान पर भरोसा रखे."

हरेंद्र के पिता रमेश कुमार ने बताया, "ये पता लगा कि बच्चा लोग खिचड़ी खाकर गिरने लगे. खाते-खाते पाँच मिनट के अंदर ही कुछ बच्चे स्कूल में गिर गए. कुछ भागे तो रास्ते में गिरे. जो एकाध गांव पहुँचें हैं तो घर पर गिरे हैं."

सरकारी हॉस्पीटल

Image caption हरेंद्र कहते हैं कि अब सब कुछ भगवान की मर्जी पर ही है.

छपरा और शहर से दूर स्थित मशरख़ ब्लॉक के जजौली पंचायत में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी लोगों की कई शिकायतें हैं कि आपातकालीन परिस्थितियों में हालात किस क़दर बिगड़ सकते हैं.

सरकारी रूखेपन की बात भी इन सब के बीच उभर कर सामने आती है.

मिड डे मील और 22 सवाल

रमेश कुमार कहते हैं, "यहाँ पर कोई नहीं आया है. यहाँ पर जब बच्चा सब गिरना शुरू हुआ, जब हल्ला हुआ तो दूसरे स्कूल की गाड़ी आई. ड्राइवर को बोला कि जो भाड़ा लोगे, ई बच्चा सब को ले चलो हॉस्पीटल. कोई आया नहीं आया, उसी पर खस्सी बकरी जैसा के फेंक-फांक कर बच्चों को लाद लिया गया."

हड़बड़ी और अफ़रा-तफ़री का यह आलम था कि उस गाड़ी पर चढ़ने के दौरान कुछ बच्चे छूट गए और कुछ ही बच्चे मशरख़ पहुँच पाए.

वो कहते हैं, "सरकारी हॉस्पीटल में गए लेकिन वहाँ तो कुछ है नहीं. एक ठो डॉक्टर है. ऊ मुश्किल से कुछ एक बच्चे को रखा और बाद मे बाक़ी को हटा दिया. उसके बाद एक प्राइवेट हॉस्पीटल में गया. सरकारी अस्पताल में दवा-उवा तो था नहीं. डेढ़-दो घंटा रखने के बाद छपरा रेफर कर दिया. पांडेय जी के यहाँ भी तीन-चार घंटों में रखकर रेफर कर दिया."

लेकिन छपरा जाकर भी बात नहीं बन पाई और उधर समय तेज़ी से फिसल रहा था. छपरा में ठीक 11 बजे रात में जब बच्चों को सँभालना मुश्किल हो गया तो उन्हें पटना रेफर कर दिया गया.

'सीरियस हालत'

Image caption हरेंद्र के पिता जी ने बताया कि बच्चों को किसी किस्म की कोई बीमारी नहीं थी.

रमेश कुमार ने बताया कि पटना में जो लोग भर्ती हुए हैं, उनमें कुछ तो गुज़र गए कुछ अभी अस्पताल में ही है.

"हमारे घर के भी आठ बच्चे वहाँ गए थे जिनमें एक गुज़र गया. उनमें से सभी की उम्र 10 साल से कम थी. कोई चार बरस का था, कोई पाँच साल का, कोई छह बरस का, कोई सात बरस का."

छपराः मातम और ग़ुस्सा

बच्चों की मौत कथित तौर पर ज़हरीले भोजन की वजह से होने के सवाल पर हरेंद्र के पिता ने बताया, "उसमें तेल का दोष या किसी और चीज का दोष है, यह हम लोग कैसे कह सकते हैं. किस चीज का दोष है. खिचड़ी खाते ही बच्चा गिर गया. हमने तो बस इतना ही देखा है. क्या जाने वहाँ पर क्या बना थे."

हरेंद्र के परिवार के बच्चे तक़रीबन डेढ़ दो साल से स्कूल जा रहे थे और घटना के पहले तक वे स्वस्थ थे. उनका परिवार ज़ोर देकर कहता है कि बच्चों को किसी क़िस्म की कोई बीमारी नहीं थी.

लेकिन अब हालात चिंताजनक हैं. हरेंद्र के पिता कहते हैं, "बच्चों की हालत सीरियस हैं. इमरजेंसी है. अभी पटना में वह सीरियस पोजिशन में हैं. भगवान उन्हें कब उगल देगा? हम लोग क्या कह सकते हैं. ऊ तो भगवान ही तय करेगा."

16 जुलाई को बिहार के छपरा ज़िले के मशरख़ ब्लॉक में कथित रूप से विषाक्त भोजन खाने से अब तक 23 स्कूली बच्चों की मौत हो गई है. कई बच्चे अभी भी बीमार हैं जिनका पटना के पीएमसीएच अस्पताल में इलाज चल रहा है.

प्रमंडलीय आयुक्त और छपरा के पुलिस उप महानिरीक्षक (डीआईजी) इस मामले की जांच कर रहे हैं.

मुख्यमंत्री ने मारे गए बच्चों के परिजनों को दो-दो लाख मुआवज़ा देने की घोषणा की है.

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