नरेंद्र मोदी को अमरीकी वीज़ा की क्या ज़रूरत?

  • 23 जुलाई 2013
नितिन गडकरी, नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह

राजनाथ सिंह ने अपनी अमरीका यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी को अमरीकी वीज़ा देने की माँग उठाकर पुराने ज़ख़्म पर लगी पपड़ी खुरच दी है.

अमरीका को जो करना है, उसके लिए वह अपने नफ़े-नुक़सान की पड़ताल करेगा लेकिन इससे जुड़ा बड़ा सवाल अमरीकी वीज़ा की अहमियत-असलियत से जुड़ा है.

आख़िर मोदी को इस तमग़े की ज़रूरत क्यों है? अपने चमत्कारी टेक्नोलॉजी वाले थ्री डी अवतार में देश भर में अपने भक्तों को संबोधित कर चुके मोदी 'इच्छाधारी' मुद्रा में अमेरिका में प्रवासी भारतीयों से आत्मीय रिश्ता बरक़रार रख सकते हैं.

अमरीकी कांग्रेस और मीडिया को प्रभावित करने के लिए कुशल लॉबीइस्ट उन्हें सुलभ हैं. अगर देर-सबेर वीज़ा मिल भी जाए तो क्या इससे वह अपने देशवासियों-ख़ासकर अल्पसंख्यक मुसलमानों की नज़र में निर्दोष साबित हो जाएँगे?

धर्मनिरपेक्ष छवि

जहाँ तक विदेशी निवेशकों का सवाल है एकाधिक बार वह ये नुमाइश कर चुके हैं कि यूरोपीय राजदूत और व्यापार संगठनों के चहेते वह हैं.

गुजरात की छवि अनेक धर्मनिरपेक्ष दावेदारी वाले मुख्यमंत्रियों द्वारा शासित प्रदेशों से बेहतर है.

अमर्त्य सेन ने अपना मत मोदी के विरोध में डाल दिया है लेकिन दशकों तक जन्मभूमि से दूर रहे नोबेल पुरस्कार विजेता का ज़बरदस्त असर वंचित-निरक्षर जनसमुदाय में है, ये सोचना नादानी ही है.

हाँ, यह हो सकता है कि इस बहाने भाजपा अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री पद पर मोदी की दावेदारी को रेखांकित कर कांग्रेस और प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष तबके को प्रतिक्रिया के लिए उकसा रहे हों.

वीज़ा की महिमा

असलियत यह है 'हरि अनंत-हरिकथा अनंता' की ही तरह अमरीकी वीज़ा के भी सहस्र रूप हैं, छात्रों को दिया जाने वाला आई-20, पेशेवरों के लिए एच-1 ए और बी, मल्टिपल एंट्री वगैरह. किसी को 'ग्रीन कार्ड' मिलने में बरसों लग जाते हैं, तो किसी के भाग लॉटरी का छींका टूट पड़ता है. एक्सैपशनल एलियन वाली श्रेणी अलग है, वीज़ा तो छोड़िए नागरिकता हासिल कर लेने के बाद भी काले और ग़ैर ईसाई दोयम-सोयम ही रहते हैं.

यह लॉलीपॉप या सामरिक घूस उनके लिए है जो अमरीका के काम के होते हैं. बच्चों की पढ़ाई हो या पुरखों का इलाज या बदनाम सीबीआई/आईबी के जांच के शिकंजे में फँसे अधिकारी को शरण देना- अमरीकी वीज़ा नीति के दोहरे-तिहरे मापदंड किसी से छिपे नहीं हैं.

हम मोदी के बचाव पक्ष का वकील होने को आतुर नहीं हैं लेकिन जिस देश में दहशतगर्द, हिंसा को अंजाम देने के आभियुक्त, अभियुक्त-दंडित अपराधी आख़िर अपील रिव्यू तक ख़ारिज होने के बाद भी क्यूरेटिव पेटिशन का तिनका तलाश कर भंवर में डूबने से बचने की कोशिश करते हैं (संजू बाबा सरीखे) और उसके बाद भी जनता की अदालत में चाहने वालों की नज़र में निरपराध माने जाते हैं, उसमें अकेले नरेंद्र मोदी को ही अपराधी-दोषी-सांप्रदायिक राक्षस करार देना न्यायसंगत नहीं लगता है.

'कांग्रेस का कलंक'

जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है, 1984 का कलंक धोने में वह अभी तक असमर्थ रही है. जनसंहार 10 साल पुराना हो या 25 साल- पाप और अपराध का बोझ समान ही रहता है.

विडंबना यह है कि आज का हिंदुस्तान इतना अमरीकापरस्त है कि उसे इस वीज़ा से ज़्यादा क़ीमती कुछ लगता ही नहीं है. हमारे पूर्व राष्ट्रपति ख़ुशी-ख़ुशी जामा तलाशी करवा लेते हैं, रक्षा मंत्री लौटकर नाराजग़ी प्रकट करते हैं, एक से ज़्यादा राजदूत राजनयिक शिष्टाचार की धज्जियाँ उड़ाए जाने के बाद भी अपनी मानहानि को मुस्कुराते हुए बर्दाश्त करते रहे हैं.

जब तक जनतांत्रिक गणराज्य के प्रथम परिवार को शाही सम्मान मिलता रहता है तब तक बाकी को वीज़ा मिले या नहीं- की फर्क पेंदा है?

मानवाधिकारों का ज़िक्र इस संदर्भ में करना बेकार है, यदि मोदी इसके अपराधी हैं तो अमरीकी प्रशासन में जाने कितने खिलखिलाते ख़ुशमिज़ाज चेहरे इसी आचरण के दोषी हैं.

अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, लीबिया, सीरिया और स्वदेश में जाने कितने बर्बर उल्लंघन उसके खाते में दर्ज हैं. अच्छे और बुरे तालिबान का फ़र्क़ बतलाकर अपना उल्लू साधने में माहिर अमरीका मोदी को वीज़ा न देकर ‘सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’ की ही याद दिलाता रह सकता है.

यदि अमरीकी वीज़ा का मिलना या न मिलना ही भारत में सांप्रदायिक सदभाव और जनतंत्र की बुनियाद पुख़्ता कर सकता है, तब यह हम सबके लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने की बात है.

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