पश्चिम बंगाल और 'हिंसा की संस्कृति'

पश्चिम बंगाल
Image caption पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के चौथे चरण में भी हिंसा जारी रही.

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा की लगातार आ रही ख़बरों से राज्य में हिंसा की संस्कृति के नए आयाम सामने आ रहे हैं.

पश्चिम बंगाल के पूर्वोत्तर इलाकों में पंचायत चुनाव के चौथे चरण में सोमवार को भी हिंसा जारी रही. चौथे चरण में हिंसा की अलग अलग घटनाओं में सात लोगों की मौत हुई है और कई घायल हुए हैं.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग के बीच महीनों लंबी चली कानूनी लड़ाई के बाद 11 जुलाई को पांच चरणों में चुनाव की शुरुआत हुई.

चुनावी विश्लेषक और राजनीतिक समालोचक बिश्वनाथ चक्रवर्ती के शब्दों में, “हिंसा का चलन पिछले चार दशकों से बंगाल की राजनीति का प्रमुख हिस्सा रही है. राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव जीतने के लिए बल और आंतक का इस्तेमाल नियमित रुप से किया जाता रहा है.”

राजनीतिक हिंसा

आज तृणूमल कांग्रेस भी चुनाव में राजनीतिक हिंसा इस्तेमाल करने के आरोपों से घिरी हुई है.

विपक्षी सीपीएम ने ममता बनर्जी के तृणूमल पर ‘चुनाव जीतने’ के लिए हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है.

सीपीआई(एम) नेता बिमान बोस ने कहा, “तृणमूल समर्थकों ने जबरन बूथ पर कब्जा किया और बड़े पैमाने पर मतदाताओं को वोट डालने नहीं दिया. उनकी जगह अपनी मर्जी के वोट डाले गए.”

पंचायत की 6000 (कुल 58000) से ज्यादा की सीटों पर तृणमूल ने बिना लड़े ही जीत हासिल कर ली है. इसका कारण है कि साल 2011 तक बंगाल पर शासन करने वाली विपक्षी सीपीएम ने यहां अपने एक उम्मीदवार भी खड़े नहीं किए.

तत्कालीन सत्तारूढ़ वाम मोर्चे के अध्यक्ष बिमान बोस ने यहां स्वतंत्र उम्मीदवार खड़ा करने की बात कही थी क्योंकि उनके अनुसार कम्युनिस्ट टिकट पर चुनाव लड़ना काफी जोखिम भरा साबित हुआ है.

सीपीएम की सत्ता

जब सीपीएम सत्ता में थी तब उस पर भी राजनीतिक हिंसा के आरोप लगे थे.

चुनाव जीतने के लिए आतंक और हिंसा का इस्तेमाल करने के मिलते जुलते आरोप कभी विपक्षी दलों ने सीपीएम के खिलाफ भी लगाए थे. तब पश्चिम बंगाल में सीपीएम की तीन दशक (1977-2011) पुरानी सरकार थी.

स्थानीय बंगाली टेलीविजन चैनलों पर चुनाव केंद्रों के आस पास या गांव के भीतर की जो रिपोर्ट दिखाई जा रही है उसमें सशस्त्र बंदूकधारी मौजूद हैं.

तृणमूल कांग्रेस के बीरभूम जिला इकाई के प्रमुख अनुब्रत मोंडल का बंगाली समाचार पत्र में बयान छपा है जिसमे वे अपने समर्थकों से सभी विपक्षी प्रतिद्वन्द्वी को कुचल देने की बात कह रहे है.

सत्तारूढ़ दल के परिवहन मंत्री और उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने मोंडल का बचाव करते हुए कहा है कि वे तृणमूल कांग्रेस के सच्चे सिपाही हैं.

गला काटने की धमकी

Image caption ममता बनर्जी ने राज्य चुनाव आयोग पर हिंसा को रोकने में नाकाम होने का आरोप लगाया है.

पश्चिम बंगाल के लाभपुर इलाके में एक तृणमूल विधायक ने कांग्रेसी नेता को जान से मारने की धमकी दे डाली. धमकी देने वाले विधायक का नाम मनिरूल इस्लाम है. इन्होंने बीरभूम जिला कांग्रेस के अध्यक्ष का खुलेआम सिर काट देने की धमकी दी है.

इस तरह की हिंसा की आशंका के मद्देनजर राज्य चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से अपील करते हुए पंचायत चुनाव के दौरान केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बलों की ज़रूरत जताई थी. आयोग का मानना था कि बलों की पर्याप्त उपस्थिति के बगैर चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रह पाएगा.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की इस आशंका को निराधार बताया था. यही नहीं, ममता बनर्जी के समर्थकों ने चुनाव आयोग आयुक्त मीरा पांडे को “कॉमरेड” (कम्यूनिस्ट समर्थक) बताते हुए चुनाव प्रक्रिया में अड़ंगा लगाने का आरोप लगाया था.

पंचायत चुनाव के चौथे चरण का मतदान चार जिलों- मुर्शिदाबाद, बीरभूम, मालदा और नाडिया में हो रहा है. इन जिलों को हिंसा के इतिहास के कारण ‘संवेदनशील’ इलाका घोषित किया गया था.

विवादास्पद बयान

पुलिस के अनुसार मुर्शीदाबाद में तीन और मालदा में एक व्यक्ति की मौत हुई है और बीरभूम जिले से विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टी के तीन समर्थकों के शव मिले हैं.

अधिकारियों के अनुसार मालदा में 55 साल के एक मतदाता की मौत तब हुई जब सीआरपीएफ की ओर से तनाव बढ़ने के दौरान बूथ में फायरिंग की गई. इस फायरिंग के दौरान सीआरपीएफ के चार जवान भी घायल हुए हैं.

पुलिस के अनुसार मुर्शीदाबाद जिले में बम तैयार करते समय दो लोगों की मौत हुई जबकि एक महिला की मौत उसपर बम फेंके जाने के कारण हुई.

हिंसा की इन वारदातों के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नया विवादास्पद बयान आया है. उन्होंने राज्य चुनाव आयोग पर हिंसा को रोकने में नाकाम होने का आरोप लगाया है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कलकत्ता में पत्रकारों से कहा, “पर्याप्त मात्रा में बलों की मौजूदगी के बावजूद, वे हिंसा पर नियंत्रण रखने में नाकाम क्यों रहे?”

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