पश्चिम बंगालः पंचायत चुनावों में ममता की जीत के मायने

  • 30 जुलाई 2013
ममता बनर्जी
Image caption ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को भारी जीत मिली है.

पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को पंचायत चुनावों में भारी जीत मिली है. जुलाई माह में पाँच चरणों में हुए पंचायत चुनाव सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग, मतदान में धोखाधड़ी और वोटरों को डराने-धमकाने के आरोपों के कारण विवादित भी रहे.

जीत के बाद अब राज्य की 17 में से 13 जिला पंचायतों और इनके अधीन आने वाली ग्राम पंचायतों का प्रशासन तृणमूल कांग्रेस के हाथ में होगा.

पंचायत चुनावों में इस जीत के साथ ही पश्चिम बंगाल का पूर्ण नियंत्रण ममता बनर्जी के हाथ में आ गया है. विधानसभा में उनके पास पहले से ही पूर्ण बहुमत था. अब ग्राम पंचायत और जिला पंचायतें भी तृणमूल कांग्रेस के पास हैं. जमीनी स्तर पर तमाम विकास कार्य पंचायत व्यवस्था के तहत ही होते हैं.

इस बार पंचायत चुनावों में तीन दशकों से अधिक समय तक पश्चिम बंगाल पर राज करने वाले लेफ्ट फ्रंट की बुरी तरह हार हुई है. अब लेफ्ट के पास संभवतः तीन जिलों का ही नियंत्रण होगा. केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को रेल राज्यमंत्री अधीर रंजन चौधरी की मजबूत पकड़ वाले मुर्शिदाबाद जिले में ही जीत मिली है.

(ये भी पढ़ सकते हैं: पश्चिम बंगाल और 'हिंसा की संस्कृति')

संपूर्ण नियंत्रण

हाल ही में रिलीज हुई किताब 'पैसिव रेवोल्यूशन इन वेस्ट बंगाल' के लेखक और कलकत्ता रिसर्च ग्रुप के निदेशक रणबीर समददार ममता के बारे में कहते हैं, "ममता संपूर्ण नियंत्रण चाहती थीं. अपनी पार्टी में, विधानसभा में और जमीनी स्तर पर पंचायतों में भी. और अब उनके पास संपूर्ण नियंत्रण है."

Image caption पंचायत चुनावों में जीत के साथ पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों पर भी तृणमूल का राज हो गया है.

अन्य क्षेत्रीय नेताओं की तरह ममता बनर्जी भी 2014 के लोकसभा चुनावों में किंगमेकर बनना चाहती हैं. लोकसभा चुनावों से पहले के तमाम जनमत सर्वेक्षण भी खंडित जनादेश का संकेत दे रहे हैं.

समददार कहते हैं, "बंगाल की ग्राम सभाओं पर नियंत्रण ममता को आगामी लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल की 42 में से 25 से 30 तक सीटें जीतने में मदद कर सकता है. यदि ऐसा हुआ तो राष्ट्रीय स्तर पर उनका महत्व बढ़ जाएगा."

ममता बनर्जी जब से कांग्रेस से अलग हुई हैं तब से वे अपनी इस सहयोगी पार्टी की कठोरतम शब्दों में निंदा करती रही हैं. पंचायत चुनावों के दौरान कांग्रेस के नेताओं ने भी लेफ्ट के नेताओं के सुर में सुर मिलाते हुए ममता बनर्जी की कड़ी आलोचना की. उन्होंने ममता पर गुंडागर्दी के आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस के कार्यकर्ता भी लेफ्ट के कार्यकर्ताओं की तरह ही सत्ताधारी पार्टी की गुंडागर्दी का शिकार हो रहे हैं.

दूसरी ओर बीजेपी ने भविष्य में गठबंधन की संभावनाएँ देखते हुए हावड़ा टाउन में हुए विधानसभा उपचुनाव में अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया और तृणमूल को आसानी से जीत जाने दिया.

अलग गोरखालैंड की मांग, तीन दिन का बंद

एनडीए से गठबंधन?

विश्लेषक सबयासाची बसु रॉय चौधरी कहते हैं, "एनडीए से बिहार के मुख्यंत्री नीतीश कुमार के अलग होने के बाद अब बीजेपी ममता बनर्जी पर डोरे डालना चाहती है. यदि ममता बनर्जी ने 25 से 30 सीटें जीत लीं, जो अब संभव भी दिख रहा है, तो बीजेपी उन्हें किसी भी सूरत में अपने साथ लेना चाहेगी. "

Image caption विधानसभा चुनावों में पराजित होने वाली सीपीआई(एम) का अब पंचायत चुनावों में भी सफाया हो गया है.

ममता बनर्जी बीजेपी के राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को छोड़कर कांग्रेस के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) में आ गईं थी. ऐसा उन्होंने व्यापक मुस्लिम मतदाताओं, जो राज्य के कुल वोटरों में एक चौथाई से अधिक हैं, को रिझाने के लिए किया था.

कांग्रेस नेता अधीर चौधरी कहते हैं, "वे चुनावों से पहले एनडीए के साथ आने से भले ही बचें लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे चुनावों के बाद एनडीए में जाने के मौके को नहीं भुनाएंगी. बीजेपी के साथ उनका गुप्त समझौता है."

पैकेज

हालाँकि तृणमूल इस आरोप को नकारती है. पार्टी महासचिव मुकुल राय कहते हैं, "हमारा किसी भी पार्टी के साथ कोई समझौता नहीं है. हमारी नेता ममता बनर्जी उस गठबंधन के साथ जाएंगी जो पश्चिम बंगाल के हितो का ध्यान रखेगा और गरीबों को हित में राष्ट्रीय नीति बनाएग."

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपीए सरकार द्वारा पश्चिम बंगाल को विशेष आर्थिक पैकेज देने से इंकार करने के बाद ही ममता बनर्जी गठबंधन से अलग हुईं थी. उस वक्त ममता बनर्जी किसी भी तरह बंगाल के लिए विशेष पैकेज चाहती थीं.

समादार कहते हैं, "उनका गरीबों के समर्थन में दिखना सिर्फ दिखावे के लिए ही नहीं है. यह एक सोच समझकर निर्धारित किया गया राजनीतिक मुद्दा है ताकि पश्चिम बंगाल में वे लेफ्ट पार्टियों से भी ज्यादा बड़ी गरीबों की पैरोकार दिख सकें."

लेफ्ट फ्रंट की तरह ही ममता बनर्जी भी बंगाल के ग्रामीण इलाके पर अधिकतम नियंत्रण पाना चाहती थी. जब तक लेफ्ट का बंगाल के ग्रामीण इलाक़ों पर नियंत्रण रहा तब तक सत्ता उनके हाथ में रही लेकिन जब उद्योगों के लिए जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ़ ममता बनर्जी के सशक्त विरोध प्रदर्शन से वे हार गए तो सत्ता भी उनके हाथ से चली गई.

आगामी चुनौतियों के बारे में पार्टी कार्यकर्ताओं से बात करते हुए ममता बनर्जी ने हाल ही में फुटबॉल की भाषा बोलते हुए कहा, "पंचायत चुनाव हमारे लिए क्वार्टर फाइनल थे, अगले साल लोकसभा चुनाव सेमीफाइनल हैं और 2016 में होने वाले विधानसभा चुनाव फाइनल होंगे." उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि, "अब शालीनता के लिए कोई जगह नहीं है" क्योंकि अब साफ हो गया है कि बंगाल में उन्हें अब लेफ्ट फ्रंट और उनकी पार्टी के विरोध में खड़ी कांग्रेस पार्टी से दो अलग-अलग मोर्चो पर लड़ाई लड़नी है.

(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार