बिहार: स्कूली बच्चों की मौत पर भी सियासत

मिड डे मिल

बिहार में विषाक्त भोजन से 23 स्कूली बच्चों की मौत पर उठे सवाल और बवाल के बाद इस घटना, या इससे जुड़ी मध्याह्न भोजन योजना के सिलसिले में कई सियासी रंग भी सामने आए हैं.

ख़ासकर इसके राजनीतिक पहलू को ज़्यादा उभारने के सत्ता प्रेरित दबाव में इसका आपराधिक पहलू गौण होता जा रहा है. मतलब ये कि इस मामले में भी भ्रष्ट तंत्र का अपराध ढका रहे, ऐसी कोशिश लगातार जारी है.

खाने में ज़हर (कीटनाशक) मिले होने की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है. अब यह पता करने के लिए जांच चल रही है कि किसी ने जान-बूझ कर ज़हर मिलाया था या लापरवाही से ऐसा हो गया.

राजनीतिकरण

इसी जांच का निष्कर्ष उन सरकारी बयानों को सच्चा या झूठा ठहरा सकता है, जिनमें इस घटना को 'राजनीतिक साज़िश' साबित करने की मंशा घटना के अगले दिन से ही नज़र आने लगी थी.

इस मामले में संबंधित स्कूल की गिरफ़्तार प्रधान शिक्षिका मीना देवी से पुलिस ने न सिर्फ़ गहन पूछताछ की है, बल्कि उनकी 'पॉलीग्राफ़ी जांच' भी कराई गई है.

जांच या पूछताछ का परिणाम आना अभी बाक़ी है. लेकिन राज्य के शिक्षा मंत्री पी के शाही ने विधानसभा में कहा कि स्कूल-शिक्षिका के पति अर्जुन राय ने घटना से दो दिन पहले वही कीटनाशक एक चीनी मिल से ख़रीदा था.

शिक्षा मंत्री यह भी बता चुके हैं कि गिरफ्तारी के भय से फ़रार चल रहे अर्जुन राय ने अपने जिस सगे भाई के नाम पर वह कीटनाशक ख़रीदा था, वह राष्ट्रीय जनता दल के सक्रिय कार्यकर्त्ता हैं.

Image caption मिड डे मील मामले में गिरफ़्तार शिक्षिका ने सरकार पर उन्हें फंसाने का आरोप लगाया है

हिरासत में लिए जाने से पहले मीना देवी ने आरोप लगाया था कि अपनी मन मुताबिक़ जांच कराकर नीतीश सरकार उन्हें और उनके परिवार को फंसाना चाहती है.

उन्होंने स्थानीय मीडिया से कहा था कि लगता है रसोई बनाने वाली महिला ने तेल समझ कर कीटनाशक को ही सब्ज़ी में डाल दिया था.

उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि स्कूल से जिस लड़की को निजी आवास के भंडारघर से तेल लाने के लिए भेजा गया था, उसने ग़लती से तेल के बजाय कीटनाशक वाला डिब्बा उठा लिया हो.

वैसे, इस मामले में मीना देवी को पहली नज़र में आपराधिक लापरवाही बरतने का दोषी इसलिए माना जा रहा है क्योंकि उस दिन सब्ज़ी का स्वाद बिगड़ जाने की शिकायत पर उन्होंने फ़ौरन ग़ौर नहीं किया था.

बदमाशी या साज़िश

उधर बीमार बच्चों के इलाज में कमी और देरी के आरोपों से घिरी राज्य सरकार की बड़ी चूक यह मानी जा रही है कि उसने जांच से पहले ही इसमें ' साज़िश ' की आशंका बताकर मामले का राजनीतिकरण करना चाहा.

इस बीच राज्य सरकार ' मिड डे मील' स्कीम से जुडी तमाम शिकायतों को दूर करने में ख़ासी तत्परता दिखा रही है.

कई ज़रूरी फ़ैसले, जो पहले ही लेने थे, अब भूल सुधार वाले अंदाज़ में लिए जा रहे हैं.

Image caption बिहार में मिड डे मील योजना से शिक्षकों को दूर रखा जाएगा

मसलन राज्य के सात हज़ार से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में 109 करोड़ रुपए की लागत से 'किचेन शेड' यानी रसोई घरों के निर्माण का निर्णय किया गया है.

इस पर होने वाले ख़र्च का अधिकांश हिस्सा केंद्र सरकार देगी. साथ ही शहरी और क़स्बाई क्षेत्रों में डिब्बा बंद भोजन मुहैया कराने के लिए विश्वस्त और प्रामाणिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश की जाएगी.

धीरे-धीरे तमाम स्कूल-शिक्षकों को मिड डे मील के काम से मुक्त कर दिया जाएगा और भोजन की शुद्धता ही इस योजना की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी.

सुनने में तो ये सारे सरकारी वायदे काफ़ी अच्छे लगते हैं लेकिन भ्रष्टाचार के महाजाल में फंसी इस योजना का उद्धार कभी हो पाएगा, इसका भरोसा अब आम लोगों में रह नहीं गया है.

इतनी बड़ी तादाद में बच्चों की मौत के बाद भी इस राज्य के कई स्कूलों में 'मिड डे मील' योजना के ख़राब भोजन से बीमार होने वाले बच्चों की तादाद सौ से ज्यादा हो चुकी है.

अब तो कहीं-कहीं स्कूलों के चापाकल (हैण्ड पाइप) में सल्फास या अन्य ज़हरीली चीज़ घोल दिए जाने और विषाक्त पानी पीने से बच्चों के बीमार होने की भी ख़बरें आ रही हैं.

Image caption स्कूल में बच्चों की मौत के बाद छपरा में गुस्साए लोगों ने तोड़फोड़ भी की थी

हालाँकि पुलिस प्रशासन इसे कुछ शरारती तत्वों की बदमाशी मान रहा है लेकिन सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने इन घटनाओं के पीछे भी राजनीतिक साजिश का अंदेशा ज़ाहिर किया है.

राजनीतिक छद्म

राज्य विधानमंडल में हाल ही में विपक्षी दलों ने 23 बच्चों की मौत संबंधी घटना पर बहस के लिए 'काम रोको प्रस्ताव' लाकर नीतीश सरकार को घेरने का पुरज़ोर प्रयास किया.

जीवन और मौत के बीच फंसे बीमार बच्चों के इलाज में हुई कमी और देरी जैसी सच्चाई को भी राज्य सरकार झुठलाने की ज़िद पर अड़ी हुई थी.

उस समय वहां सदस्यों के बीच तू-तू मैं-मैं वाला ऐसा हंगामा मचा था, जैसे इस मामले में सत्ता पक्ष ख़ुद को पूर्णतः निर्दोष और विपक्ष अपने को बिल्कुल आदर्श साबित करने पर तुल गया हो.

बीच-बीच में अनायास ही सही, उनके बीच हास्य-व्यंग्य की फुलझड़ियाँ भी छूटती रहीं और इस तरह राजनीतिक छद्म का एक कर्मकांड वहां पूरा हो गया.

यह भी सच है कि छपरा ज़िले के धर्मासती गंडामन गाँव में गत 16 जुलाई की घटना से जो कोहराम मचा था, उसका असर इस राज्य के नेताओं को न सही, लेकिन पूरे समाज को लम्बे समय तक झकझोरता रहेगा.

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