मल्टी ब्रांड में एफ़डीआई पर क्यों पलटी सरकार?

सरकार ने खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश जुटाने के लिए उन सभी नियमों में छूट देने का फ़ैसला किया है, जिनके आधार पर करीब दस महीने पहले सरकार ने मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी थी.

इसके साथ ही संसद के आगामी मानसून सत्र में सरकार को एक बार फिर विपक्ष के तीखे तेवरों का सामना करना पड़ सकता है.

क्या है फैसला?

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) की गुरुवार को हुई बैठक में फैसला किया गया है कि यदि राज्य चाहें तो विदेशी खुदरा कंपनियां दस लाख से कम आबादी वाले शहरों में अपने स्टोर खोल सकती हैं.

इसके साथ ही छोटी और मझोली कंपनियों से कम से कम 30 प्रतिशत ख़रीद के नियम और बुनियादी ढांचे में कुल निवेश के 50 प्रतिशत निवेश की शर्त में भी ढील दी गई है. ताज़ा फ़ैसले के मुताबिक विदेशी कंपनियों को 30 प्रतिशत ख़रीद सीमा से पांच साल की छूट मिल गई है, जबकि अब उन्हें केवल पहली बार किए गए निवेश का 50 प्रतिशत ही बुनियादी ढांचे पर करना होगा.

क्या होगा असर?

जाने-माने अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला बताते हैं कि सरकार के सामने चालू खाते के घाटे का दबाव है, सरकार किसी भी तरह से विदेशी निवेश चाहती है. उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि इन परिवर्तनों के बावजूद रिटेल में एफ़डीआई आएगा."

खुदरा क्षेत्र में एफडीआई पर बहस के पक्ष में सरकार की सबसे बड़ी दलील थी कि इससे कृषि के बुनियादी ढांचे के विकास में मदद मिलेगी, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर बुनियादी ढांचे में निवेश की शर्त को हटा ली गई है तो ऐसा कैसे होगा?

Image caption सरकार के इस फैसले से देश की संगठित खुदरा कंपनियों का अधिग्रहण और विलय तेज होगा.

भरत झुनझुनवाला बताते हैं कि ऐसे में मान लीजिए कि कोई विदेशी कंपनी पहली बार एक करोड़ रूपये लेकर आती है और उसमें से 50 प्रतिशत बुनियादी ढांचे में निवेश कर देती है और दोबारा जब आती है तो 500 करोड़ लेकर आ जाती है. इस तरह वे बुनियादी ढांचे में निवेश की शर्त से बच सकते हैं.

क्या होगा यदि दस लाख से कम आबादी में स्टोर खोले जाएंगे?

दस लाख से कम आबादी वाले शहरों में खुदरा स्टोर खोलने का मतलब है कि छोटे कारोबारियों को इन विदेशी कंपनियों का मुकाबला करना होगा. लेकिन भरत झुनझुनवाला कहते हैं, "जब भी एफडीआई आएगा तो पहले बड़े शहरों में आएगा. जब बड़े शहरों में ही एफडीआई नहीं आ रहा है तो छोटे शहरों की बात तो फिजूल की है."

क्यों थी छोटी कंपनियों से खरीद की शर्त?

आमतौर पर बड़ी रिटेल कंपनियाँ थोक में सामान ख़रीदती हैं और फिर दुनिया भर के बाज़ारों में बेचा जाता है, जैसे बांग्लादेश से कपड़े की ख़रीद. ऐसे में देश के छोटे कारोबारियों के सामने बाज़ार का संकट पैदा हो सकता है.

भरत झुनझुनवाला के मुताबिक सरकार ने रिटेल कंपनियों को पांच साल का समय दिया है, उसके बाद उन्हें छोटे और मझोले उद्योगों से 30 प्रतिशत ख़रीद करनी होगी लेकिन क्या कोई कंपनी भारत में सिर्फ पांच साल तक कारोबार करने के लिए आएगी? सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आगे चलकर इस सीमा को और नहीं बढ़ाया जाएगा.

क्यों हुए बदलाव?

Image caption विदेशी किराना कंपनियाँ पिछली शर्तों के आधार पर भारत में निवेश के लिए तैयार नहीं थी.

मल्टी ब्रांड खुदरा क्षेत्र में एफडीआई की इजाज़त मिलने के दस महीने बीत जाने के बाद भी किसी विदेशी कंपनी ने भारत में निवेश का प्रस्ताव नहीं रखा था. इसलिए सरकार इन कंपनियों को और अधिक राहत देने के लिए तैयार हो गई.

क्यों ज़रूरी है इन कंपनियों का भारत में निवेश?

देश में चालू खाते के घाटे की स्थिति चिंताजनक हो गई है. पिछले वित्त वर्ष के दौरान यह जीडीपी के मुकाबले 4.8 प्रतिशत था. अगर इसमें तत्काल सुधार नहीं हुआ तो अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक वैसी हो सकती है जैसी किसी लकवाग्रस्त व्यक्ति की होती है.

क्या है चालू खाता घाटा?

चालू खाता घाटा बढ़ने का अर्थ है कि उस देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आ रही है. ऐसे में देशी मुद्रा की कीमतों में तेज़ी से गिरावट आती है. यही वजह है कि रिज़र्व बैंक की लाख कोशिशों के बावजूद रुपया लगातार गिरता ही जा रहा है.

सरकार की तरकश के तीर?

Image caption सवा अरब आबादी के साथ भारत दुनिया सबसे अधिक तेजी से बढ़ रहा बाजार है.

सरकार निर्यात को प्रोत्साहित करके और आयात को काबू में लाकर इस स्थिति से निपट सकती है लेकिन ऐसा करने में समय लगेगा. दूसरी ओर एफडीआई से मिली विदेशी मुद्रा उसे तत्काल राहत मुहैया करा सकती है. इसलिए सरकार चाहती है कि विदेशी खुदरा कंपनियाँ भारत में निवेश करें.

भरत झुनझुनवाला कहते हैं कि इसका सीधा सा समाधान है कि सरकार रुपये का अवमूल्यन कर दे. रुपये को 70-75 रुपये प्रति डालर के स्तर पर आने दें अपने आप भारत के निर्यात बढ़ जाएंगे और चालू खाता घाटा काबू में आ जाएगा. उन्होंने कहा, "सरकार ऐसा नहीं कर रही है क्योंकि अमरीका और वाशिंगटन में जो प्रभावशाली लोग बैठे हैं, उन्हें बहुत झटका लगेगा क्योंकि उन्होंने भारत में जो पैसा लगा रखा है, उसकी कीमत घट जाएगी."

क्या केन्द्र में अगली सरकार इस फैसले को बदल सकती है?

भरत झुनझुनवाला बताते हैं कि यह असंभव नहीं है. थोड़ा बहुत क्षतिपूर्ति की कोई शर्त होगी तो होगी. इस समय भारत में निवेश करना विदेशी कंपनियों के लिए खतरा मोल लेना है, क्योंकि किसी भी संप्रभु सरकार का यह अधिकार है कि वह अपनी किसी नीति को बदल सकती है.

खुदरा कारोबारियों पर असर

इस फ़ैसले के साथ अगर विदेशी खुदरा कंपनियाँ भारत में आती हैं तो देश की संगठित क्षेत्र की खुदरा कंपनियों के शेयरों में उछाल देखने को मिलेगा, क्योंकि विदेशी कंपनियाँ भारतीय बाजारों में तेज़ी से पैठ बनाने के लिए इन्हें खरीदने की पेशकश करेंगी.

देश में उपभोक्ता सामान बनाने वाली ब्रांडेड कंपनियों का कारोबार प्रभावित होगा क्योंकि विदेशी रिटेल कंपनियाँ या तो अपने ब्रांड के साथ बाज़ार में उतरेंगी या फिर इन कंपनियों से अपनी शर्तों पर खरीदारी करेंगी.

सबसे अधिक नुकसान मझोले स्तर के खुदरा कारोबारियों पर होगा, जिनके ग्राहक आम तौर पर उच्च मध्यम वर्गीय लोग हैं. छोटी-मोटी दुकान चलाने वाले कारोबारियों पर कोई खास असर देखने को नहीं मिलेगा, ठीक उसी तरह जैसे विदेशी कोल्ड ड्रिंक कंपनियों के भारत में आने के बावजूद नींबू-पानी और लस्सी आज भी बिक रही है.

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