पहाड़ पर चढ़ना ही काफ़ी नहीं: बछेंद्री पाल

  • 9 अगस्त 2013
बछेंद्री पाल

माउंट एवरेस्ट पर फ़तह हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल की शख्सियत का एक और पहलू है. वह है उत्तराखंड की आपदा के दौरान लोगों को बचाने तथा राहत पहुंचाने में उनकी सशक्त भूमिका. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने उत्तराखंड आपदा से जुड़े अपने अनुभव बांटे.

इस साल जून में उत्तराखंड में आई भयंकर प्राकृतिक आपदा में 4500 से ज्यादा लोग मारे गए. सड़कें ध्वस्त हो गईं. गांव के गांव मुख्य धारा से कट गए.

बाढ़ प्रभावित इलाके में पली-बढ़ी 59 साल की बछेंद्री पाल ट्रैकिंग के अपने हुनर और पहाड़ी इलाकों की गहन जानकारी का इस्तेमाल करते हुए लोगों की जान बचाने और मुख्य धारा से कट चुके दूरदराज इलाकों तक राहत सामग्री पहुंचाने में लगी थीं.

उत्तरकाशी के कई बाढ़ प्रभावित गांवों में बछेंद्री पाल ने यात्रा की.

ढलान और मूसलाधार बारिश

गंगोत्री जाने वाला एकमात्र रास्ता बाढ़ में काफ़ी क्षतिग्रस्त हो चुका था. यह राष्ट्रीय राजमार्ग 50 से ज्यादा गांवों को आपस में जोड़ता है. उनकी लाइफलाइन भी है. 17 जुलाई को गंगा इसके कई हिस्सों को बहा ले गई.

टाटा स्टील एडवेंचर फाउण्डेशन टीम की अगुआ होने के नाते बछेंद्री पाल पर्वतारोहियों की अपनी टीम के साथ कट चुके हिस्सों तक पहुंचने की कवायद में लगी थीं.

वे अपनी टीम के साथ मूसलाधार बारिश में पहाड़ों की फिसलन भरी ढलान का सामना करते हुए आगे बढ़ रही थीं.

बछेंद्री पाल बताती हैं, “बहुत अप-डाउन करना पड़ा क्योंकि नेशनल हाईवे को बेहद नुकसान पहुंचा था. हमें पेचीदे रास्तों से आगे बढ़ना था. स्थिति ऐसी थी कि एक क़दम गलत पड़ा और आप गंगा के तेज़ बहाव में बह सकते थे. गंगा की धार इतनी ख़तरनाक थी कि हम पर्वतारोहियों को भी भारी दिक़्क़त महसूस हो रही थी.”

बछेंद्री पाल और उनकी टीम अपने राहत और बचाव कार्य के दौरान एक ऐसे गांव में पहुंची जहां करीब 29 घर पानी में बह गए थे. गांव वाले ऊंची जगह पर बने स्कूल में रह रहे थे.

पाल ने बताया, “हमने वहां लगभग 56 परिवारों से बात की. उन्हें साबुन, सोलर लैंप, कंबल, वाटर फ़िल्टर, फूड पैकेट आदि दिए. लोग हाथ जोड़े, सिर झुकाए खड़े थे.”

कुदरत पर कितना नियंत्रण ?

Image caption नेशनल हाईवे को बेहद नुकसान पहुंचा था. इसलिए पहाड़ी रास्तों से ही आगे बढ़ना था.

पाल वह सब याद कर बेहद दुखी हो उठती हैं. वे मानती हैं कि उत्तराखंड में हुए हाल के विनाश से बचा जा सकता था यदि नदी किनारे विकास सोच-समझकर किया जाता.

बछेंद्री कहती हैं, “ऐसी विपदा में यदि मैं किसी के दुख को थोड़ा कम कर पा रही थी, तो यह मेरे लिए गर्व की बात थी. मगर हमें यह समझना होगा कि हम हिमालय को अपने हिसाब से नियंत्रित नहीं कर सकते.”

उन्होंने आगे कहा, “कुदरत पर हम कितने हद तक कंट्रोल रख सकते हैं. हमें इससे सीख लेनी चाहिए और अपनी हदें नहीं भूलनी चाहिए.”

बछेंद्री पाल ने इससे पहले भी कई आपदाओं में राहत और बचाव कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है.

बछेंद्री बताती हैं, “मैं पहली बार राहत के लिए गुजरात गई थी. साल 2000 में वहां आए भयंकर भूकंप में सक्षम वॉलंटियर पर्वतारोहियों की एक टीम के साथ हमने एक-डेढ़ महीने तक सफ़र किया. ज़रूरतमंद लोगों की पहचान की. उन तक राहत पहुंचाई.”

वे बताती हैं, “उसके बाद 2006 में उड़ीसा में भयंकर चक्रवात आया. बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ. चारों तरफ लाशों का ढेर देखा हमने. हमने लोगों के दाह संस्कार किए.”

हम सबको एक पर्वतारोही होना चाहिए

बछेंद्री कहती हैं, “मैं वह सब देखकर बहुत रोई. आज भी जब याद सब याद आता है, तो मेरी नींद उड़ जाती है.”

वे कहती हैं, “हम सबको एक पर्वतारोही जैसा होना चाहिए. मैंने पहाड़ चढ़े, बर्फ में दबी, बेहद कठिन परिस्थितियों से गुज़री. मुझे लगता है कि केवल पहाड़ चढ़ना काफी नहीं है. हमारे समाज को ऐसे प्रशिक्षण का लाभ मिलना चाहिए. लोगों को पर्वतारोहियों से सीख लेनी चाहिए. उन्हें ख़ुद को एक सैनिक के रूप में तैयार करना चाहिए ताकि अपने देश के लोगों की देखभाल कर सकें.”

बछेंद्री ने 29 या 30 साल में पर्वतोरोहण शुरू किया. उन्हें इसका ज़्यादा प्रशिक्षण लेने की ज़रूरत नहीं पड़ी.

वे पहाड़ में ही जन्मी, पली-बढ़ीं. यहां की जीवनशैली ऐसी थी कि पानी लाने के लिए पहाड़ी रास्तों पर काफ़ी दूर जाना होता था. स्कूल जाना हो तो कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था.

पाल कहती हैं, “ऐसी जीवनशैली ने मुझे एक कुशल पर्वतारोही बनने और चुनौतियों का सामना करने के काबिल बनाया. यही वजह है कि मैं कामयाब हो पाई.”

दफ़न होने के बाद बच गई

Image caption गंगोत्री जाने वाला एकमात्र रास्ता बाढ़ में जगह जगह क्षतिग्रस्त हो चुका था.

माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने में सफलता हासिल करने के सात या आठ दिन पहले का अपना एक रोमांचक अनुभव बताया. उनका कैंप समुद्र से लगभग 24 हजार फीट की ऊंचाई पर था.

बछेंद्री पाल ने बताया, “हम सो गए थे. रात 12.30 बजे के अंदर अचानक तेज़ विस्फोट सुनाई दिया. मुझे लगा कि हमारा ऑक्सीजन सिलेण्डर फटा है. तभी मुझे लगा कि मैं किसी भारी बोझ के नीचे दब गई हूं. दो घड़ी बाद समझ में आया कि यह बर्फ़ की चट्टान है. मेरे एक साथी ने मेरा हाथ खींचते हुए मुझे बाहर निकालने की कोशिश की. मगर मैं इतने गहरे दबी थी कि लगा मेरा हाथ कट जाएगा, मगर मेरी देह बाहर नहीं निकल पाएगी. बड़ी मुश्किल से मैं निकलने में कामयाब हो सकी."

उन्होंने आगे बताया, “हमारे टीम लीडर ने पूछा कि क्या कोई लौटना चाहता है? मैंने कहा, मैं आगे जाऊंगी क्योंकि जब ज़िंदा दफ़न होने के बाद भी मैं बच गई. अब कोई बाधा ऐसी नहीं थी जो मेरा रास्ता रोकती. इसी हिम्मत और ऊर्जा के साथ मैं आगे बढ़ी और चोटी पर पहुंचने में कामयाब रही.”

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