प्वॉएंट ऑफ़ ऑर्डर मैडम स्पीकर !

  • 8 अगस्त 2013

बहुत से लोगों को या तो पता नहीं है कि तुलमोहन राम कौन थे... और या फिर वो उनको पूरी तरह भूल गए हैं.

आप को याद दिला दें कि वो तीसरी, चौथी और पांचवी लोक सभा के बैक बेंचर सदस्य हुआ करते थे और बिहार के अररिया लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे.

1974 में पांडिचेरी के व्यापारियों ने आयात लाइसेंस पाने के लिए 21 साँसदों के जाली दस्तखत बना कर वाणिज्य मंत्रालय को अर्ज़ी दी थी. तुलमोहन राम इस पूरे घोटाले के कर्ता धर्ता थे. उन्हीं की वजह से पहली बार लोक सभा को काम न करने देने की परंपरा शुरू हुई थी.

अस्सी के दशक में जब बोफ़ोर्स कांड ने भारत को हिलाया तो विपक्ष ने 45 दिनों तक संसद का बहिष्कार किया. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने अपनी संख्या की बदौलत ये सुनिश्चित किया कि संसद में सरकार का काम न रुकने पाए.

शुरुआती झिझक के बाद सरकार मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाने के लिए तैयार हो गई.

बाद में नरसिम्हा राव के ज़माने में विपक्ष ने संचार मंत्री सुख राम के इस्तीफ़े की मांग को ले कर काफ़ी दिनों तक संसद नहीं चलने दी. इस बार सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति की मांग नहीं मानी. नतीजतन 15 दिनों तक संसद में कुछ भी काम नहीं हुआ.

2003 में जब तहलका टेप सामने आए तो विपक्ष की नेता सोनिया गाँधी ने जेपीसी जांच की मांग की. एनडीए ने ये मांग सिरे से ख़ारिज कर दी और कई दिनों तक संसद पूरी तरह से ठप्प रही.

इसके बाद तो 2 जी घोटाला, कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला और खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसे मुद्दों ने समय समय पर संसद नहीं चलने दी.

टेलिविजन दोषी

Image caption सदन की कार्रवाई का सीधा प्रसारण शुरू होने के बाद सदन के पटल को ग्लोरिफ़ाइड राजनीतिक मंच के रूप में जाना जाने लगा है.

पिछले तीन सालों की बात करें तो 2010 में निर्धारित समय का सिर्फ 57 फ़ीसदी काम हुआ. 2011 में संसद निर्धारित समय का 70 फ़ीसदी ही इस्तेमाल कर पाई. 2012 में ये प्रतिशत गिर कर 61 रह गया और इस साल इसके और घटने के आसार साफ नज़र आ रहे हैं.

साल 1952 में गठित लोकसभा की हर साल औसतन 127 बैठकें हुईं थीं. लेकिन 2012 में यह औसत घटकर 73 दिन का रह गया. इस तरह संसद की बैठकों की संख्या में तो गिरावट आने के साथ-साथ गतिरोध की वजह से बर्बाद होने वाले घंटों की संख्या बढ़ी है.

ये सब एक ऐसी संस्कृति के विकसित होने की वजह से हुआ है जहां सदन के पटल को एक ग्लोरिफ़ाइड राजनीतिक मंच के रूप में माना जाने लगा है. यह महज़ संयोग नहीं है कि संसद की कार्रवाई का सीधा टेलिविजन प्रसारण शुरू होने के बाद से इस तरह की प्रवृत्ति में इज़ाफ़ा हुआ है.

राजनीतिक मुद्दे भुनाने के लिए रामलीला मैदान में क्यों रैली की जाए जब संसद में हो रहे ड्रामे को कैद कर रहे टीवी कैमरे इसे घर घर पहुंचा रहे हों !

भारतीय राजनीतिज्ञों को हमेशा इस बात का गर्व रहा है कि आज़ादी के बाद उन्होंने ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को अपनाया. भारतीय सांसद भी भी कई ब्रिटिश संसदीय परंपराओं का पालन करते हैं. मसलन जब वो किसी बात पर खुश होते हैं तो ब्रितानी सांसदों की तरह वो भी मेज़ थपथपा कर अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हैं न कि तालियाँ बजा कर.

जब किसी विधेयक पर मतदान होता है तो भी भी वो हाउज़ ऑफ़ कामंस की तर्ज़ पर ‘आई’ कहते हैं न कि हाँ या ‘यस.’ अब भी लोकसभा अध्यक्ष को मतदान के बाद अक्सर ये कहते हुए सुना जा सकता है ’ द आइज़ हैव इट.’

लेकिन 60 सालों से अधिक के संसदीय अनुभव ने कई बेहतरीन ब्रिटिश परंपराओं को भुला सा दिया है. कई विधान सभाओं में फ़र्नीचर और माइक फेंकने, कागज़ फाड़ने और चप्पल फेंकने जैसी घटनाएं हुई हैं जिनकी कुछ साल पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

सदन के अंदर विधायकों ने न सिर्फ़ एक दूसरे के कपड़ फाड़े हैं बल्कि कई बार हाथापाई की नौबत भी आई है. शुक्र है कि अभी ये सब भारतीय संसद में आम नहीं हुआ है.

पिछले साल संसद के पूरे दो सत्रों में एक मिनट तक का काम नहीं हो पाया. जैसे ही कुछ शोर मचाते सांसद सदन के वेल में आकर नारेबाज़ी करने लगते हैं, लोक सभा अध्यक्ष की पहली प्रतिक्रिया होती है कि वो सदन की कार्रवाई को स्थगित कर दे.पहले आधे घंटे के लिए, कभी इससे ज़्यादा समय के लिए तो कभी पूरे दिन भर के लिए.

हाउज़ ऑफ़ कामंस

लोगों को ये बात काफ़ी आश्चर्यजनक लग सकती है कि हाउज़ ऑफ़ कांमंस के सैकड़ों सालों के इतिहास में आज तक इसे एक मिनट के लिए भी स्थगित नहीं किया गया.

एक ज़माना था कि भारतीय संसद में अभद्रता से बहुत सख़्ती से निपटा जाता था. सत्तर के दशक में अख़बारों के पहले पन्ने पर पहलवान से दीखने वाले राजनारायण को चार मार्शलों द्वारा कंधे पर सदन से ज़बर्दस्ती बाहर ले कर जाने का चित्र छपा था.

उनका जुर्म ये था कि उन्होंने अध्यक्ष का कहना नहीं माना था और बिना अपनी बारी आए लगातार चिल्ला रहे थे और अध्यक्ष के बार बार कहने के बावजूद अपनी सीट पर नहीं जा रहे थे.

हाल के सालों में संसद के स्तर को जान बूझ कर गिरने दिया गया है. एक के बाद एक लोकसभाध्क्षों ने निष्कासन की जगह कार्रवाई स्थगन को ज़्यादा तरजीह दी है.

तीन साल पहले पांच राज्यसभा सांसदों को अध्यक्ष की मेज़ का माइक्रोफ़ोन खींचने और कागज़ फाड़ने के आरोप में सदन की सदस्यता से निलंबित किया गया था. लेकिन कुछ महीनों बाद, दबी ज़बान में माफ़ी के बाद उन्हें चुपचाप दोबारा बहाल कर दिया गया था.

इस सबका परिणाम ये रहा है कि बहुत से सांसद मानने लगे हैं कि अपनी भावनाओं को इज़हार करने का सबसे अच्छा तरीका है कानून बनाने की प्रक्रिया में व्यवधान डालना न कि उस पर बहस करना.

स्पीकर की भूमिका

ब्रिटेन की संसद में सांसद तभी बोल सकता है जब स्पीकर उसे बोलने के लिए कहे. वहां ये भी परंपरा है कि जैसे ही स्पीकर किसी सांसद के बोलने के दौरान खड़ा होता है, सांसद को तुरंत अपनी सीट पर बैठ जाना होता है.

स्पीकर का ध्यान खींचने के लिए सांसद अक्सर अपनी सीट से आधे खड़े होते हैं लेकिन अगर स्पीकर ने उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया और उसे बोलने के लिए नहीं कहा तो चाहे जो हो जाए वो एक शब्द भी नहीं बोल सकता.

ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कामंस की एक और दिलचस्प बात है कि 650 सांसदों में से केवल 427 सांसदों के लिए सदन में बैठने की व्यवस्था है.

वहां पहले से तैयार भाषणों को पढ़ने की अनुमति नहीं है. हां भाषण के दौरान नोट्स की मदद ली जी सकती है. पूरक सवाल पूछते समय नोट्स की तरफ देखने की भी अनुमति नहीं है.

नाम लेना

वहाँ इस को सबसे बड़ी सज़ा माना जाता है अगर सदन की कार्रवाई में व्यवधान करने, नियमों का पालन न करने और चेयर के आदेश न मानने के लिए, स्पीकर सांसद का नाम ले दे.

अगर स्पीकर यह कह दे कि ‘ मैं फ़लां फ़लां सदस्य का नाम ले रहा हूँ,’ तो सदन का नेता, सरकार का चीफ़ व्हिप या वहाँ मौजूद वरिष्टतम मंत्री ये प्रस्ताव पेश करता है कि इस सदस्य को सदन की सदस्यता से निलंबित किया जाए.

मतदान के बाद अगर प्रस्ताव मंज़ूर हो जाता है तो उसे पहली गल्ती के लिए पांच दिनों के लिए सदन की सदस्यता से निलंबित किया जाता है.

अगर स्पीकर दोबारा उसका नाम लेता है तो उसे 20 दिनों के निलंबन की सज़ा मिलती है. तीसरी बार की गल्ती पर उसे अनिश्चियत काल के लिए निलंबित किया जा सकता है.

निलंबन के दौरान उसे उन दिनों का वेतन नहीं दिया जाता. हाउज़ ऑफ़ कामंस की एक और बहुत स्वस्थ परंपरा है कि अगर कोई सांसद सदन में किसी सांसद पर कोई आरोप लगाने की मंशा रखता है है तो वो पहले उसको इसकी बाक़ायदा सूचना देता है.

भारत का लोकतंत्र ब्रिटेन की तुलना में बहुत पुराना नहीं है. अभी इन परंपराओं को यहाँ घर करने में वक्त लगेगा.

फ़िलहाल यहां के लोकसभाध्यक्ष के पास नियमों का पालन न करने वाले को सज़ा देने का विकल्प नहीं के बराबर है क्योकि इसके बाद जो हाएतोबा मचेगी उसकी कल्पना मात्र भी कोई स्पीकर नहीं करना चाहेगा.

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