शोर संसदीय कर्म है, पर कितना शोर?

  • 14 अगस्त 2013
भारतीय संसद
Image caption संसद में होने वाले शोर को लेकर अकसर सवाल उठाए जाते हैं

सभी दलों की बैठक शांति से होती है. सदन को ठीक से चलाने पर आम राय भी बनती है. पर जैसे ही सुबह 11 बजे सदन शुरू होता है काम-काज अस्त-व्यस्त हो जाता है.

राजनीतिक विरोध के प्रश्नों पर टकराव स्वाभाविक है, पर वह भी ढंग से नहीं हो पाता. मानसून सत्र की अब तक की छह दिन की कार्यवाहियों में सबसे ज्यादा अवरोध तेलंगाना मसले के कारण हुआ.

इसका शिकार कोई न कोई महत्वपूर्ण मसला ही हुआ. तेलंगाना का मूल मसला भी इस विरोध प्रदर्शन के चलते पीछे चला गया. सोमवार को राज्यसभा ने विवाह के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने वाले संशोधन विधेयक को पास कर दिया.

संसद में अब 16 अगस्त को अवकाश रहेगा. इसके बदले 24 अगस्त को संसद की बैठक होगी. 14 अगस्त के बाद संसद की अगली बैठक 20 अगस्त को होगी. उसके बदले 21 को अवकाश रहेगा.

शोर भी संसदीय कर्म है. पिछले साल कोयला खानों के आवंटन को लेकर संसद में व्यवधान पैदा करने वाले भाजपा नेताओं का यही कहना था. पर कितना शोर?

अंततः संसद विमर्श का फोरम है जिसके साथ विरोध-प्रदर्शन चलता है. पर संसद केवल विरोध प्रदर्शन का मंच नहीं है.

'अराजकता का संघ'

शोर के अलावा मर्यादा का मसला भी है. पिछले साल दिसंबर में राज्य सभा के सभापति हामिद अंसारी को लेकर बसपा नेता मायावती की टिप्पणी के कारण राज्य सभा में में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी.

मंगलवार को भी सभापति हामिद अंसारी को कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी, जिसे भाजपा के वरिष्ठ सदस्यों ने पसंद नहीं किया, बल्कि उन्होंने वो टिप्पणी वापस लेने की माँग की.

सदन में भाजपा सांसद सभापति के आदेशों की अनसुनी कर रहे थे. तभी हामिद अंसारी ने कहा, "हरेक नियम, हरेक शिष्टाचार का उल्लंघन हो रहा है. अगर माननीय सदस्य इसे ‘अराजकता का संघ’ बनाना चाहते हैं तो दीगर बात है."

इसके बाद भी हंगामा रुका नहीं और सदन स्थगित हो गया. बाद में जब फिर से सदन शुरू हुआ तो भाजपा के नेता अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सभापति यह टिप्पणी बिना शर्त वापस लें.

कमलनाथ-जोशी तकरार

शोरगुल के बीच अकसर नेता धैर्य खो बैठते हैं. लोकसभा में मंगलवार को दिन में एक ऐसा मौका भी आया जब इस बात पर ठंडे मिज़ाज से बात हुई कि कौन सी पार्टी सदन को ठीक से चलाना चाहती है. पर उसके पहले तनाव का एक दौर गुज़र चुका था.

संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ और भाजपा के वरिष्ठ सांसद मुरली मनोहर जोशी के बीच नोंक-झोक हो गई.

Image caption जोशी की आपत्ति के बाद कमलनाथ को वापस लेनी पड़ी टिप्पणी

नोंक-झोंक तब हुई जब जोशी ने खाद्य सुरक्षा विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए तेलंगाना मुद्दे पर विरोध कर रहे कांग्रेस के सदस्यों को शांत करने के लिए कहा. इस पर कमल नाथ ने कोई टिप्पणी कर दी.

यह बात जोशी को लग गई. वे बोले, "आप इस तरह मुझसे कैसे बात कर रहे हैं? पिछले 40 वर्षों में किसी ने भी मुझसे इस तरह बात नहीं की है?"

मंत्री ने स्वीकार किया कि उन्होंने गुस्से में बात कही है, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि वरिष्ठ सांसद का अनादर का उनका कोई इरादा नहीं था.

उन्होंने कहा, "मैं जोशीजी का सम्मान करता हूं. वह वरिष्ठ नेता हैं. मैंने उनसे गुस्से में बात की कि यह सदन सिर्फ़ मेरा नहीं उनका भी है. लेकिन यदि मेरे यह कहने से वह आहत हुए हैं तो मैं अपने शब्दों को वापस लेता हूं."

विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इस मसले पर कहा, “कमल नाथ जी यदि सदन को चलाना चाहते हैं तो आपको शिष्ट होना पड़ेगा. आपने क्या बोला यह महत्वपूर्ण नहीं है. किस अंदाज़ में कहा वह महत्वपूर्ण है. सारे गुण होंगे आपमें, लेकिन विनम्रता का अभाव है.”

मीडिया की उदासीनता

सीमांध्र को न्याय दिलाने के लिए सदन में लगातार व्यवधान पैदा कर रहे सदस्यों को लेकर जेडीयू के सदस्य शरद यादव ने भी मंगलवार को अपनी नाराज़गी व्यक्त की. सुषमा स्वराज ने भी उनसे निवेदन किया कि वे संसद भवन परिसर में स्थित गांधी प्रतिमा पर जाकर अपना विरोध प्रदर्शन करें.

संसद में कई प्रकार के मसले उठते हैं और सब चाहते हैं कि उनके क्षेत्र में इस बात की जानकारी हो कि उनके प्रतिनिधि ने उनकी बात को ज़ोरदार ढंग से उठाया. पर इस शोर के कारण सबसे पहला शिकार आमतौर पर प्रश्न होते है, जिसमें अलग-अलग इलाकों से जुड़े़ मसले होते हैं.

संयोग से राष्ट्रीय मीडिया भी अब प्रश्न-प्रहर को अच्छी तरह कवर करने में दिलचस्पी नहीं लेता. ज़रूरी होने पर प्रायः अखबार प्रश्न-प्रहर की कवरेज एजेंसी की कॉपी से करते हैं. अपना संवाददाता नहीं लगाते.

संसद में काम-काज के बाधित होने और अलग-अलग विषयों को समय दिए जाने जैसे मसलों पर पीआरएस जैसी संस्थाएं डेटा तैयार करने लगी हैं और ये तथ्य मीडिया में आ भी रहे हैं.

लेकिन लगता है कि अभी मुख्य धारा की राजनीति इस प्रकार के सवालों को लेकर सचेत नहीं है. जबकि नया वोटर इलेक्शन वॉच, एडीआर और पीआरएस की वेबसाइटों पर निगाह रखने लगा है.

104 विधेयकों को इंतजार

मोटे तौर पर पिछले कुछ समय में नए एवं पुराने तकरीबन 104 विधेयक संसद में लंबित पड़े हैं. यों तो सभी महत्वपूर्ण हैं, पर कई विधेयक आम लोगों, देश की आर्थिक एवं सामाजिक तंत्र को मजबूत बनाने और सुरक्षा से जुड़े़ विषयों से संबंधित है.

सर्वदलीय बैठकों में इस बात की ओर सांसद ही इशारा करते हैं. इसका मतलब है कि वे इस बात के प्रति सचेत हैं, पर राजनीतिक परिपाटी को सुधार पाने में असमर्थ हैं.

Image caption विपक्ष रॉबर्ट वाड्रा के मुद्दे को जोर शोर से उठा रहा है

हंगामे के कारण 2010 के शीत सत्र में लगभग कोई कामकाज नहीं हुआ. 2012 के मानसून सत्र में 70 प्रतिशत से अधिक समय व्यर्थ गया. 2013 के बजट सत्र में 49 प्रतिशत समय में काम-काज बाधित रहा. वर्तमान मानसून सत्र में पिछले छह दिनों में कोई खास काम-काज नहीं हो सका है.

रॉबर्ट वाड्रा पर बहस नहीं

मंगलवार की कार्यवाही शुरू होने के पहले भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड ने राबर्ट वाड्रा के मामले को उठाने का निश्चय किया था. पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने पहले से कह दिया था कि यह मसला उठाएंगे, पर दूसरे किस्म के व्यवधानों के कारण यह मामला भी नहीं उठ पाया. पार्टी ने इस पर बहस की माँग की थी, जिसे सरकार ने नामंज़ूर कर दिया.

सर्वदलीय बैठक में ही सरकार ने साफ कर दिया था कि इस विषय पर संसद में बहस नहीं होगी. सरकार का कहना है कि रॉबर्ट वाड्रा संसद के सदस्य नहीं हैं और संसद व्यक्तियों के बारे में विमर्श नहीं करती. इसके बारे में विचार करने के लिए तमाम फोरम हैं.

खाद्य सुरक्षा विधेयक पर भी चर्चा आगे खिसक गई है. उसपर मंगलवार को लोकसभा में चर्चा की कोशिश हुई थी. पर तेलंगाना मुद्दे पर तेदेपा सदस्यों के हंगामे की वजह से कार्यवाही में बाधा पहुंची और विधेयक पर चर्चा नहीं हो सकी. हालांकि सर्वदलीय बैठक में इस पर सहमति हुई थी.

खाद्य मंत्री केवी टॉमस ने इस विषय पर कुछ बोलने की कोशिश की, जिसे हंगामे के कारण सुना नहीं जा सका.

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