25 साल पहले जब थम जाता था जीवन....

  • 14 अगस्त 2013
रामायण
Image caption 'रामायण' रामानंद सागर द्वारा निर्देशित भारत का अब तक का सबसे लोकप्रिय टीवी सीरियल है.

भारत में लोगों को यह अंदाज़ा नहीं था कि 'इडियट बॉक्स' समझे जाने वाले टीवी का असर इस कदर हो सकता है कि लोग इसके कार्यक्रम के हिसाब से अपनी ज़िदगी की घड़ी चलाएंगे.

25 साल हो गए हैं जब भारत के सबसे बड़े टीवी सीरियल ‘रामायण’ की आखिरी कड़ी दूरदर्शन पर प्रसारित हुई थी. इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि हर सप्ताह इस सीरियल को करीब 10 करोड़ लोग देखते थे. ये आंकड़े तब के हैं जब भारत में टीवी का प्रसार बहुत नहीं हुआ था.

‘रामायण’ में सीता का किरदार निभाया था, दीपिका चिखलिया ने. उन्हें लोग आज भी रामायण की ‘सुपरस्टार’ मानते हैं.

दीपिका ने सीता के किरदार को छोटे परदे की सबसे यादगार भूमिका बना दिया. उन्हें आज भी वह सफ़र ऐसे याद है जैसे कल की बात हो.

बीबीसी से बातचीत में दीपिका ने कई बातों की चर्चा की.

'टीवी था इडियट बॉक्स'

वे साल 1988 के गर्मी और उमस भरे दिन थे. भारत 'रामायण' के बुखार में गिरफ्तार हो चुका था. यह देश का सबसे चर्चित टीवी सीरियल बन चुका था.

लोग राम, सीता और लक्ष्मण को देखने के लिए बेसब्री से इंतजार करते थे.

दीपिका बताती हैं, ''शुरू-शुरू में हमें यह अंदाजा नहीं था कि यह धारावाहिक इतना मशहूर हो जाएगा. तब लोग टीवी को इडियट बॉक्स कहते थे. टीवी मीडियम को खास दर्जा हासिल नहीं था. 'रामायण' में सीता की भूमिका को कलाकार ज्यादा अहमियत नहीं दे रहे थे. लेकिन मैंने यह भूमिका यह सोचकर की कि दर्शकों के मन में सीता की एक लुभावनी छवि है.''

वो बताती हैं कि किरदारों का मेकअप, कॉस्ट्यूम और बॉडी लैंग्वेज सब हटकर थे. भाषा भी आम बोलचाल वाली हिंदी से अलग, एकदम शुद्ध हिंदी थी.

'मशहूर कलाकार नहीं चाहिए थे'

Image caption रामायण पर कई और सीरियल और एनिमेशन फिल्में बन चुकी हैं

दीपिका कहती हैं कि सीता के रोल के लिए उनका चुना जाना इतना आसान भी नहीं था. करीब 30-35 लड़कियां सीता के रोल के लिए स्क्रीन टेस्ट देने आईं थीं.

दीपिका कहती हैं, "वे काफी खूबसूरत, टैलेंटेड, ग्लैमरस थीं. मगर चुना मुझे गया. शायद मैं ‘रामायण’ की सीता की छवि के अनुकूल थी."

निर्देशक रामानंद सागर ऐसे कलाकार चाहते थे, जो भूमिका में समा जाएं.

दरअसल रामानंद सागर को बड़े और मशहूर कलाकार नहीं चाहिए थे, बल्कि वे चाहते थे कि उनके सीरियल में वे काम करें, जो बहुत व्यस्त न हों और एपिसोड के पूरे होने तक आसानी से उपलब्ध भी रहें.

दीपिका कहती हैं, ''हम कलाकार काफी दिनों तक एक दूसरे को ‘स्क्रीन नेम’ से ही बुलाते थे. रामानंद जी भी हमें स्क्रीन नेम से ही बुलाते थे. उनका मानना था कि ऐसा करने से कलाकारों को अपनी भूमिका की गहराई में उतरने में सुविधा होती है.''

‘रामायण’ की अधिकांश शूटिंग मुंबई से चार घंटे की दूरी पर स्थित उमरगांव में हुई थी. एक बहुत छोटा सा गांव, जहां ब्रेड जैसी आम चीज़ भी नहीं मिलती थी. दीपिका कहती हैं, "हम सब कलाकार स्टूडियो में ही रहते थे, मानो एक लंबी पिकनिक पर आए हों.''

'जीवन थम जाता था'

रामानंद सागर हर एपिसोड को सोमवार से गुरुवार तक शूट करते. शुक्रवार को एडिट करते और रविवार सुबह ब्रॉडकास्ट के लिए मुंबई भेजते. शूटिंग ज़्यादातर रात को होती थी और तड़के सुबह ही पैकअप होता था.

दीपिका बताती हैं, ''शूटिंग के दौरान बहुत गर्मी और उमस हुआ करती थी क्योंकि तब न पंखे थे और न एसी. हम सब अपने सुंदर कॉस्ट्यूम में, गहनों से संवरे हुए बुत की तरह घूमते रहते थे. सेट पर हमेशा 200 से 300 लोग मौजूद रहते थे.''

‘रामायण’ भारत में इतना लोकप्रिय हुआ कि जब इसका एपिसोड आना शुरू होता था, तो जो जहां होता था, वहीं खड़ा रह जाता था. सब कुछ थम जाता था.

लखनऊ के एक अस्पताल में मरीजों ने इस बात की शिकायत की थी कि डॉक्टर और नर्स 'रामायण' शुरू होते ही उन्हें छोड़कर सीरियल देखने चले जाते थे. राजनीतिक दलों ने भी उस वक़्त रैली निकालना बंद कर दिया था.

कहते हैं कि लोगों ने अपनी शादी की तारीख और समय तक बदल दिए ताकि रामायण का एक भी एपिसोड उनसे न छूटे.

'टीवी पर माला डालते थे'

Image caption पौराणिक कथाओं पर आधारित अब भी कई सीरियल टीवी पर आते हैं

‘रामायण’ रविवार सुबह साढ़े नौ बजे आता था. तब लोग अपने टीवी पर माला डाल देते थे. लोगों का विश्वास था कि ईश्वर साक्षात उनके घर आ गए हैं.

उन दिनों को याद करते हुए दीपिका कहती हैं, ''रामायण की लोकप्रियता का आलम यह था कि दादा-दादी, मम्मी-पापा की उम्र के लोग आकर मेरे पांव छूते थें. मुझे बहुत बुरा लगता था लेकिन फिर समझ में आया कि यह तो उनकी आस्था है, विश्वास है. वे मेरे नहीं, सीता के चरण स्पर्श कर रहे हैं.''

वो बताती हैं, ''31 जुलाई, 1988 को रामायण का अंतिम एपिसोड प्रसारित हुआ. हम सब अलग होने से पहले एक-दूसरे से गले मिले. मानो एक युग का अंत हुआ. बेहद मुश्किल लग रहा था उस रुटीन से बाहर आना.''

दीपिका के मुताबिक रामायण की कहानी और किरदार इतने खूबसूरत और असरदार थें कि लोग उन्हें अब भी पहचानते हैं, सम्मान देते हैं. उस वक्त उन जैसे कलाकार लोगों के लिए ईश्वर की चलती-फिरती मूर्ति थे.

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