अगले साल का रिहर्सल है नरेन्द्र मोदी का भाषण?

Image caption (अंग्रेजी दैनिक डीएनए के कार्टूनिस्ट मंजुल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण सुने और बीबीसी हिंदी के साथ अपना नजरिया कुछ इस तरह से साझा किया.)

'प्रधानमंत्री' नरेन्द्र मोदी 15 अगस्त 2014 को लाल क़िले की ऐतिहासिक प्राचीर से स्वतंत्र दिवस का अपना पहला भाषण देने के लिए खड़े होते हैं.

मोदी के लाखों समर्थक भुज से उनके आज के भाषण के बाद शायद ऐसी ही कल्पना कर रहे होंगे.

अगर भारत में अमरीका की तरह राष्ट्रपति शासन प्रणाली होती तो आज नरेन्द्र मोदी अपने भाषण के आधार पर मनमोहन सिंह से बाज़ी मार ले जाते और अगले साल चुनाव के बाद उनके समर्थकों का सपना भी साकार हो जाता.

गुजरात के मुख्यमंत्री का आज का दबंग और अभूतपूर्व कदम अगले साल के लिए एक ड्रेस रिहर्सल कहा जा सकता है.

निराशा और आशा

इसकी मिसाल कम ही मिलती है कि स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री के लाल क़िले से दिए जाने वाले भाषण के मुकाबले में कोई नेता देश को अलग से संबोधित करे. मोदी ने देश को बुधवार को ही आगाह कर दिया था. उन्होंने कहा था कि देश के लोग दो भाषण सुनेंगे और दोनों भाषणों की तुलना करेंगे. उनका कहना था कि एक तरफ निराशा होगी तो दूसरी तरफ आशा, एक तरफ वादे गिनाए जाएंगे तो दूसरी तरफ किए गए कामों के बारे में बताया जाएगा.

Image caption भाषण को लेकर लोग नरेंद्र मोदी की आलोचना भी कर रहे हैं

स्वतंत्रता दिवस की इस परंपरा को तोड़ने पर नरेन्द्र मोदी की आलोचना भी की जा रही है.लेकिन ऐसा लगता है जनता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. जैसा की उन्होंने कल कहा था दोनों भाषणों की तुलना की जाएगी, तो आज दोनों भाषणों की खूब तुलना की भी जा रही है.

एक तरफ जहाँ प्रधानमंत्री का भाषण आशानुसार फींका और पहले से तैयार किया हुआ था, मोदी का भाषण कहीं अधिक दमदार था. एक भाषण में जोश की कमी थी तो दूसरा भाषण काफी जोशीला था. कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि भुज से गूंजती आवाज़ ने लाल क़िले से निकली आवाज़ को मद्धम कर दिया.

दिल्ली दूर अस्त

इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री का भाषण काफी फीका था. लेकिन यह भी सच है कि गुजरात के मुख्यमंत्री के भाषण का लहजा काफी नकारात्मक था. मोदी ने अपने जवाबी भाषण में मनमोहन सिंह पर सीधा वार किया. ज़ाहिर है स्वतंत्रता दिवस के दिन इस तरह के सियासी चरित्र हनन को सराहा नहीं जाएगा.

लेकिन मोदी का आज का जवाबी भाषण एक सोची समझी सियासी योजना की एक कड़ी थी. वो अधिकृत रूप से भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के पद के उमीदवार अब तक नहीं घोषित किए गए हैं. उन्होंने आज इस पद का सेहरा अपने सिर पर ज़रूर पहन लिया है.

लेकिन भारत में राष्ट्रपति शासन प्रणाली नहीं है.यहाँ वोट पार्टी को दिए जाते हैं. भुज के लालन कॉलेज से दिल्ली के लाल क़िले तक का सफ़र काफी लंबा साबित हो सकता है.

दिल्ली दूर अस्त.

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