सिर्फ रुपया ही नहीं गिर रहा, और भी हैं मुद्राएं

  • 21 अगस्त 2013
रुपया

ऐसा लगता है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपए के भाव में लगातार गिरावट ने भारत सरकार और आर्थिक जगत को चिंता में डाल दिया है.

ज़्यादा परेशान वाली बात ये है कि अमरीकी डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में गिरावट का ये सिलसिला आगे कुछ समय के लिए जारी रहेगा.

रुपए की क़ीमत पर नज़र रखने वाले मुंबई के दलाल स्ट्रीट के विशेषज्ञ दिलीप चोकसी कहते हैं, "मेरे विचार में डॉलर के मुक़ाबले रुपए का भाव 70 रूपए प्रति डॉलर हो जाएगा और ये जल्द ही होगा."

लेकिन ये ख़बर सुन कर आपको थोड़ा इत्मिनान होगा कि मुद्रा संकट के ये बादल भारत की अर्थव्यवस्था पर ही नहीं छाए हैं बल्कि इंडोनेशिया का रुपैय्या भी भारतीय रुपए की तरह नीचे जा रहा है.

ब्राज़ील के रियाल और अर्जेंटीना के पीसो का भी ऐसा ही हाल है.

इन सभी देशों की मुद्राओं की क़ीमत लगातार गिर रही है और दिलीप चोकसी के मुताबिक आनेवाले दिनों में इसके और ज़्यादा गिरने के आसार हैं.

Image caption इंडोनेशिया की मुद्रा रुपैय्या में भी डॉलर के मुकाबले गिरावट आई है.

दरअसल दुनिया की ज़्यादातर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का यही हाल है और इन सभी देशों की समस्याएँ भी मिलती-जुलती हैं.

आयात का बढ़ता हुआ बिल, निर्यात में गिरावट, कमरतोड़ महंगाई और लगभग खाली होते सरकारी खजाने.

इन सभी देशों की सरकारों ने मुद्राओं के भाव में गिरावट को रोकने के लिए मिलते-जुलते क़दम भी उठाए हैं, लेकिन किसी को इस में अब तक कामयाबी नहीं मिली है.

मज़बूत होता डॉलर

दिलीप चोकसी मानते हैं कि इसका ख़ास कारण है अमरीकी डॉलर का लगातार मज़बूत होना और ऊर्जा के आयात का बढ़ता बजट.

उनका कहना है, "विकासशील देशों में आर्थिक विकास के लिए बिजली चाहिए, पेट्रोल चाहिए और कोयला चाहिए. इन्हें आयात करना पड़ता है. उधर इससे डॉलर की मांग बढ़ती है जिससे उसका भाव बढ़ता है और दूसरे देशों की मुद्राओं की कीमत में कमी आने लगती है."

दिलीप चोकसी का ये भी कहना है कि अमरीकी अर्थव्यवस्था की बेहतर होती सेहत के कारण निवेशक इन देशों से पैसे निकाल कर अमरीका में निवेश करने लगे हैं जिसके कारण डॉलर मज़बूत हो रहा है और दूसरे देशों की मुद्राओं के भाव में गिरावट आ रही है.

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ और शेयर दलाल शुभम मेहता कहते हैं, "हर देश के अंदर मौजूद समस्याओं के तार एक दूसरे से जुड़े हैं. रुपए के भाव में गिरावट की वजह से विदेशी निवेशक पैसे निकाल कर देश से जा रहे हैं जिससे शेयर के भाव गिर रहे हैं."

लेकिन कई विशेषज्ञ ये मानते हैं कि मुद्रा संकट अस्थायी है.

लंदन के अख़बार फाइनेंशियल टाइम्स में आर्थिक मामलों के संपादक जेम्स मकिंतोश कहते हैं, "1997 में जब थाइलैंड में मुद्रा संकट आया था तो इसका असर एशिया के दूसरे देशों में भी हुआ था. आज की स्थिति वैसी नहीं है.

मई से अब तक भारतीय रुपए का भाव 16 फीसदी गिरा है जो काफी दुखद है, लेकिन विकासशील देश उस समय के मुकाबले में आज काफी मज़बूत स्थिति में हैं इसलिए मुझे नहीं लगता कि ये एक बड़े संकट में बदलेगा."

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