गोरखालैंड: मौसम की तरह बदलता आंदोलन

  • 24 अगस्त 2013

पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अलग राज्य की मांग को लेकर होने वाले आंदोलन का नाम पहाड़ियों के मौसम की तरह ही पल-पल बदल रहा है. महीने भर से चलने वाले यह आंदोलन अब दार्जीलिंग की ख़ूबसूरत पहाड़ियों, चाय और पर्यटन उद्योग के अलावा इलाक़े के आम लोगों की ज़िंदगी की रौनक़ भी सोख रहा है.

यह शायद देश में अपनी तरह का पहला आंदोलन है जिसका असली मोर्चा फ़ेसबुक पर खुला है. आंदोलन की कमान संभालने वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता इसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपने बयान पोस्ट कर रहे हैं. दूसरी ओर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी उनकी काट के लिए इसी का सहारा ले रही हैं. दरअसल, फ़ेसबुक पर यह लड़ाई ममता ही ले गई थीं. गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को तो मजबूरी में इसका सहारा लेना पड़ा.

दार्जीलिंग पवर्तीय क्षेत्र के लोगों के लिए गोररखालैंड का मुद्दा उनकी पहचान और भावनाओं से जुड़ा है. कालिम्पोंग के दुर्गा छेत्री कहते हैं, ''सरकार को अलग गोरखालैंड बना ही देना चाहिए. तब नेताओं को इसका एहससास हो जाएगा कि अलग राज्य चलाना कोई खेल नहीं है.''

लकिन उनके पड़ोसी जितेन मुखिया कहते हैं, ''हमें तो हर हालत में गोरखालैंड चाहिए. अब हम बंगाल की ग़ुलामी नहीं कर सकते.''

बदलता तरीक़ा

Image caption बंद का मज़ा लेते हुए बच्चे

इस बार गोरखालैंड आंदोलन का तरीक़ा लगातार बदल रहा है. गोरखा मोर्चा ने पहले 72 घंटे का बंद बुलाया. उसके बाद उसे बेमियादी कर दिया. लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट की फटकार के बाद उसने इलाक़े में 'जनता कर्फ्यू' लागू कर दिया.

अदालत और सरकार की ओर से इसे भी अवैध क़रार देने पर संगठन ने पहले इसे 'घर के भीतर जनता' आंदोलन का नाम दिया यानी लोग घरों से बाहर नहीं निकलेंगे. बाद में इसे भी बदल कर 'घर से बाहर जनता' का नाम दिया. इसके तहत लोग घरों से बाहर तो निकल रहे हैं. लेकिन कोई काम नहीं कर रहे हैं. गोरखा मोर्चा के नेता विमल गुरुंग कहते हैं, ''गोरखालैंड की मांग अकेले हम नहीं, बल्कि इलाक़े की पूरी जनता कर रही है. यह सवाल हमारे वजूद और भावनाओं से जुड़़ा है.''

दबाव की रणनीति

ममता सरकार इस आंदोलन के प्रति शुरू से ही दबाव की रणनीति पर बढ़ रही है. उसने संगठन के सात सौ से ज़्यादा नेताओं और समर्थकों को गिरफ़्तार कर लिया है.

गुरुंग कहते हैं कि यह गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) क़रार के प्रावधानों का साफ़ उल्लंघन है.

उन्होंने अब केंद्र सरकार और राज्यपाल एम.के.नारायणन से इस मामले में हस्तक्षेप की अपील की है. अगले महीने से ही पहाड़ियों में पर्यटन की सीज़न शुरू होगा.

गुरुंग चाहते हैं कि उससे पहले यह मुद्दा निपट जाए, वरना इलाक़े का पर्यटन उद्योग बर्बाद हो सकता है. चौतरफ़ा दबाव की वजह से ही मोर्चा ने इलाक़े के स्कूलों को एक सितंबर से बंद और आंदोलन से छूट देने का फ़ैसला किया है. इन स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई 29 जुलाई से ही बंद है. एक स्कूल के प्रिंसिपल कहते हैं, ''शायद मोर्चा नेताओं को अब सद्बुद्धि आ गई है.''

तूफ़ान से उखड़ा आंदोलन

Image caption बंद का व्यापक असर देखा जा रहा है.

इस सप्ताह आए तूफ़ान ने भी आंदोलन के पांव कुछ हद तक उखाड़ दिए हैं. उसने तीन-चार दिनों के लिए आंदोलन में ढील दी है. इस छूट के बाद अब शनिवार और रविवार को पहाड़ियों में एक बार फिर बंद बुलाया गया है.

पूर्व मंत्री और दार्जीलिंग ज़िले के प्रमुख माकपा नेता अशोक भट्टाचार्य कहते हैं, ''यह आंदोलन तृणमूल कांग्रेस की ही देन है. उसी ने पहले मोर्चा नेताओं को सिर पर चढ़ाया. इससे उनके हौसले बढ़ गए हैं. अब सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए थोक भाव में गिरफ्तारियां कर रही है.''

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राज्य सरकार की दबाव की रणनीति, केंद्र की चुप्पी और इलाक़े के लोगों, चाय और पर्यटन उद्योग के दबाव ने गोरखा नेताओं को भारी मुश्किल में डाल दिया है. अब इस स्थिति से निकलने के लिए वह कोई सम्मानजनक रास्ता तलाश रहे हैं.

इलाक़े के आम लोगों, चाय और पर्यटन उद्योग को भी शायद उसी रास्ते की तलाश है.

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