दुनिया की सबसे अनोखी रोल्स रॉयस कानपुर में

कानपुर में रॉल्स रॉयस

विदेशी नागरिकों की एक टीम साल 2006 में अचानक एक दिन कानपुर के तारिक इब्राहिम के बंगले पर पहुंची. अपने घर में अचानक इतने विदेशियों को देख तारिक इब्राहिम हैरान नहीं हुए.

पुरानी कारों के शौकीन अमरीकी और यूरोपीय नागरिक अकसर उनके घर साल 1913 में बनी सिल्वर घोस्ट रोल्स रॉयस कार देखने के लिए आते रहते हैं.

लेकिन उनका अंदाज़ा गलत निकला. ये सभी लोग रोल्स रॉयस कंपनी के बड़े अफसर थे. वे कार देखने नहीं बल्कि उसे खरीदने आए थे. रोल्स रॉयस भारत में अपना पहला शोरूम मुंबई में खोलना चाहती थी. तारिक इब्राहिम की इस कार को उस शोरूम में नुमाइश में रखने के लिए चुना गया था.

उन्होंने तारिक इब्राहिम के सामने एक पेशकश रखी. तारिक इब्राहिम को उनकी कार के बदले रोल्स रॉयस के किसी भी मॉडल की एक नई कार और चार करोड़ रूपए मिल सकते थे. लेकिन तारिक इब्राहिम ने पेशकश ठुकरा दी. उनका कहना था, "वह चीज़ जो दुनिया में अपने तरह की केवल एक ही है, उसकी कीमत कोई कैसे आंक सकता है?"

माना जाता है कि उनकी सिल्वर घोस्ट लिमोज़ीन दुनिया में बची अपनी तरह की एकमात्र कार है. पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट तारिक इब्राहिम ने इस साल 24 जनवरी को बहुत धूमधाम से अपनी कार का 100वां जन्मदिन मनाया.

24 जनवरी 1913 को ये कार रोल्स रॉयस की फैक्ट्री से बनकर निकली थी. इस कार को इंग्लैंड के सेल्सबरी में रहने वाले इंजीनियर हॉरेस एफ पारशल ने 1335 पाउंङ में खरीदा था. इस कार के तारिक इब्राहिम तक पहुंचने और अब तक वजूद में रहने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है.

पूरी कार नहीं सिर्फ चेसिस

तारिक इब्राहिम के मुताबिक 20वीं सदी के शुरुआती दो-तीन दशकों में रोल्स रॉयस सिर्फ चेसिस बनाती थी, खरीददार को बॉडीवर्क खुद बनवाना पड़ता था.

पारशल ने अपनी गाड़ी में लीमोज़ीन बॉडीवर्क करवाया. लीमोज़ीन बॉडीवर्क में धातु के छत और दरवाजे होते थे.

पारशल के अलावा आठ और लोगों ने लिमोज़ीन बॉडीवर्क को अपनाया.

लेकिन साल 1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ गया. ब्रिटिश सेना ने पारशल की कार को छोड़ कर सभी आठ अन्य सिल्वर घोस्ट लिमोज़ीन गाड़ियां ले लीं और उन्हें बख्तरबंद बनाकर युद्ध में इस्तेमाल किया लेकिन सभी गाड़ियां जर्मन सेना के हमले में बर्बाद हो गईं.

पारशल की कार इसलिए बच गई क्योंकि ब्रिटिश सेना ने उन्हें रेलवे लाइन बिछाने का काम सौंपा था और पारशल को इस काम के लिए काफी घूमना पड़ता था. तारिक इब्राहिम कहते हैं, "आज अगर मेरे पास 1913 की सिल्वर घोस्ट रोल्स रॉयस है तो उसका श्रेय पारशल और उनके इंजीनियर होने को जाता है."

विश्व युद्ध ख़त्म होने के एक साल बाद पारशल ने अपनी कार ठेकेदार दोस्त ए स्टीवर्ट को बेच दी. ए स्टीवर्ट ने साल 1920 में कार सर जॉन एंडरसन को बेच दी. साल 1925 में ये कार मेजर जी ओ सैंडी के पास पहुंच गई.

कानपुर कैसे आई कार?

Image caption तारिक इब्राहिम की पत्नी वासिया इब्राहिम के परनाना हाफिज़ मोहम्मद हलीम ने 1928 में ये गाड़ी खरीदी.

तारिक इब्राहिम की पत्नी वासिया इब्राहिम के परनाना हाफिज़ मोहम्मद हलीम ने 1928 में ये गाड़ी खरीदी. हलीम चमड़े के व्यापारी थे और माल ख़रीदने और बेचने यूरोप जाया करते थे.

कुछ समय बाद हलीम ने कार अपने बेटे एसएम बशीर को तोहफे में दे दी. बशीर तब लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ते थे. जब साल 1935 में पढ़ाई ख़त्म करने के बाद वो घर लौटे तो अपने साथ कार भी कानपुर ले आए.

तारिक इब्राहिम कहते हैं, "साल 1935 से ये कार हमारे परिवार के पास है. कुछ साल तक तो इस कार का काफ़ी इस्तेमाल होता रहा, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया दूसरी गाड़ियां खरीदी गईं और सिल्वर घोस्ट को चलाना बंद कर दिया गया."

करीब 10 साल पहले तारिक इब्राहिम ने कार की मरम्मत की बात सोची, लेकिन तब तक कार एकदम खटारा बन चुकी थी. साल 2003-04 के आसपास वो ब्रिटेन के जॉनाथन हार्ले से मिले जो एक कारोबारी की दो रोल्स रॉयस गाड़ियों की मरम्मत के लिए कानपुर आया करते थे. जॉनाथन हार्ले उन गिने-चुने लोगों में से हैं जो पुरानी सिल्वर घोस्ट की मरम्मत करते हैं.

हार्ले ने रोल्स रॉयस एंथुज़ियास्ट क्लब के दस्तावेज़ों की जांच करके बताया कि इब्राहिम की लिमोज़ीन जिसका चेसिस नंबर 2286 है, सबसे पुरानी लिमोज़ीन कार है. रोल्स रॉयस एंथुज़ियास्ट क्लब के सदस्य पुरानी कारों के बारे में छोटी से छोटी जानकारी इकट्ठा करते हैं.

आखिर रोल्स रॉयस को ठीक करने का लंबा सफ़र शुरू हुआ. जॉनाथन हार्ले साल में दो बार कानपुर आते और करीब 15 दिन रूक कर उनकी कार को ठीक करते. गाड़ी के पुर्ज़े खरीदने के लिए तारिक इब्राहिम इंग्लैंड जाया करते थे.

मरम्मत में मुश्किल

तारिक इब्रहिम के मुताबिक गाड़ी के पुर्ज़े जुटाना एक बहुत बड़ा काम है.

वो कहते हैं, "मेरी गाड़ी के रिम लकड़ी के बने थे जिन्हें दीमक खा चुके थे. मैंने नए रिम ढूंढे लेकिन वो नहीं मिले. फिर मैंने सोचा कि किसी कारीगर से रिम बनवा लेता हूं लेकिन कारीगर को पहले रिम दिखाना ज़रूरी था जिससे वो उसकी नकल कर सके. मुझे पता चला कि लंदन के एक शख़्स ने 1913 सिल्वर घोस्ट के रिम अपने ड्राइंग रूम में सजा के रखे हैं. काफ़ी मिन्नतें करने के बाद उन्होंने मुझे रिम दिए."

लेकिन इब्राहिम की मुसीबत अब भी कम नहीं हुई थी. रिम बनाने का काम कठिन था और कोई भी कारीगर रिम बनाने को तैयार नहीं था. बड़ी मुश्किल से कानपुर के जाजमऊ में एक बुज़ुर्ग कारीगर ये रिम बनाने को तैयार हुए.

इब्राहिम कहते हैं, "आज मेरी कार एकदम ठीक है. आप दुनिया में कहीं भी जा सकते हैं." ये पूछने पर कि कार को ठीक कराने में कितना पैसा ख़र्च हुआ तो वो ख़ामोश हो जाते हैं. थोड़ी देर बाद तारिक इब्राहिम कहते हैं, "ये मेरा शौक और जुनून था. मैं तो सिर्फ़ इतना कहूंगा कि मेरी पूरी जमा-पूंजी इसमें लग गई."

तारिक इब्राहिम एक उदाहरण देते हैं, "जब मेरी कार बनी थी तब रोल्स रॉयस में कोई एमब्लम नहीं होता था. बाद की गाड़ियों में एमबल्म लगने लगा. सिर्फ़ उस एमबल्म की कीमत ही ढाई लाख रुपये है."

पिछले 3-4 साल में तारिक इब्राहिम देश की सभी विंटेज कार रैलियों में हिस्सा ले चुके हैं. लेकिन अब उन्हें रैलियों में हिस्सा लेना अच्छा नहीं लगता क्योंकि सभी इनाम उनकी कार को मिल जाते हैं.

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