लोकसभा में पारित हुआ भूमि अधिग्रहण विधेयक

भूमि अधिग्रहण के लिए नए नियम और मुआवज़ा नीति निर्धारित करने वाला 'उचित मुआवज़ा और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक, 2012' लोकसभा में कुछ संशोधनों के साथ पारित कर दिया गया.

ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने विधेयक लोकसभा में पेश किया. विधेयक को दो सर्वदलीय बैठकों के बाद पेश किया गया.

बिल पर बहस के दौरान जयराम रमेश ने कहा कि, "उद्योग जगत इस विधेयक को बहुत कठोर बता रहा है. साथ ही प्रगतिशील संगठन भी इस बिल के लिए मेरी आलोचना कर रहे हैं. दोनों पक्ष बिल की आलोचना कर रहे हैं इसलिए मैं बिल को सही मानता हूँ."

ज़मीन को अधिग्रहण के बजाए लीज़ पर लेने के बारे में उन्होंने कहा, 'हम लीजिंग के विकल्प का प्रावधान विधेयक में दे रहे हैं लेकिन इसकी शर्तें क्या होंगी या ये कैसे किया जाएगा इसका निर्णय राज्यों पर छोड़ा जा रहा है.'

उन्होंने कहा, 'भूमि अधिग्रहण के लिए हर राज्य में एक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा. यदि किसानों की शिकायतों का इस प्राधिकरण में भी निस्तारण नहीं होता है तो वे इसके ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में भी अपील कर सकते हैं.'

पुराने क़ानून का हुआ दुरुपयोग

Image caption भूमि अधिग्रहण के लिए हर राज्य में एक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा.

विधेयक पर अपने भाषण के दौरान जयराम रमेश ने कहा कि मैं इस बात से सहमत हूँ कि 1894 के क़ानून का जो दुरुपयोग हुआ है वह भारी तौर पर अर्जेंसी क्लॉज़ (आपात स्थिति) के नाम पर हुआ है. इसलिए अर्जेंसी क्लॉज़ की परिभाषा बिल में शामिल की गई है. अर्जेंसी क्लॉज की परिभाषा को 'राष्ट्रीय सुरक्षा' और 'प्राकृतिक आपदा' तक ही सीमित किया गया है. इन दो परिस्थितियों में ही इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा.

बिल के पहले अधिग्रहित की गई ज़मीनों पर लागू करने संबंधी माँग पर स्पष्टीकरण देते हुए जयराम रमेश ने कहा कि जहाँ अवॉर्ड पास नहीं हुआ है वहाँ ये नया क़ानून लागू होगा. अगर अवॉर्ड पास हुआ है और मुआवज़ा नहीं दिया गया है और भौतिक कब्ज़ा नहीं किया गया है तब ये नया क़ानून लागू होगा. जहाँ अवॉर्ड पास हुआ है और 50 प्रतिशत किसानों ने मुआवज़ा नहीं लिया है वहाँ भी यह क़ानून लागू होगा.

सदन में बिल पर बहस के दौरान राष्ट्रीय जनता दल पार्टी के नेता लालू प्रसाद यादव ने कहा, "जो बिल आया है बहुत क्रांतिकारी है. संसद समय-समय पर इसमें सुधार भी करेगी. जनहित के लिए अधिग्रिहत की जाने वाली ज़मीन को भी उचित मुआवज़ा देकर लिया जाना चाहिए. हम इस बिल का पुरजोर समर्थन करते हैं."

भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा, "मैं यह सुझाव देना चाहता हूँ कि बिल में ये प्रावधान होना चाहिए की ज़मीन लीज़ पर की जाए या उसका अधिग्रहण किया जाए इसका फ़ैसला भी किसानों की सहमति से ही होना चाहिए. भूमि अधिग्रहण एक बहुत ही संवेदनशील प्रश्न है. किसानों के लिए बिल को हितैषी बनाने की कोशिश की जाए."

सर्वसहमति

Image caption किसानों ने गुरुवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर बिल के विरोध में प्रदर्शन किया

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बिल पर कोई टिप्पणी करने से इंकार करते हुए कोलकाता में पत्रकारों से कहा, "हम ज़मीन के जबरदस्ती अधिग्रहण के ख़िलाफ़ हैं. ज़मीन के मामलों में हक़ीक़त को हमशे बेहतर कोई नहीं जानता. इस मामले में हमारी नीति पारदर्शी है. हम लोगों को दिखाने के लिए ज़मीन का अधिग्रहण नहीं करते. हम अधिग्रहण के नीति में विश्वास नहीं रखते हैं."

इस महत्वपुर्ण मुद्दें पर सर्वसहमति बनाने के सरकार के प्रयासों के तहत हुई दो सर्वदलीय बैठकों के बाद विपक्ष द्वारा प्रस्तावित संशोधनों को बिल में शामिल कर लिया गया. कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए संशोधनों में लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज द्वारा प्रस्तावित संशोधन भी शामिल है. सुषमा ने सुझाव दिया था कि भूमि अधिग्रहण की जाने के बजाए डेवलपर्स को लीज़ पर दी जानी चाहिए ताकि किसानों के पास आय का साला स्त्रोत बना रहे.

सुषमा स्वराज ने बिल को लोकसभा में सितंबर 2011 में पेश किए जाने के बाद से अधिग्रहित की गई भूमि पर भी लागू करने का सुझाव दिया था जिसे कैबिनेट ने मंजूरी दे दी.

इस नए विधेयक के बाद किसानों की ज़मीन जबरदस्ती अधिग्रहित नहीं की जा सकेगी साथ ही उन्हें उचित मुआवज़ा मिलना सुनिश्चित किया जा सकेगा.

खाद्य सुरक्षा बिल के बाद लोकसभा में पेश किए गए इस अहम बिल के पेश किए जाने के दिन कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी लोकसभा में कुछ ही देर के लिए उपस्थित रहे.

ज़्यादातर पार्टियों ने बिल का समर्थन किया. लेफ्ट ने सदन में कहा कि वे बिल का तो समर्थन करते हैं लेकिन संसदीय कमेटी द्वारा बिल के अध्ययन का प्रस्ताव रखते हैं.

कमज़ोर बिल

Image caption सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर कहती हैं ये क़ानून क़मज़ोर है.

बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह से बातचीत में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि सरकार ने अच्छा बिल लाने का मौका गवा दिया है. मेधा मानती हैं कि एक कमज़ोर बिल लाया जा रहा है.

मेधा ने कहा, "1894 का अंग्रेजों का क़ानून तो खत्म होना ही चाहिए था लेकिन उसकी जगह पर जो विकास नियोजन का क़ानून लाने की पूरी संभावना थी उसे न लाते हुए एक कमज़ोर सा बिल आ रहा है. लोकसभा की स्टैंडिंग कमेटी में सर्वदलीय सहमति होने के बावज़ूद भी कमेटी की सिफ़ारिशों को लागू नहीं किया गया है. जो इस बिल पर ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स बना जिसमें वित्त मंत्री, कृषि मंत्री और वाणिज्य मंत्री शामिल थे उन्होंने ही इस बिल को कमज़ोर किया है. हमारा मानना है कि इस मसौदे में निजी योजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण बिलकुल बंद होना चाहिए था."

खेती की ज़मीन के अधिग्रहण पर उन्होंने कहा, "ख़ेती की ज़मीनों का अधिग्रहण बिलकुल बंद किया जाना चाहिए था. साथ ही देश में भूमि अधिग्रहण के लिए मौजूद अन्य क़ानूनों को भी इसके दायरे में लेना चाहिए था. हमें लगता है कि इसका दायरा बहुत ही छोटा है. पुनर्वास को भी सरकार ने नक़द तक सीमित कर दिया गया है. बिल में सार्वजनिक हित की परिभाषा भी बहुत स्पष्ट नहीं की गई है. मुझे लगता है कि यूपीए ने एक अच्छा क़ानून लाने का मौका गंवा दिया."

मुआवज़े की राशि बढ़ाने पर मेधा ने कहा, "अधिक मुआवज़े का मतलब पुनर्वास नहीं होता है. पुनर्वास के नाम पर मुआवज़ा बढ़ाना या अधिकाधिक लालच देकर लोगों की जीविका का साधन छीनने की साज़िश अधिकारी, कंपनियाँ या सरकार भी कर सकती है. सरकार को ये ध्यान रखना चाहिए की आजीविका के साधन लोगों के हाथ में रहें."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार