सरकार एक हाथ से देती है दूसरे से ले लेती है

Image caption भारतीय अर्थव्यवस्था संकट के दौर में

शुक्रवार को संसद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि इस वित्तीय साल में भारत की जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद साढ़े पांच प्रतिशत के आस पास होगा लेकिन 'हम देख रहे हैं कि पिछली तीन तिमाही यानी कि नौ महीने से जीडीपी चार-साढ़े चार फ़ीसदी के आस-पास है वो पांच फ़ीसदी तक नहीं पहुंच पा रहा है.'

उद्योग क्षेत्र में भी आंकड़ा गिर गया है. इसलिए मुझे नहीं लगता कि चालू वित्तीय वर्ष में जीडीपी साढ़े पांच फ़ीसदी तक बढ़ सकेगा. इस साल बारिश अच्छी हुई है और मान लिया जाए कि आने वाले छह महीनों में जीडीपी अच्छी रफ़्तार से बढ़ेगी.

हालांकि ये भी बहुत आशावादी सोच है लेकिन अगर ऐसा होता हो तो भी साल के अंत तक साढ़े पांच फ़ीसदी जीडीपी होनी बहुत मुश्किल है.

मुझे लगता है कि चालू वित्त वर्ष में जीडीपी साढ़े चार फ़ीसदी के आस-पास रहेगा.

सरकार के लिए संकट की स्थिति बन गई है. विदेशी निवेशक तो भूल जाएं, हमारे अपने देश के निवेशकों का भी सरकार पर विश्वास ख़त्म हो गया है. वे सरकारी की बात पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं हैं कि सरकार जो भी कह रही है वो सच होंगे कि नहीं.

सरकार कह रही है कि हमें वित्तीय घाटा कम करना है, सब्सिडी कम करना है, मुद्रास्फ़ीति कम करना है. लेकिन अगर आप सब्सिडी कम कर देंगे तो मुद्रास्फीति के ऊपर कैसे अंकुश लगाएंगे.

विश्वास में कमी

Image caption बढ़ती महंगाई ग़रीबों की कमर तोड़ रही है

सरकार बार बार कह रही है कि विदेशी निवेशक आ जाएंगे, देश के लोग निवेश करना शुरू कर देंगे लेकिन हमारे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री चाहे कुछ भी कहें लोग उनकी बात पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं हैं.

आने वाले महीनों में दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम में चुनाव होने वाले हैं और फिर आम चुनाव में भी ज़्यादा दिन बाक़ी नहीं हैं तो इस समय अर्थव्यवस्था के साथ राजनीति जुड़ जाती है.

सरकार ने खाद्य सुरक्षा बिल राज्यसभा में पास करा लिया है, भूमि अधिग्रहण बिल भी जल्द ही आने वाला है.

सरकार कहेगी कि हम ग़रीब के लिए इतना कुछ कर रहे हैं और विपक्षी पार्टियां कहेंगी कि इससे वित्तीय घाटा बढ़ेगा लेकिन एक बात जो सबसे अहम है वो ये कि मुद्रास्फीति और खाद्यान की क़ीमत बढ़ने से सबसे ज़्यादा असर ग़रीब पर पड़ता है.

सरकार कहेगी कि खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत हम चावल तीन, गेहूं दो और बाजरा-ज्वार एक रूपए किलो देंगे लेकिन आप एक हाथ से जो दे रहे हैं, मुद्रास्फीति के कारण दूसरे हाथ से ले रहे हैं क्योंकि फल, सब्ज़ी, तेल, दाल, चीनी आदि की क़ीमतें बढ़ रही हैं. इसलिए आम आदमी ज़रूर सोचेगा कि सरकार ने कितना दिया और कितना ले लिया.

Image caption डॉलर की तुलना में रूपए की गिरती क़ीमत समस्या को और गंभीर बना रही है.

मुद्रास्फीति ऐसी चीज़ है कि जिससे हर व्यक्ति की जेब पर असर पड़ता है.

गिरावट के कारण

भारत में ग़रीब और अमीर के बीच सदियों से दूरी रही है और मुद्रास्फीति के कारण ये दूरी और भी बढ़ जाती है. इससे हम सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता भी हमें देखने को मिलता है.

मैं इतना आशावादी नहीं हूं कि जीडीपी फिर साढ़े पांच-छह फ़ीसदी की दर से बढ़ना शुरू कर देगा, मुद्रास्फ़ीति कम होगा, बेरोज़गारी कम होगी और निवेशक जल्द ही वापस आ जाएंगे.

आज भारतीय अर्थव्यवस्था जिस संकट से गुज़र रही है उसके लिए कुछ हद तक तो विदेशी कारक ज़िम्मेदार हैं लेकिन ये दरअसल मनमोहन सिंह सरकार की पिछले कुछ सालों से चली आ रही नीतियों का असर है.

सरकार की कुछ ग़लत नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था ऐसी जगह पहुंच गई है जहां उसने संकट का रूप धारण कर लिया है.

(बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत पर आधारित.)

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