वो इंसान जो दे रहा है वेदांत को टक्कर

डोंगरिया कोंध आदिवासियों का जीवन

ओडिशा के नियमगिरि में हाल में ही ख़त्म हुई ग्राम सभा की बैठकों में एक शख़्स लगभग हर बैठक में नज़र आए.

कभी डोंगरिया कोंध आदिवासियों के पारंपरिक लिबास और आभूषणों में – नाकों में दो नथ, उम्र के साथ हल्के हो रहे लंबे बालों में तांबे की हेयर क्लिप, गले में लाल, पीले, नीले और दूसरे रंगों के मनकों की माला.

कई बार महज़ लुंगी और शर्ट पहने. हाँ, कंधे पर चमकती हुई कुल्हाड़ी हमेशा मौजूद होती है.

डोंगरिया आदिवासियों का जीवन

ये लोद्दो सिकोका हैं – डोंगरिया कोंध आदिवासियों के सबसे बड़े नेता.

वो डोंगरिया कोंध जो सिर्फ़ ओडिशा के दो ज़िलों – रायगढ़ा और कालाहांडी में पाए जाते हैं. उनकी तादाद अब महज़ आठ हज़ार रह गई है.

कहाँ से आए डोंगरिया

एक अवधारणा के मुताबिक़ डोंगरिया कोंध का तालुक्क़ प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड हैं – यानी उनका तालुक्क़ उस समूह से है जो एक लाख साल पहले अफ़्रीक़ा से विश्व के दूसरे हिस्सों की तरफ़ निकला था.

नाम के मुताबिक़ सिर्फ़ 'डोंगर' यानी पहाड़ों में पाए जाने वाले डोंगरिया कोंध को एक खनन परियोजना के कारण अपने अस्तित्व और आस्था पर ख़तरा मंडराता दिख रहा है.

वेदांता को झटका

ये खनन परियोजना लंदन शेयर बाज़ार में 'लिस्टेड' 15 अरब डॉलर की वेदांता कंपनी की है जो अपने एल्यूमीनियम तैयार करने वाले कारख़ाने के लिए नियमगिरि पर्वत खोदकर कच्चा माल बॉक्साइट निकालना चाहती है.

इस परियोजना के ख़िलाफ़ चली मुहिम में लोद्दो सिकोका उसमें सबसे आगे आगे रहे और ग्राम सभाओं की बैठकों की तैयारी में उनकी बड़ी भूमिका रही.

ये ग्राम सभाएं सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तैयार की गई थीं और सभी बारहों सभाओं ने सर्वसम्मति से वेदांता की परियोजना को रद्द कर दिया.

दख़लअंदाज़ी

मेरी मुलाक़ात लोद्दो सिकोका से ऐसी ही बैठकों के दौरान हुई थी.

जिन्हें इस रायशुमारी के लिए बुलाया गया था कि क्या वेदांता की खनन परियोजना आदिवासियों के धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आस्थाओं में दख़लअंदाज़ी होगी?

डोंगरिया कोंध मानते हैं कि दक्षिणी ओडिशा के 240 वर्ग किलोमीटर में फैला नियमगिरि पर्वत उनके पूर्वज हैं.

वो नियमगिरि को अपना भगवान मानते हैं.

लोद्दो से जब मैंने एक बैठक में इस बारे में पूछा तो वो बोले कि ‘ये पहाड़ हमारा जीवन’ है.

वो बोले, "हम इस पहाड़ पर आश्रित हैं. ये कंपनियां हमें सही प्रगति नहीं दे सकतीं. जो पैसे वो हमें देती हैं वो सारा जीवन हमारा साथ नहीं दे सकते..."

चंद दिनों पहले जब प्रगति, विकास और और उसके नए आयामों की बात हो रही थी तो जिन्हें बुद्धिजीवियों की श्रेणी में माना जाता है उनमें से एक व्यक्ति ने बातों के दौरान यही सब कहा था.

माओवाद का आरोप

लेकिन फिर भी अगर ये कंपनियां यहां आती हैं तो आदिवासी क्या करेंगे, मैंने उनसे जानबुझकर पूछा.

उनका कहना था कि वो भुबनेश्वर जाएंगे, दिल्ली जाएंगे, सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे.

पहाड़ के वंशज

लेकिन मुझे तो बताया गया था कि लोद्दो को पुलिस ने माओवादी होने के नाम पर जेल में डाल दिया था! ये व्यक्ति तो क़ानून का ही सहारा लेने की बात कर रहा है!

मुझे लगा इस व्यक्ति से सीधे-सीधे पूछ लिया जाए. तो मैंने पूछ ही डाला आपको तो माओवादी होने के नाम पर जेल में डाला गया था.

लोद्दो बोले, "जबसे वेदांता कंपनी आई है और हमने उसका विरोध करना शुरू किया है, हमारी पुलिस ही हमें माओवादी होने के नाम पर पीटती है. हमारी मां-बहनों के साथ छेड़छाड़ होती है."

जान को ख़तरा

वो कहते हैं, "हम माओवादी नहीं हैं. उनके पास तो ग्राम सभा में आने की हिम्मत नहीं है, पुलिस स्टेशन जाकर बात करने की ताक़त नहीं, वो गवर्नर के पास नहीं जा सकते, केंद्र में जाने की नहीं सोचते."

दक्षिण ओडिशा के इस इलाक़े में सक्रिय माओवादी चाहते थे कि ग्रामीण इन सभाओं का बायकॉट करें लेकिन लोद्दो सिकोका जैसे आदिवासी नेताओं का कहना था कि जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अपनी बात कहने का मौक़ा दिया है तो उन्हें इसका फ़ायदा उठाना चाहिए.

खनन का प्रस्ताव

लोगों ने मुझे बताया कि पिछले दो महीनो के भीतर लोद्दो ने लगभग हर दिन या एक दो दिनों के अंतराल पर पहाड़ के लंबे कठिन रास्तों को तय किया - गांव वालों को ग्राम सभा की बैठकों के लिए तैयार करवाने को.

कई लोगों का विचार है कि इन डोंगरिया कोंध आदिवासी नेता को अब दोहरा ख़तरा झेलना पड़ रहा है.

माओवादियों के बायकॉट की बात उन्होंने अनसुनी कर दी और पुलिस तो पहले भी उन पर नक्सल होने का आरोप लगा चुकी है.

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