क्या है मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों की राजनीति

मुज़फ़्फ़रनगर दंगे

सांप्रदायिक दंगे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए नई बात नहीं हैं. गन्ने के खेती के लिए मशहूर यह इलाका तुलनात्मक रूप से समृद्ध है. इस इलाके में बड़े काश्तकारों का वर्चस्व रहा है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट और गुर्जर समुदाय राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय रहा है.

चौधरी चरण सिंह की विरासत को बाद में अजित सिंह, महेन्द्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने आगे बढ़ाया.

जिस इलाके का कोई एक समुदाय ताकतवर हो तो दूसरे तबके पर भी एकजुट होने का दबाव बढ़ जाता है.

बदले हालात

परंपरागत रूप से जाटों को सबसे ज्यादा चुनौती जाटव समुदाय से मिलती रही है. दलित जाटव समुदाय मुख्यतः चमड़े के काम से जुड़ा रहा है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सालों तक पंचायती/स्थानीय न्याय का बोलबाला रहा है. दोनों समुदाय के युवा लड़के-लड़कियों के घर से भाग जाने के भयानक दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. यहाँ तक कि उन्हें उनके परिवार की सहमति के साथ फाँसी पर भी चढ़ाया जा सकता है.

जातीय तनाव के बावजूद इस समुदायों के बीच शायद ही कभी दंगे होते हैं. पंचायतें इस बात को लेकर सचेत रहती हैं कि दंगों से किसी भी समुदाय का भला नहीं होता.

लेकिन जानकारों के अनुसार साल 2013 आने तक यह स्थिति बदल चुकी है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँवों में अब भी जाटों का वर्चस्व है लेकिन उनके प्रतिपक्ष का स्थान जाटवों की जगह मुसलमानों ने ले लिया है.

दंगे

हाशिमपुरा और मलियाना के मुसलमानों के साथ राज्य पुलिस और प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टैबुलरी (पीएसी) ने जो किया था उसकी डरावनी कहानियां 1980 के दशक में आम थीं.

मेरठ और मोदीनगर के कस्बाई बाहरी इलाकों में हुए दं गों के बाद मामले को बराबर करने के लिए पीएसी ने मुस्लिम युवाओं को उनके घरों से घसीटकर निकाला.

उन्हें गंग नहर के किनारे एक कतार में खड़ा करके मार दिया और उनकी लाश को नहर में बहा दिया. गन्ना उत्पादन वाले इस इलाके में गंग नहर कहीं-कहीं तो नदियों की तरह चौड़ी है.

इस इलाके के मुस्लिम भी काफी प्रभावशाली हैं और पीतल उद्योग पर उनका पूरा वर्चस्व है.

मुसलमानों ने उस समय इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई. कुछ दिनों तक सबकुछ शांतिपूर्ण रहा.

1980 के दशक में मुख्यतः शहरी इलाकों में हुए हिन्दू-मूस्लिम दंगों के बाद उत्तर प्रदेश में इस कदर व्यापक हिंसा वाले दंगे नहीं हुए.

राजनीति

आखिरकार 2013 के अगस्त-सितंबर आते-आते पश्चिमी यूपी में क्या बदलाव आ गया? पिछले कुछ महीनों में यूपी और बिहार के कई हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव की ख़बरें आई हैं.

इन ख़बरों के साथ ही केन्द्र की राजनीति में नरेन्द्र मोदी की बढ़ती भूमिका की ख़बरें भी आती रही हैं.

यूपी में इस बात की चर्चा बढ़ती जा रही है कि नरेन्द्र मोदी केन्द्र में भाजपा की वापसी के लिए यूपी को अपना आधार बना सकते हैं.

देश का कोई भी मुसलमान 2002 में गुजरात में हुए दंगों को नहीं भूला है. आम चुनावों के नजदीक आते ही पूरे देश के मुसलमान तनावग्रस्त और आशंकित हैं.

इसके परिणामस्वरूप मुस्लिमों में अपना दबदबा दिखाने की ललक बढ़ी है.

दूसरी तरफ बहुसंख्यक तबके में भी मुस्लिमों को उनकी हैसियत बताने का भाव बढ़ा है. यूपी के हालिया दंगे कैसे और कब शुरू हुए यह नहीं पता है. जो भी संभावित कारण हों लेकिन यह तनाव मुख्यतः जाटों और मुस्लिमों के बीच प्रतीत हो रहा है.

इन घटनाओं से पहले भी पंचायतें बुलाईं गई थीं. दोनों समुदायों के बीच संबंध बनते-बिगड़ते प्रतीत हो रहे थे.

मामले में नया मोड़ तब आया जब पुलिस ने कथित रूप से एक समुदाय के लड़कों को गिरफ्तार कर लिया.

इससे ऐसा संदेश गया कि प्रदेश सरकार आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए जानबूझकर एक समुदाय के लड़कों को नहीं पकड़ रही है.

इससे यूपी में अभूतपूर्व सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया.

सेना

इस इलाके के दलित कार्यकर्ता रामकुमार बताते हैं, "बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद 1992 में फैले चरम सांप्रदायिक तनाव के समय भी राज्य सरकार को सेना नहीं बुलानी पड़ी थी. सांप्रदायिक तनाव के समय राज्य में पहली बार सेना को बुलाया गया है."

"इसका अर्थ है कि राज्य सरकार को लगता है कि स्थानीय पुलिस और पीएसी की जगह किसी और जरूरत है. ताजा हिंसा में मारे गए और लापता लोगों के आंकड़ों की तुलना करें तो दोनों में बहुत अंतर है. आधिकारिक तौर पर 28 लोग मरे हैं और सैकड़ों लापता हैं. हमें नहीं पता कि लापता लोग कौन हैं और कहाँ हैं."

रामकुमार के अनुसार, "हालिया तनाव जाटों और मुसलमानों के बीच है. दूसरे समुदाय अपने घरों में चुपचाप बैठे हैं और तमाशा देख रहे हैं. मुस्लिमों को उनकी औकात दिखाने की सोच हावी है. पहले यह शहरी इलाके में होता था. गाँव के इलाकों में हिंसा फैलने से पता चलता है कि यह भावना हमारी सोच से ज़्यादा गहरी होती जा रही है."

लखनऊ के राजनीतिक कार्यकर्ता रमेश दीक्षित कहते हैं, "मुझे समझ नहीं आता कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार को दंगों के फैलने से क्या फायदा होगा."

रमेश कहते हैं, "राज्य की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है और अगर यह फ़साद बढ़ता है तो इससे राज्य सरकार की साख ख़राब होगी."

यह सच है कि समाजवादी पार्टी को मुस्लिम हितों के लिए काम करने वाले दल के रूप में देखा जाता है.

चुनावी लाभ के लिए "मुसलमान ख़तरे में हैं" का कार्ड समाजवादी पार्टी पहले भी खेल चुकी है.

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का शोर जितना बढ़ता जा रहा है समाजवादी पार्टी लगातार अपने ख़ास अंदाज में मुसलमानों को आने वाले राजनीतिक ख़तरे के प्रति सचेत और आगाह कर रही है.

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