छत्तीसगढ़: पुलिस नक्सलियों से डर तो नहीं रही?

छत्तीसगढ़ सरकार की राज्य पुलिस

छत्तीसगढ़ में सरकार ने ऐसे 15 पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया है जिन्होंने कथित तौर पर नक्सल प्रभावित इलाकों में जाने से इंकार कर दिया था.

इनमें 12 थाना प्रभारी और 3 सब इंस्पेक्टर शामिल हैं. कुछ दिन पहले ही इन सबका तबादला नक्सल प्रभावित बस्तर, सुकमा, नारायणपुर, कांकेर, राजनांदगांव और दंतेवाड़ा जिले में किया गया था लेकिन इनमें से किसी ने भी इन इलाकों में जाकर प्रभार नहीं लिया.

मरते दम तक संघर्ष

राज्य में पुलिसकर्मियों के लिये अपने सेवाकाल में कम से कम 5 साल नक्सल इलाकों में पदस्थ रहने के नियम हैं.

राजपत्रित अधिकारियों के लिये यह अवधि तीन साल है लेकिन जैसे ही पुलिस जवान या अधिकारियों का तबादला नक्सल इलाकों में होता है, कई पुलिसकर्मी अपना तबादला रद्द करवाने में जुट जाते हैं. ऐसा कई-कई बार हुआ है जब नक्सल इलाकों में पदस्थापना के ख़िलाफ़ मामला हाईकोर्ट तक जा पहुंचा है.

छत्तीसगढ़ में यह पहला अवसर नहीं है जब नक्सल इलाकों में तबादला किये जाने पर निलंबन की गाज गिरी हो. राज्य में सैकड़ों ऐसे मामले प्रकाश में आ चुके हैं जब नक्सल प्रभावित इलाकों में तबादला होने पर पुलिसकर्मियों ने नौकरी से ही इस्तीफ़ा दे दिया.

'वन टाइम प्रमोशन स्कीम'

माना जाता है कि नक्सलियों के डर के कारण पुलिस के जवान नक्सल इलाकों में जाने से बचते हैं. हालांकि राज्य के पुलिस महानिदेशक रामनिवास इससे इंकार करते हैं. उनका कहना है कि पुलिस में जो आया है, उसे तो हर जगह जाना होगा.

कितनी गंभीर है सरकार

गृहविभाग के आँकड़े बताते हैं कि बस्तर में नक्सलियों के ख़िलाफ़ सलवा जूडूम शुरु होने के बाद से नक्सलियों और पुलिस के बीच संघर्ष के मामले में तेजी से इज़ाफा हुआ है. इस दौरान बस्तर संभाग में पुलिस की नौकरी छोड़ने वालों का आंकड़ा भी बढ़ा है.

2006 से जनवरी 2013 तक कम से कम आठ अधिकारियों ने बस्तर में पुलिस की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया है. नक्सल प्रभावित बस्तर में इस्तीफ़ा देने वाले अर्धसैनिक बल के जवानों की संख्या 138 है. जिला पुलिस बल के 75 से अधिक जवान और पाँच पुलिस अधिकारियों ने भी अपनी नौकरी से ही तौबा कर ली.

फरवरी 2013 तक बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों में अपनी ड्यूटी से लापता रहने वाले अर्धसैनिक बल के जवानों की संख्या 140 थी. वहीं जिला बल के 78 जवान और छह अधिकारियों ने भी अपने नए पद का कार्यभार नहीं संभाला.

नक्सलियों का डर

हालत ये है कि दो साल पहले नक्सल प्रभावित इलाकों में नियुक्ति के लिये सामान्य सिपाहियों को सीधे सब-इंस्पेक्टर के पद पर 'वन टाइम प्रमोशन स्कीम' का प्रस्ताव दिया गया था.

आम तौर पर इस पदोन्नति को पाने में 20-20 साल तक लग जाते हैं.

माओवादियों की चिट्ठी

लेकिन नक्सलियों का खौफ इस कदर हावी है कि इस 'वन टाइम प्रमोशन स्कीम' के 399 पदों के लिये आवेदन करने वालों के लाले पड़ गए.

इस योजना के तहत कुल 164 पद ही भरे जा सके.

राज्य के पुलिस महानिदेशक रामनिवास कहते हैं, "जो पुलिस में आया है, वह हर जगह जायेगा. आप भी जा रहे हैं, हम भी जा रहे हैं. जवानों में कोई डर नहीं है. ऐसा तो हरेक नौकरी में होता है. तबादला होने पर ऐसी कोशिश होती ही है कि जहां हैं, वहीं रहें. इसे नक्सलियों के डर से जोड़ना ठीक नहीं है."

राज्य का सहयोग

हालांकि पूर्व आईपीएस अधिकारी, उत्तरप्रदेश के पुलिस महानिदेशक और सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रहे प्रकाश सिंह का कहना है कि इस मामले में नक्सलियों का खौफ़ और काम करने की गड़बड़ परिस्थितियां दोनों ही ज़िम्मेदार हैं.

नक्सली समस्या

पुलिस सुधार के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले प्रकाश सिंह कहते हैं, "जब पुलिसकर्मी को राज्य का पूरा सहयोग होता है और उसे लगता है कि हमारे पीछे पूरी सरकार है और अनजाने में कोई गलती होने पर भी सरकार सहयोग करेगी और अगर हमें कुछ हो जाता है तो सरकार हमारे पूरे परिवार का ध्यान रखेगी, उस स्थिति में तो वह मरने-मारने को तैयार हो जाता है. लेकिन जहां ऐसा नहीं है, वहां स्थितियां दूसरी होती हैं."

प्रकाश सिंह कहते हैं, "छत्तीसगढ़ में बहुत से इलाके ऐसे हैं, जहां बुनियादी सुविधाएँ बहुत ही खराब हैं. वहां पर सुरक्षा व्यवस्था अच्छी नहीं है. राशन आपूर्ति की व्यवस्था अच्छी नहीं है, बाहरी दुनिया से संचार व्यवस्था ठीक नहीं है. तो उन्हें लगता है कि सरकार हमें जंगल में भेज देती है और हम हुकुम पालन करने के लिये चले आते हैं. हमें कोई पूछने वाला नहीं है... ऐसे में बहुत से लोग कहते हैं कि भई बवाल को छोड़ो, चलो इस्तीफ़ा दो और घर जाओ."

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