दिल्ली सामूहिक बलात्कार के बाद बदला भारत?

  • 11 सितंबर 2013
दिल्ली, गैंगरेप, विरोध

दिल्ली में पिछले साल दिसंबर में एक बस में गैंग रेप के मामले में चार लोगों को दोषी पाया गया है.

इस घटना के सामने आने के बाद देश भर में गुस्से की लहर दौड़ गई थी और रेप के खिलाफ कड़े क़ानून तैयार किए गए.

लेकिन क्या सच में रेप की इस घटना के बाद कुछ बदला.

इस बारे में बीबीसी ने बात की कुछ जाने-माने लोगों से.

नीलांजना रॉय, उपन्यासकार

जब देश में दिसंबर में जोरदार प्रदर्शन हो रहे थे तो इसकी तीव्रता हैरान करने वाली थी, ऐसा लग रहा था कि इस हादसे के बाद देश बदलाव के लिए एक क्रांति की ओर बढ़ रहा है.

जब विरोध प्रदर्शन शांत हो गए, तो अलग तरह के बयानों की बाढ़ आ गई. महिलाओं की आज़ादी पर रोक की भी बातें हुईं.

हकीकत ये है कि अब भी महिलाओं के अधिकारों को अनदेखा किया जा रहा है.

हमें इसकी जड़ में जाना चाहिए. पैदाइश से पहले ही बालिका भ्रूण को खत्म कर दिया जाता है. लड़कियों को अवांछित समझा जाता है.

Image caption कविता कृष्णन का कहना है कि दिल्ली बलात्कार केस के बाद लोगों का सड़क पर उतरना बड़ी बात थी.

घरों में उनसे अभद्रता और हिंसा आम बात है. इससे खुद-ब-खुद लड़के और लड़कियों दोनों पर असर पड़ता है, जो आखिरकार रेप कल्चर को बढ़ावा देता है.

हालांकि मैं प्रभावित हूं कि उस देश में जहां मुद्दे टीवी चैनलों की तरह बदल जाते हैं, वहां अभी बलात्कार और हिंसा पर चर्चा थमी नहीं है.

कविता कृष्णन , राजनीतिक कार्यकर्ता

इस घटना के विरोध में जिस तरह छात्र और तमाम समुदायों के लोग सड़कों पर उतरे, वो वाकई बड़ी बात थी.

वो युवाओं की स्वत:स्फूर्त और ईमानदार प्रतिक्रिया थी.

इस विषय पर स्कूलों और कॉलेजों में काफी चर्चाएं हो रही हैं. छात्र महिला आंदोलन के इतिहास के बारे में पढ़ रहे हैं, बहस कर रहे हैं.

वो खुद के अंदर झांककर देख रहे हैं कि किस तरह से मौजूदा हिंसा और महिलाओं के खिलाफ पक्षपात को खत्म कर सकते हैं. हां, सरकार और संस्थाओं का रुख निराश करने वाला है.

Image caption वरिष्ठ वकील करुणा नंदी के मुताबिक सज़ा दिलाने की प्रक्रिया भी मुस्तैद होनी चाहिए.

पिछले महीने मुंबई में 22 साल की फोटो जर्नलिस्ट के साथ गैंग रेप के बाद शहर के पुलिस प्रमुख का ये बयान बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि, 'बलात्कार इसलिए होते हैं क्योंकि महिलाएं सार्वजनिक तौर पर चुंबन करती हैं और ये घटनाएं स्वच्छंद संस्कृति का नतीजा है.'

हमें ऐसा बोलने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की ज़रूरत है. महिलाओं को भयमुक्त आज़ादी चाहिए. हमें ये न बताएं कि क्या पहनें बल्कि पुरुषों को बताया जाए कि महिलाओं से बलात्कार मत करो.

करुणा नंदी, वकील

दिसंबर के बाद से बलात्कार क़ानूनों में सुधार महिलाओं के खिलाफ अपराध से निपटने में ज़्यादा सक्षम हैं.

हां, कल्चर में भी बदलाव आया है. छोटे स्तर पर लोगों को शिक्षित करने के अभियान चल रहे हैं. हालांकि सरकार और सार्वजनिक सिस्टम ने इसे नहीं अपनाया है.

दिल्ली पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि 15 अगस्त 2013 तक रेप के 1036 मामले हुए जबकि पिछले साल इसी दौरान 433 मामले दर्ज किए गए थे.

कहा जाना चाहिए कि क़ानून बनाने से ही कुछ नहीं होगा बल्कि अपराधियों को सज़ा दिलाने वाली प्रक्रिया भी मुस्तैद हो.

भारत में जजों की संख्या बहुत कम है. आबादी की तुलना में पुलिस कम है. पुलिस और वकीलों की लापरवाही व अक्षमता से अपराधी छूट जाते हैं.

नीरज कुमार, पूर्व पुलिस आयुक्त, दिल्ली

मैं सोचता हूं कि दिल्ली में उस बलात्कार के मामले के बाद पुलिस को जानबूझकर निशाना बनाया गया.

Image caption नीरज कुमार मानते हैं कि दिल्ली बलात्कार केस के बाद पुलिस को जान बूझकर निशाना बनाया गया.

मैं उस समय पुलिस कमिश्नर था. हमने 72 घंटे में पूरे भारत से सभी संदिग्धों को गिरफ्तार किया-उस इलाके से भी जहां माओवादी विद्रोही सक्रिय हैं.

इसके बाद भी हमारी कमियां निकाली जाती रहीं.

पुलिस को निशाना बनाने से हल नहीं निकलने वाला.

अगर आंकड़ों पर नज़र दौड़ाएं तो बलात्कार के 97 फ़ीसदी मामलों में परिचित शामिल होते हैं. पुलिस किसी के घर और बेडरूम में तो नहीं घुस सकती.

सार्वजनिक जगहों पर बलात्कार जैसी घटनाएं बहुत कम होती हैं.

दिल्ली में जो कुछ हुआ वो दुर्भाग्यपूर्ण था, लेकिन भारत में ऐसा वाकई बहुत कम होता है.

लोगों को ये सिखाने की ज़रूरत है कि वो महिलाओं का सम्मान करें.

सुजेट जॉर्डन, बलात्कार पीड़ित

मैंने जो बदलाव देखा वो ये था कि महिला और पुरुष एक साथ सड़कों पर उतरे, उन्होंने महिलाओं के खिलाफ हिंसा का विरोध किया.

दुर्भाग्य से पूरे देश में बलात्कार की घटनाएं कम नहीं हुई हैं.

मुझे लग रहा है कि नए बलात्कार विरोधी कानूनों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो पा रहा.

Image caption सुजेट जॉर्डन की शिकायत है कि फ़ास्ट ट्रैक अदालतें बहुत धीमी रफ्तार से काम कर रही हैं.

बलात्कार के मामलों की फ़ास्ट ट्रैक अदालतें बहुत धीमी रफ्तार से काम कर रही हैं.

बैजयंत 'जय' पांडा, सांसद

बहुत कुछ किया जाना बाकी है. न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीमी है. अपराध के मामलों के ही निपटने में 10 से 20 साल लग जाते हैं.

देश में दस लाख लोगों पर महज 13 जज हैं जबकि विकसित देशों में 50 से 100.

न्याय नहीं मिल पाता. आबादी के अनुपात में पुलिस भी कम है.

सिस्टम ऐसा है कि राजनीतिज्ञ रोज़ नए मुद्दों में ध्यान बंटाते हैं. एक दिन बलात्कार की बात होती है तो दूसरे दिन भ्रष्टाचार की, अगले दिन सीमा पर पाकिस्तान और चीन के साथ बढ़ते तनावों का मुद्दा हावी हो जाता है.

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