कितना सफर तय किया है नरेंद्र मोदी ने

नरेंद्र मोदी

हाल के वर्षों में भारत की राजनीति में नरेंद्र मोदी जैसे चंद राजनेता ही नजर आते हैं जिन्होंने जनमत को इतना प्रभावित और ध्रुवीकृत किया है.

ये जुमला नरेंद्र मोदी पर बिल्कुल सही बैठता है कि आप उनके पक्ष में हो सकते हैं या धुर विरोधी हो सकते हैं, लेकिन उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते.

भले ही मोदी पर 2002 के दंगों के संबंध में आरोप लगे हों, लेकिन भारतीय जनता पार्टी में उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा है. अब तो वे भाजपा की चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष भी हैं.

इसे नरेंद्र मोदी का करिश्मा ही कहा जाएगा कि चाहे गुजरात विधानसभा चुनाव हो या फिर कोई और चुनाव भारतीय जनता पार्टी से कहीं ज्यादा, मोदी का व्यक्तित्व हावी हो जाता है.

शुरु से संघ की ओर झुकाव

वर्ष 1950 में वाडनगर, मेहसाना, गुजरात में जन्मे नरेंद्र मोदी ने राजनीति शास्त्र में एमए किया. बचपन से ही उनका संघ की तरफ खासा झुकाव था और गुजरात में आरएसएस का मजबूत आधार भी था.

वे 1967 में 17 साल की उम्र में अहमदाबाद पहुँचे और उसी साल उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता ली. इसके बाद 1974 में वे नव निर्माण आंदोलन में शामिल हुए.

इस तरह सक्रिय राजनीति में आने से पहले मोदी कई वर्षों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे.

1980 के दशक में जब मोदी गुजरात की भाजपा ईकाई में शामिल हुए तो माना गया कि पार्टी को संघ के प्रभाव का सीधा फायदा होगा.

वे वर्ष 1988-89 में भारतीय जनता पार्टी की गुजरात ईकाई के महासचिव बनाए गए. नरेंद्र मोदी ने लाल कृष्ण आडवाणी की 1990 की सोमनाथ-अयोध्या रथ यात्रा के आयोजन में अहम भूमिका अदा की.

इसके बाद वो भारतीय जनता पार्टी की ओर से कई राज्यों के प्रभारी बनाए गए.

अटल ने दी 'राजधर्म निभाने' की सलाह

मोदी को 1995 में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय सचिव और पांच राज्यों का पार्टी प्रभारी बनाया गया. इसके बाद 1998 में उन्हें महासचिव (संगठन) बनाया गया.

इस पद पर वो अक्तूबर 2001 तक रहे. लेकिन 2001 में केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद मोदी को गुजरात की कमान सौंपी गई. उस समय गुजरात में भूकंप आया था और भूकंप में 20 हजार से ज्यादा लोग मार गए थे.

मोदी के सत्ता संभालने के लगभग पांच महीने बाद ही गोधरा रेल हादसा हुआ जिसमें कई हिंदू कारसेवक मारे गए. इसके ठीक बाद फरवरी 2002 में ही गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ़ दंगे भड़क उठे.

इन दंगों में सरकार के मुताबिक एक हजार से ज्यादा और ब्रितानी उच्चायोग की एक स्वतंत्र समिति के अनुसार लगभग 2000 लोग मारे गए. इनमें ज्यादातर मुसलमान थे.

जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात का दौर किया तो उन्होंनें उन्हें 'राजधर्म निभाने' की सलाह दी जिसे वाजपेयी की नाराजगी के संकेत के रूप में देखा गया.

मोदी पर आरोप लगे कि वे दंगों को रोक नहीं पाए और उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं किया. जब भारतीय जनता पार्टी में उन्हें पद से हटाने की बात उठी तो उन्हें तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और उनके खेमे की ओर से समर्थन मिला और वे पद पर बने रहे.

गुजरात में हुए दंगों की बात कई देशों में उठी और मोदी को अमरीका जाने का वीजा नहीं मिला. ब्रिटेन ने भी दस साल तक उनसे अपने रिश्ते तोड़े रखे.

विकास का नारा

मोदी पर आरोप लगते रहे लेकिन राज्य की राजनीति पर उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई. गुजरात भाजपा में अब कोई ऐसा नेता नहीं दिखता जो उन्हें चुनौती देने के बारे में सोच भी सके.

अब तो भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेता भी खुले आम मोदी की आलोचना का जोखिम नहीं उठाते हैं.

मोदी एक अच्छे वक्ता माने जाते हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी समर्थन है. बहुत से लोग उन्हें एक कुशल प्रशासक मानते हैं जो भ्रष्टाचार से मुक्त हैं.

उन्हें गुजरात में समृद्धि और विकास का श्रेय भी दिया जाता है, हालाँकि अनेक लोग इससे सहमत नहीं हैं.

भारत के कुछ बड़े उद्योगपति भी उनकी नीतियों की खुल कर तारीफ करते हैं. लगातार तीन बार विधानसभा के चुनावों में जीत उनकी लोकप्रियता पर मुहर लगाती है.

इसलिए विश्लेषक मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के कई रणनीतिकार अब उन पर बड़ा दांव लगाने की योजनाएं बना रहे हैं. हालांकि पूर्व में भाजपा की सहयोगी रही कई राजनीतिक पार्टियाँ दंगों का हवाला देते हुए मोदी की प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर दावेदारी को स्वीकारने को तैयार नहीं हैं.

महत्वकांक्षी मोदी

जहाँ मोदी पर 2002 के दंगों को न रोक पाने के आरोप लगे हैं, वहीं उनकी सरकार में मंत्री रहीं माया कोडनानी को इन्हीं कारणों से 28 साल की सजा भुगत रही हैं.

मोदी के आलोचकों का तो यहाँ तक कहना है कि दंगों में भूमिका के कारण ही मोदी ने कोडनानी को मंत्री पद से नवाजा था. मोदी के खिलाफ दंगों से संबंधित कोई आरोप किसी कोर्ट में सिद्ध नहीं हुए हैं.

हालाँकि, खुद मोदी ने भी कभी दंगों को लेकर न तो कोई अफसोस जताया है और न ही किसी तरह की माफी मांगी है.

महत्वपूर्ण है कि दंगों के चंद महीनों के बाद ही जब दिसंबर 2002 के विधानसभा चुनावों में मोदी ने जीत दर्ज की थी तो उन्हें सबसे ज्यादा फायदा उन इलाकों में हुआ जो दंगों से सबसे ज्यादा प्रभावित थे.

इसके बाद 2007 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने गुजरात के विकास को मुद्दा बनाया और फिर जीतकर लौटे.

फिर 2012 में भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा गुजरात विधानसभा चुनावों में विजयी रहे और अब केंद्र में अपना राजनीतिक सिक्का चलाने की सोच रहे हैं.

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