विनोद रैना: शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता

  • 13 सितंबर 2013
विनोद रैना, शिक्षाविद
Image caption विनोद रैना ने शिक्षा के अधिकार विधेयक के बनने और पारित होने में अहम भूमिका निभाई थी.

चालीस साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में पीएचडी करने वाले एक युवा ने मध्यप्रदेश के होशंगाबाद के लिए ट्रेन पकड़ी.

आगे चलकर विनोद रैना की ज़िंदगी में वो लम्हा एक अहम मोड़ साबित हुआ क्योंकि इस छोटे से सफ़र ने उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् बना दिया. भौतिक विज्ञान की दुनिया पीछे छोड़कर विनोद रैना शिक्षा और ज्ञान को सब लोगों तक पहुंचाकर समाज को बदलने के संघर्ष में जुट गए.

चार सालों तक कैंसर से जूझने के बाद शिक्षाविद् विनोद रैना का गुरुवार को निधन हो गया. इसके साथ ही भारत के लोकतांत्रिक आंदोलन ने एक कॉमरेड नेता को खो दिया. लोकतांत्रिक मूल्यों, ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया था.

शिक्षा का अधिकार विधेयक

शिक्षा, विनोद रैना का जुनून था. होशंगाबाद का ट्रेन सफ़र उनका होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के साथ संबंध की शुरुआत थी. आगे चलकर उन्होंने एकलव्य की स्थापना की जो कि भारत में विज्ञान शिक्षा कार्यक्रमों में मील का पत्थर साबित हुआ. उनकी दूरदर्शिता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन कार्यक्रमों से वो जुड़े, वे महज़ छोटे स्तर पर ग़ैर सरकारी कार्यक्रमों तक ही सीमित नहीं रहे.

एकलव्य कार्यक्रम की सफलता ने भारत में शिक्षा प्रणाली पर अपनी छाप छोड़ी. विनोद रैना ने हमेशा शिक्षा के ज़रिए होने वाले बदलाव को महत्व दिया.

वे शायद ख़ुद इस बात को मानते कि उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी साल 2009 में भारतीय संसद द्वारा शिक्षा का अधिकार विधेयक पारित करना था. ये क़ानून उनके दिल के बहुत क़रीब था और इसे बनाने और इसके लिए सहमति जुटाने के लिए उन्होंने अथक मेहनत की थी. क़ानून बनने के बाद भी उसे लागू करवाने के लिए लगातार कोशिश करते रहे. इस विधेयक का मूल समझाने के लिए उन्होंने राज्यों का दौरा किया और अधिकारियों, नीतिनिर्धारकों और कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात की.

सामाजिक कार्यकर्ता

साल 1984 में भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को न्याय दिलवाने वालों में भी विनोद रैना आगे रहे.

वे पीपुल्स साइंस मूवमेंट इन इंडिया के सह-संस्थापक भी थे जो उनकी सामाजिक बदलाव के लिए छोटे स्तर पर हो रहे संघर्षों को बड़े अभियानों में बदलने में दिलचस्पी का उदाहरण है. साल 1987 में स्थापित ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क के वे एक अहम नेता थे और इससे वे अपनी मृत्यु तक जुड़े रहे. वे साल 1990 में बने भारत ज्ञान विज्ञान समिति से भी जुड़े थे और कई सालों तक वे इस संस्था के राष्ट्रीय महासचिव रहे.

1990 के दशक में देश भर में फैले शिक्षा अभियान में वो एक ताक़तवर आवाज़ बन कर उभरे. देश के दूरदराज़ और ग्रामीण इलाकों में इस संस्था द्वारा ज्ञान विज्ञान विद्यालय शुरु करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.

विनोद रैना ताउम्र लोकतंत्र और अधिकारों के लिए स्थानीय संघर्षों के प्रति प्रतिबद्ध रहे. विज्ञान और शिक्षा के अलावा वे पर्यावरण आंदोलन से भी जुड़े थे. वे उन लोगों की भी आवाज़ बने जिनकी ज़मीन और रोज़ी-रोटी पूँजीवादी विकास की भेंट चढ़ गए थे.

नर्मदा बचाओ आंदोलन, देश के कई भागों में होने वाले परमाणु विरोधी आंदोलन और ऐसी ही कई और अभियानों में विनोद रैना ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया.

बेहतरीन वक्ता

होशंगाबाद ज़िले के एक छोटे से गांव के लोगों से जो कुछ विनोद रैना ने सीखा, वही उनके बाद के जीवन के काम की बुनियाद बना. जुबली साउथ कार्यक्रम के ज़रिए वे अमीर देशों की अनुचित वैश्विक नीतियों के ख़िलाफ़ लड़ाई का हिस्सा बने. साथ ही वो उस वैश्विक संघर्ष का भी एक अहम हिस्सा थे जिसका मक़सद ग़रीब देशों पर लगे अनुचित कर्ज़ को ख़त्म करना था.

लंबे समय तक विनोद रैना वर्ल्ड सोशल फ़ोरम के एक अंतरराष्ट्रीय काउंसिल सदस्य रहे. वे फ़ोरम फ़ॉर साइंस एंड डेमोक्रेसी नाम की वैश्विक संस्था के संस्थापकों में से एक थे.

वे हिंदी और अंग्रेज़ी दोंनो ही भाषाओं के बेहतरीन वक्ता थे. साथ ही वे एक निपुण गायक भी थे.

विनोद रैना की कमी द पीपुल्स साइंस मूवमेंट, विभिन्न शिक्षा और साक्षरता अभियान और कई जन आंदोलनों में खलेगी. लेकिन उनके जैसे कॉमरेड मरते नहीं हैं. वे अपने काम के ज़रिए हमेशा लोगों के बीच ज़िंदा रहते हैं.

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