नवाज़ शरीफ़ से प्यार-मोहब्बत की बात नहीं

manmohan singh

संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री अमरीका रवाना हो चुके हैं. वहाँ अगर उन्हें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से मिलने का प्रस्ताव मिलता है तो उन्हें उसे नकारना उचित नहीं होगा. लेकिन ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि बातचीत किस माहौल में और किस तरह होती है.

हालांकि इस बातचीत से उम्मीदें बहुत कम हैं, क्योंकि क़रीब 10 साल बाद नियंत्रण रेखा पर जिस तरह से गोलीबारी हो रही है और संघर्ष विराम को नकार दिया गया है, यह सब शुरू हुआ है नवाज़ शरीफ़ के प्रधानमंत्री बनने के बाद. यह सब चिंता का विषय है.

भारत की चिंता

वहीं नवाज़ शरीफ़ के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत को उम्मीद थी कि वो मुंबई हमले में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करेंगे. लेकिन इस पर भी हमें निराशा ही हाथ लगी है.

Image caption नवाज़ शरीफ भारत से व्यापार और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग चाहते हैं.

इसके उलट हुआ यह कि नवाज़ शरीफ़ लश्कर-ए-तैयबा और उसके नेता हाफ़िज़ सईद को निजी तौर पर समर्थन दे रहे हैं. पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री और नवाज़ शरीफ़ के भाई शहबाज़ शरीफ़ जमात-उद-दावा को पैसे दे रहे हैं.

तीसरी बात यह हुई है कि अभी कुछ दिन पहले अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ था.

अफ़ग़ानिस्तान का कहना है कि हमला लश्कर-ए-तैयबा ने किया और हमलावर सीमा पार से आए थे. ये सारी बातें भारत के लिए चिंता का विषय हैं.

इस माहौल में अगर नवाज़ शरीफ़ साहब एक तरफ़ लश्कर-ए-तैयबा को बढ़ावा दें और दूसरी तरफ़ भारत से बातचीत की इच्छा जताएं, यह ठीक बात नहीं है.

नवाज़ के सत्ता संभालते ही हाफ़िज़ सईद की गतिविधियां बढ़ गई हैं. उन्होंने ईद के मौक़े पर लाहौर के क्रिकेट स्टेडियम में भाषण दिया. छह सितंबर को रावलपिंडी में उन्होंने भारत विरोधी भाषण दिया.

बातचीत का माहौल

अब इस माहौल में यह नहीं होना चाहिए कि हम पाकिस्तान के साथ संपर्क ही तोड़ लें. प्रयास यह होना चाहिए कि पाकिस्तान के साथ संपर्क बना रहे. लेकिन जो भी बातचीत हो उसका प्रमुख मुद्दा आतंकवाद ही होना चाहिए. हालांकि नवाज़ शरीफ़ व्यापार और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग की बात कर रहे थे.

ऐसी कार्रवाई जिसमें भारतीय नागरिक मारे जाएं, उसे हम न तो कभी भूल सकते हैं और न कभी माफ़ कर सकते हैं.

अगले साल चुनाव का सामना करने जा रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी यह जान चुके हैं कि सीमा पर सैनिकों के मारे जाने और लश्कर-ए-तैयबा की कार्रवाइयों के बाद लोगों का रवैया सख़्त हो चुका है. इस माहौल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमरीका में नवाज़ शरीफ़ से बातचीत में रिश्तों को सामान्य बनाने की बात तो करेंगे. लेकिन प्यार-मोहब्बत की नहीं.

(बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह से हुई बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार