चारा घोटाला: लालू ने ही दी थी जांच को हरी झंडी

  • 30 सितंबर 2013
लालू यादव

चारा घोटाले मामले में दोषी करार दिए गए लालू प्रसाद यादव ने ख़ुद ही इस मामले में आरोपियों को गिरफ़्तार करने की अनुमति दी थी.

तब वे दिल्ली में थे, जब चाइबासा के उपायुक्त अमित खरे ने इस घोटाले के बारे में जानकारी दी थी और स्थानीय पशुपालन विभाग के अधिकारियों और ट्रेज़री अधिकारी को गिरफ़्तार करने की अनुमति मांगी थी.

बिहार के मुख्यमंत्री लालू तब जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे और कुछ ही महीने बाद देश में लोकसभा चुनाव होने थे. देश का राजनीतिक परिदृश्य असमंजस वाला था और केंद्र में गठबंधन सरकार बननी तय मानी जा रही थी.

मीडिया का एक वर्ग लालू को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहा था. उन्होंने खुद मुझे बताया था कि अगली सरकार स्थायी नहीं होगी और वह ख़ुद ऐसी सरकार का मुखिया नहीं बनना चाहेंगे.

उन्होंने आंखों में चमक लिए मुझसे कहा था, "मेरा समय बाद में आएगा. फिर मैं आपको भी दिल्ली लेकर जाऊंगा." उस समय मैं पटना में द टाइम्स ऑफ़ इंडिया का रेसिडेंट एडिटर था.

निश्चित रूप से उन्हें पता नहीं था कि यह कितना बड़ा घोटाला था. उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि इस मामले में वे और उनके बचपन के मित्र और पशुओं के डॉक्टर आरके राणा भी अभियुक्त बनेंगे. राणा को उन्होंने विधान परिषद के लिए नामांकित किया था.

रंगीन मिजाज

इस मामले के मुख्य अभियुक्त और रांची में पशुपालन विभाग के क्षेत्रीय निदेशक बिशप वेस्टकॉट स्कूल में पढ़ रहे लालू के बच्चों के स्थानीय अभिभावक थे. वह लालू के बच्चों और उनकी पत्नी के लिए विमान से आने-जाने का टिकट खरीदा करते थे.

इस बात पर शक करने की पूरी गुंजाइश थी कि वे सत्तारूढ़ पार्टी और उसके चुनाव अभियान को आर्थिक मदद दे रहे हैं. रंगीन मिजाज के केबी सिन्हा की अब मौत हो चुकी है.

जब भी वो पटना में आईटीडीसी के पाटलीपुत्र होटल में ठहरते थे, तो उनकी ख़िदमत में होटल के वेटर और दूसरे कर्मचारी कतारबद्ध खड़े रहते थे क्योंकि वे सभी को टिप के बतौर 500 रुपए का करारा नोट देते थे.

बिहार में सत्ता में बैठे लोग इस आदमी की कारगुजारियों से अच्छी तरह वाकिफ़ थे. आयकर विभाग को भी पता होगा कि 1992-93 के दौरान विभाग ने नई दिल्ली जा रहे इंडियन एयरलाइंस के विमान को रोककर पशुपालन विभाग के अधिकारियों और उनकी पत्नियों की तलाशी ली थी.

रांची हवाई अड्डे पर मौजूद लोगों के मुताबिक़ उन्होंने गहनों से सजी-धजी महिलाओं को टर्मिनल की तरफ़ लौटते हुए अपने गहने और नकदी फेंकते हुए देखा था. स्थानीय अख़बार प्रभात ख़बर ने इस पर विस्तार से जानकारी दी थी. मगर ताज्जुब है कि इसके बाद कोई ख़बर नहीं की गई.

मुझे लालू के साथ एक मुलाकात याद है, जिसमें उन्होंने इस मामले में ख़ुद को बेगुनाह बताया था और लोक लेखा समिति को इस घोटाले के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था. तब तक पटना उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच के आदेश नहीं दिए थे.

फायदा

लालू ने मुझे अणे मार्ग स्थित अपने आधिकारिक आवास की पहली मंज़िल पर मौजूद बेडरूम में बुलाया और दलील दी कि इस घोटाले की रिपोर्टिंग से बीजेपी को फ़ायदा होगा.

मैंने उनसे कहा था कि हम राजनेता नहीं हैं और पत्रकार होने के नाते हमारे लिए मामले को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. इस बैठक में आईपीएस अधिकारी और विजिलेंस ब्यूरो के प्रमुख डीपी ओझा और बिहार विधान परिषद के चेयरमैन प्रोफ़ेसर जाबिर हुसैन भी मौजूद थे.

मुख्यमंत्री के आदेश पर ओझा ने फाइल से एक पत्र निकाला और लालू ने मुझे वह पत्र देखने को कहा.

अगर मेरी याददाश्त सही है, तो यह पत्र राज्य विधानसभा की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष और कांग्रेस के विधायक जगदीश शर्मा ने मुख्यमंत्री को लिखा था.

समिति के अध्यक्ष चाहते थे कि वो विजिलेंस ब्यूरो और पुलिस को पशुपालन विभाग के अधिकारियों के ख़िलाफ़ जांच बंद करने के आदेश दें क्योंकि समिति ने मामले से जुड़़े दस्तावेज हासिल कर लिए थे और जांच कर रही थी.

शर्मा ने कहा था कि जब तक समिति अपनी जांच पूरी नहीं करती, तब तक कोई समानान्तर जांच नहीं होनी चाहिए. मुख्यमंत्री ने इसे आवश्यक कार्रवाई के लिए पुलिस महानिदेशक को फ़ॉरवर्ड किया था.

यह पत्राचार 1993 में हुआ था, जबकि हमारी बातचीत 1996 में हुई थी.

गालियां

मैंने मुख्यमंत्री से पूछा कि वो मुझसे क्या चाहते हैं. उन्होंने विधायकों को गालियां देते हुए कहा कि विपक्ष इस घोटाले के लिए ज़िम्मेदार है और लोगों को सच्चाई का पता चलना चाहिए.

उन्होंने कहा, "मैं चाहता हूं कि आप अपने अख़बार में इस दस्तावेज़ को प्रकाशित करें."

मैंने उनसे कहा कि मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन इससे आपकी कोई मदद नहीं होगी. इस पर उनकी भवें तन गईं लेकिन मैंने उन्हें समझाया इससे साबित होता है कि मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें इसकी जानकारी थी कि क्या चल रहा है.

मगर वे इससे संतुष्ट नहीं थे.

उन्होंने बातचीत का रुख़ राष्ट्रीय राजनीति की तरफ मोड़ दिया. उन्होंने कहा कि वे नहीं चाहते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव उन्हें आम चुनाव के बाद ब्लैकमेल करें.

क्या लालू को चारा घोटाले से लाभ पहुंचा था? निस्संदेह ऐसा हुआ था. मगर क्या उन्हें पता था कि यह कितना बड़ा घोटाला था? मुझे नहीं लगता है कि ऐसा था. तथ्यों और आंकड़ों को लेकर उनमें संयम नहीं था.

अन्यथा उन्हें शुरुआत में ही इसकी भनक लग जाती. लेकिन न तो जनप्रतिनिधि और न ही मीडिया इस घोटाले का पता लगा सका जो राज्य सरकार के बजट दस्तावेज़ों से आंखें फाड़कर निहार रहा था.

लेकिन ये दस्तावेज़ इतने मोटे और पढ़ने में मुश्किल थे कि लगता था कि इन्हें जानकारी छिपाने के लिए तैयार किया गया था. यह एक हादसा था, और इससे उसका खुलासा हुआ जो भारत के हर राज्य में होता है.

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