लद्दाख: ख़ूबसूरत नज़ारों के बीच 'चाँद के टुकड़े' की हक़ीक़त

भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में कोई 12000 हज़ार फ़ीट से भी ज़्यादा की ऊँचाई पर बसा है लद्दाख. यहाँ कुछ दिनों पहले हुए अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के बहाने लद्दाख आने का मौका मिला.

जैसे ही विमान में लेह पहुँचने की घोषणा हुई, लद्दाख को लेकर मन में तरह तरह की जिज्ञासाएँ उठने लगीं.

कहने को तो ये एक ड्यूटी टूर था जहाँ आपका मकसद ख़बरें बटोरना होता है. लेकिन इस दौरे ने मुझे लद्दाख की संस्कृति, यहाँ के ख़ूबसूरत नज़ारों, जीवन रहन-सहन को जानने का मौका दिया.

यहाँ आने पर पहला वास्ता किसी इंसान से नहीं बल्कि यहाँ के कुदरती नज़ारों से होता है. चारों तरफ ऊंचे पहाड़, हवा में थोड़ी सिहरन... ये नज़ारे मैदानी इलाक़े से आए किसी भी बाशिंदे का दिल जीत सकते हैं.

लद्दाख में रहने वाले वरिष्ठ इतिहासकार एजी शेख ने बताया, लद्दाख को क्यों चाँद का टुकड़ा कहा जाता है. वे कहते हैं, "किसी ने लद्दाख के बारे में लिखा है कि ऐसा लगता है कि किसी दूसरे सय्यारे (ग्रह) से कुछ बस्तियाँ लेकर लद्दाख पर चपका दी गई हैं."

शहरों में रहते हुए आपको अंतरराष्ट्रीय संगीत और नृत्य से वाबस्ता होने का मौका मिल जाता है लेकिन भारत के अंदर छिपे विविध लोक गीत-संगीत और उसकी ख़ूबसूरती से आप कितने महरूम रह जाते हैं, इसका अंदाज़ा मुझे लद्दाख की एक सांस्कृतिक शाम में चला.

यहाँ की गलियों, बाज़ारों में घूमने का अलग ही आनंद है. एक ओर जहाँ लद्दाख में बौद्ध संस्कृति की छाप है, बौद्ध मोनेस्ट्री है, वहीं बग़ल के गुरुद्वारे से अरदास और पास की मस्जिद से आती अज़ान यहाँ के बहुसंस्कृतिवाद को दर्शाती है.

पढें: लद्दाख, जहाँ के 'सिल्क रूट' को दुनिया जानती है

मुश्किल जीवन

पर्यटकों और चंद दिन बिताकर चले जाने वाले मेरे जैसे लोगों के लिए लद्दाख का दूसरा पहलू जानना भी ज़रूरी है.

यहाँ के पहाड़, एडवेंचर ट्रेल, यहाँ का अध्यात्म, दुनिया की सबसे ऊँची सड़क, उस पर सरपट गाड़ी चलाने का रोमांच ये सब अपनी जगह है. लेकिन यहाँ का जीवन काफ़ी मुश्किलों भरा है.

सर्दियों में शून्य से कई डिग्री नीचे तापमान और बाकी देश से कट जाना.

लद्दाख के फंतासीनुमा सफ़र से आगे की ये हक़ीकत मुझे बताई अफ़ज़ल खान ने जो लद्दाख में ही पले बढ़े हैं.

उन्होंने कहा, "सर्दियों में यहाँ काफ़ी दिक्कते होती हैं. ठंड के मौसम में कभी-कभी पानी तक की सहूलियत नहीं मिलती. नलकों में पानी जम जाता है.

कभी कभी तो भारतीय वायु सेना के लोग दिल्ली या चंडीगढ़ से सब्ज़ियाँ और दूसरा सामान हम तक पहुँचाते हैं, तभी हमारा काम चलता है."

यहाँ के कुछ लोगों की दूसरी शिकायतें भी हैं, खा़सकर अपनी पहचान और बोली को लेकर.

लद्दाख में रहने वाले टी संपल जैसे लोग यहाँ की बोटी बोली को भारतीय संविधान के आठवी अनुसूची में मान्यता दिलाने की माँग करते आए हैं.

उनका कहना था, "पूरे हिमालई इलाक़े में करीब दस लाख 80 हज़ार लोग बोटी भाषा का प्रयोग करते हैं. हम चाहते हैं कि इसे भारतीय संविधान के तहत मान्यता मिले."

देखें: लद्दाख की सुंदर वादियां

दोबारा जाने की चाहत

पाकिस्तानी और चीन की सीमा से सटा होने के कारण लद्दाख का भारत के लिए ख़ासा रणनीतिक महत्व भी है.

मैंने यहां बिहार, यूपी जैसे राज्यों के लोगों की बड़ी संख्या देखी, जो रोज़गार की तलाश में आते हैं.

कामकाज के बीच लद्दाख को जानने समझने के लिए पाँच दिन नाकाफ़ी से रहे.

यहाँ बिताई आख़िरी शाम ठिठुरने वाली ठंड में बगीचे में लकड़ियों में लगाई आग के सामने हाथ सेंकते हुए और वहाँ आग के आस-पास नाचते-गाते लद्दाखियों के बीच गुज़र गई.

इसके आगे के लद्दाख को जानने के लिए दोबारा वहाँ जाने का इंतज़ार करना होगा.

(लद्दाख की अगली कड़ी में पढ़िए लद्दाख की अनोखी फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में, मिलेंगे लद्दाखी शोले की बसंती से भी)

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