लालटेन की लौ बचा पाएँगी राबड़ी देवी?

  • 8 अक्तूबर 2013
राबड़ी देवी
Image caption राबड़ी देवी के ऊपर बड़ी ज़िम्मेदारी है.

एक ज़माना था जब राबड़ी देवी अपने भाई साधु यादव को टिकट नहीं दिला सकीं तो लालू प्रसाद ने पत्रकारों से बताया- राबड़ी रूसल बाड़ी. मांग तानी चोखा त दे ताड़ी चटनी.

यह बात तब की है जब लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे. पटना में मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग में आने-जाने वालों को लालू प्रसाद बेसाख्ता राबड़ी देवी की नाराज़गी की बात बताते.

लालू प्रसाद ने राबड़ी की बात अनसुनी कर दी जिस पर वो आहत हो गईं. बाद में लालू प्रसाद ने साधु यादव को सामाजिक योगदान करने वाले कोटे के तहत उच्च सदन यानी विधान परिषद में भेज दिया था.

तब सिर्फ़ अपने घर को संभालने वाली राबड़ी देवी को शायद ख़ुद भी पता नहीं था कि समय का पहिया ऐसे घूमेगा कि उन्हें ही मुख्यमंत्री बनना पड़ेगा. पशुपालन घोटाले में जब लालू अभियुक्त बने तो मुख्यमंत्री की कुर्सी से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

वर्ष 1997 में राबड़ी ने मन मार कर मुख्यमंत्री बनना स्वीकार किया था. साल 2013 में इस बार आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद को चारा घोटाले में पांच साल की सज़ा के बाद राष्ट्रीय जनता दल की कमान उनके हाथ में होगी. पति और आरजेडी अध्यक्ष के जेल जाने से दुखी राबडी देवी ने कहा - वह आउट नहीं हुई हैं.

राबड़ी की चुनौतियां

Image caption लालू यादव को ऐसे समय में सजा हुई है जब आम चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं

आरजेडी के पास अपने सिर पर आंचल रखने और साधारण दिखने वाली महिला राबड़ी देवी के सिवा कोई विकल्प नहीं था. लोकसभा चुनाव के पहले बिहार में अपने जनाधार को गोलबंद रखने और पार्टी की एकता को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी था. उनके दो जवान बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप भी राजनीति में सक्रिय हो गए हैं, लेकिन उनकी मां को ही पार्टी ने सामने रखा है.

पार्टी की कमान संभालने के बाद राबड़ी के सामने वास्तविक चुनौतियां कम नही हैं. उनके सामने पार्टी के अंदर और बाहर की चुनौतियां हैं. बाहर की चुनौती ये है कि उन्हें नरेंद्र मोदी की भाजपा और नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ अपने आधारों को संगठित कर उसे अपने वोट बैंक में बदलना है. याद रहे कि राबड़ी देवी के हाथ में लगातार तीन चुनावों में हारने वाली पार्टी की कमान है. और लालू जेल में हैं.

वहीं पार्टी के अंदर रघुवंश प्रसाद सिंह, अब्दुल बारी सिद्दीक़ी, प्रभुनाथ सिंह, रामचंद्र पूर्वे, जगदानंद समेत अनेक नेताओं के साथ अपने बेटों को साथ लेकर चलने की चुनौती भी है. ये चुनौती आसान नहीं है. उन्हें दो मोर्चों पर साथ साथ लड़ना होगा, बिना लालू के.

समय बताएगा कि उन्हें इसमें कितनी कामयाबी मिलती है. हालांकि उनकी पार्टी लालू के जेल जाने के बाद कह रही है कि पार्टी का हर एक कार्यकर्ता लालू है.

'मैं हूं ना'

ये बात सही है कि अब राबड़ी देवी को राजनीति का पहले से कहीं ज्यादा अनुभव है. जब पहली बार उन्हें मुख्यमंत्री का पद सौंपा गया था तो सरकार चलाना, अधिकारियों के साथ बैठक करना, उन्हें निर्देष देना वग़ैरह पहाड़ जैसा काम दिख रहा था. लालू पसाद ने उन्हें समझाया, ‘सब ठीक हो जाएगा. मैं हूं न.’ सीधी-सादी राबड़ी पहाड़ जैसी दिखने वाली ज़िम्मेदारी को ठुकरा न सकीं.

Image caption लालू यादव अपने बेटे तेजस्वी को राजनीति में उतार चुके हैं

उनके लिए घर में ही ट्यूटर का इंतज़ाम किया गया. 25 जुलाई 1997 को राबड़ी देवी सीएम बनीं और उसके 20 दिनों बाद ही 15 अगस्त को गांधी मैदान में भाषण देना था. भाषण का रियाज़ भी कराया गया.

एक तत्कालीन ज़िलाधिकारी पीछे से भाषण पढ़ती रहीं और राबड़ी देवी उसे दुहराती रहीं. लालू प्रसाद के जेल जाने के बाद उनके निर्देषों पर सरकार चलती रही. रिमोट लालू प्रसाद के हाथों में था. जेल से वह बाहर निकले तो मंच या प्रेस कांफ्रेंस में वह आहिस्ता-आहिस्ता बोलते. राबड़ी उन बातों को दोहरातीं. भला किस महिला को अपने पति पर भरोसा न होगा?

कुछ सालों में ही रियाज़ का फल दिखने लगा. राबड़ी अब वैसी नहीं थीं. वह बदल चुकी थीं. विधानसभा से लेकर जनता के बीच उनके भाषण में धारावाहिकता आ गई थी. राबड़ी देवी तीन बार मुख्यमंत्री बनीं और उन्होंने सात साल चार महीने 46 दिनों तक सत्ता चलाई. एक बार तो गांधी मैदान की सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सामने मंच पर वाजपेयी सरकार पर ख़ूब गरजीं.

लालू यह देख मंद-मंद मुस्कुराते. चेहरे पर गर्व का भाव उभरता. गोया वे बता रहे हों कि देखो हमने लोकतंत्र की कैसी व्याख्या निकाली.

अब लालू प्रसाद जेल में है और चुनाव सामने हैं. अब राबड़ी ने अपना एजेंडा तय कर दिया है. वे बोलती हैं लालू प्रसाद को फंसाया गया है. पार्टी में कोई टूट नहीं होगी. गांव-गांव में जाएंगे लोगों को लालू जी की बातों को बताएंगे.

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