'यह व्यवस्था दलितों को न्याय नहीं दे सकती'

बिहार, जहानाबाद, नरसंहार, दलित
Image caption लक्ष्मणपुर बाथे गाँव बिहार के जहानाबाद ज़िले में स्थित है.

बिहार के जहानाबाद ज़िले के लक्ष्मणपुर और बाथे गांव में 58 लोग मारे गए थे, मारे जाने वालों में 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी थे. ऐसे मामले में सभी अभियुक्तों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया जाना न केवल दलितों के ख़िलाफ़ है बल्कि इस न्याय व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर भी एक बड़ा धब्बा है.

न्यायलय का यह फ़ैसला दुर्भाग्यपूर्ण और शॉकिंग है. न्यायालय इस बात पर चुप है कि ये 58 लोग कैसे मारे गए और उसके अभियुक्त कौन थे.

अगर यह व्यवस्था इतनी अपंग है कि वो 58 लोगों के नरसंहार का साक्ष्य नहीं खोज पा रही है तो उसे कोई हक नहीं कि वो दलितों और ग़रीबों को इस संविधान, न्यायालय और पुलिस की दुहाई दे. आख़िरकार यह व्यवस्था किस आधार पर ग़रीबों को इस व्यवस्था पर भरोसा करने को कह सकती है.

हम गर्व करते हैं कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं लेकिन इस व्यवस्था में दलितों और ग़रीबों को न्याय नहीं मिला तो वे इस संविधान पर से विश्वास खो देंगे.

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मौलिक अधिकार

Image caption बिहार के बथानी टोला में हुए जनसंहार के अभियुक्तों के भी उच्च न्यायालय ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया था.

संसदीय राजनीति की इस प्रक्रिया और इसके संविधान में कहा गया है कि हम एक साथ रहेंगे, हम कोई विभेद नहीं करेंगे, समानता का अवसर होगा.

हमारा पहला मौलिक अधिकार है जीने का अधिकार. इस संसदीय संविधान के तहत यह अधिकार ही सुरक्षित नहीं है.

अगर यह संविधान ग़रीबों को उनके मौलिक अधिकार की सुरक्षा नहीं दे सकता तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए, इसकी व्याख्या होनी चाहिए.

हमारे देश के राष्ट्रपति कई बार कह चुके हैं कि अगर ग़रीब तक न्याय नहीं पहुँचेगा तो लोकतंत्र की सुरक्षा नहीं हो सकती.

अगर लोकतंत्र समाज को यह विश्वास नहीं दिलाता है कि यह न्याय व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था ग़रीबों को न्याय और सुरक्षा दे सकता है तो यह लोकतंत्र अपना नैतिक आधार खो देगा.

अगर लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा तो वो कानून अपने हाथ में लेंगे और लोग कानून अपने हाथ में लेंगे तो समाज में अवव्यवस्था फैलेगी.

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साज़िश

Image caption न्यायालय के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

कुछ लोग इसे जाँच व्यवस्था की ख़ामी मात्र बता रहे हैं. इसे ख़ामी तब माना जा सकता था जब कुछ मामले में यह व्यवस्था न्याय करती और कुछ मामलों में काम नहीं करती.

जिस तरह दलितों के नरसंहार के विभिन्न मामले में अभियुक्त बरी होते जा रहे हैं उससे पता चलता है कि यह एक साज़िश है.

जब किसी मज़दूर को पकड़ना होता है तो पुलिस के पास ढेरों मुखबिर होते हैं लेकिन जब अमीरों को पकड़ना होता है तो इनके मुखबिर न जाने कहाँ चले जाते हैं.

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भविष्य की राजनीति

अगर सरकार पुलिस व्यस्था के प्रति सख़्ती नहीं बरतती तो दलितों का सरकार से भी भरोसा उठ जाएगा.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके पहले ऐसे ही एक मामले में उच्च न्यायलय के फैसले के ख़िलाफ उच्चतम न्यायालय जाने की बात कही थी. सरकार गई भी.

Image caption बिहार के बेलावर गाँव में गठित हुई रणवीर सेना के ऊपर इन नरसंहार में शामिल होने का आरोप लगता रहा है.

लेकिन यह केवल ऊपरी अदालतों तक जाने का मामला नहीं है.

अगर सरकार केवल उच्चतम न्यायालय में जाकर चुप रह जाती है और ऐसे मामलों की जाँच के लिए अपने प्रशासन और पुलिस महकमे पर दबाव नहीं बनाती तो दलित इस सरकार पर से भरोसा खो देंगे और इस सरकार के प्रति दलित का रवैया बदल जाएगा.

दलितों के प्रति हिंसा: एक नज़र

मेरा मानना है कि इस फ़ैसले का न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा. यह फ़ैसला देश के ग़रीबों को अपने ढंग से एकजुट होने का आधार देगा जो इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े होंगे.

मैं मानता हूँ कि भारतीय व्यवस्था, पुलिस प्रशासन, सुरक्षा और सत्ता का स्वरूप आज भी दलित के पक्ष में न्याय देने की स्थिति में नहीं आ पाया है.

दलित आंदोलन को इसे अपने गहराई और मजबूती से इसे हल कर सकता है. यह व्यस्था इसे मदद करने की स्थिति में नहीं है. यह निर्णय इस बात का एक प्रमाण है.

ये लेखक के निजी विचार हैं. (रुपा झा से बातचीत पर आधारित.)

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