25 सालों तक जातीय हिंसा में जलता रहा बिहार

बिहार में जातीय हिंसा का इतिहास काफी पुराना है. उच्च न्यायलय के ताज़ा फ़ैसले के बाद चर्चा में आए लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार से पहले और बाद में भी राज्य में जातीय हिंसा का एक लंबा इतिहास रहा है.

साल 1976 में भोजपुर ज़िले के अकोड़ी गांव से शुरू हुई हिंसा करीब 25 सालों तक चलती रही. इस हिंसा में सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं. पढ़िए ऐसी ही प्रमुख घटनाओं के बारे में...

मियांपुर जनसंहार

औरंगाबाद ज़िले के मियांपुर में 16 जून 2000 को 35 दलित लोगों की हत्या कर दी गई थी. इस मामले में जुलाई 2013 में उच्च न्यायलय ने साक्ष्य के अभाव में 10 अभियुक्तों में से नौ को बरी कर दिया था. निचली अदालत ने इन सभी अभियुक्तों को आजीवन कारावास का सज़ा सुनाई थी.

सेनारी हत्याकांड

साल 1999 में बिहार में जातीय हिंसा की कई घटनाएं घटीं. सबसे बड़ी घटना जहानाबाद ज़िले के सेनारी की थी जहां पर अगड़ी जाति के 35 लोगों की हत्या कर दी गई. इससे पहले इसी साल इसी ज़िले के शंकरबिघा गांव में 23 और नारायणपुर में 11 दलितों की हत्या की गई.

लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार

Image caption बथानी टोला गांव में 22 लोगों की हत्या की गई थी.

एक दिसम्बर 1997 को बिहार के जहानाबाद ज़िले के लक्ष्मणपुर बाथे गांव में कुख्यात रणवीर सेना ने 61 लोगों की हत्या कर दी. मारे गए लोगों में कई बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी शामिल थीं. इस मामले के सभी 26 अभियुक्तों को बुधवार को उच्च न्यायलय ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया.

बथानी टोला

साल 1996 में भोजपुर ज़िले के बथानी टोला गांव में दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जाति के 22 लोगों की हत्या कर दी गई. माना गया कि बारा गांव नरसंहार का बदला लेने के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया. साल 2012 में उच्च न्यायलय ने इस मामले के 23 अभियुक्तों को भी बरी कर दिया था.

बारा गांव

गया ज़िले के बारा गांव में माओवादियों ने 12 फरवरी 1992 को भूमिहार जाति के 35 लोगों की हत्या कर दी थी. माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के सशस्त्र दस्ते ने एक नहर किनारे ले जाकर उनके हाथ-पैर बांधकर उनकी गला रेतकर हत्या कर दी थी।

तिस्खोरा

साल 1991 में बिहार में दो बड़े नरसंहार हुए. पटना ज़िले के तिस्खोरा में 15 और भोजपुर ज़िले के देव-सहियारा में 15 दलितों की हत्या कर दी गई.

नोंही-नागवान

साल 1989 में ज़हनाबाद ज़िले के नोंही-नागवान ज़िले में 18 पिछड़ी जाति के लोगों और दलितों की हत्या कर दी गई.

देलेलचक-भगौरा

बिहार में उस वक्त तक के सबसे बड़े जातीय नरसंहार में 52 लोगों की मौत हुई थी. औरंगाबाद ज़िले के देलेलचक-भगौरा गांव में 1987 में पिछड़ी जाति के दबंगों ने कमज़ोर तबके के 52 लोगों की हत्या कर दी थी.

दंवार बिहटा

Image caption बेल्छी में दलितों की हत्या के बाद इंदिरा गांधी इस गांव का दौरा किया था।

भोजपुर ज़िले के दंवार बिहटा गांव में अगड़ी जाति के लोगों ने 22 दलितों की हत्या कर दी थी.

पीपरा

पटना ज़िले के इस गांव में 1980 में पिछड़ी जाति के दबंगों ने 14 दलितों की हत्या कर दी थी.

बेल्ची

साल 1977 देश की राजनीति के लिए एक अहम वर्ष था. इसी साल आपातकाल खत्म होने के बाद केंद्र में पहली बार गैर कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार बनी थी. इसी साल राज़धानी पटना के पास बेल्ची गाँव में कुर्मी समुदाय के लोगों ने 14 दलितों की हत्या कर दी थी.

यह घटना उस वक्त सत्ता से बेदखल हो चुकीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के राजनीतिक करियर के लिए वरदान साबित हुई. इंदिरा ने हाथी की पीठ पर बैठ कर बाढ़ से घिरे इस गांव का दौरा किया था.

(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें . आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार