भारत के अब तक के बड़े तूफ़ान

भारत, तूफ़ान

पायलिन तूफ़ान के शनिवार शाम तक ओडीशा और आंध्र प्रदेश के तट से टकराने की आशंका है लेकिन भारत के तटों पर तूफ़ानों से होने वाली तबाही नई बात नहीं है.

तूफ़ान न सिर्फ़ गांवों बल्कि शहरों में भी घरों को तबाह कर देते हैं. बड़े तूफ़ानों में बड़ी तादाद में लोग जान गंवा देते हैं. तूफ़ानों से प्रभावित राज्यों की अर्थव्यवस्था को भी गंभीर नुकसान पहुंचता है.

एक नज़र डालिए बीते 40 सालों के बड़े तूफ़ानों पर.

26-30 अक्तूबर 1971

ओडीशा के तट से टकराए तूफ़ान की रफ़्तार 150 से 170 किलोमीटर थी. 10 हज़ार लोग मारे गए और 10 लाख से ज़्यादा लोग

बेघर हो गए. 50 हज़ार मवेशियों की मौत हो गई और आठ लाख घरों को नुकसान पहुंचा.

1-8 दिसंबर 1972

तमिलनाडु में तूफ़ान ने ज़बरदस्त नुकसान पहुंचाया. तूफ़ान से सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचा कड्डालोर को. हवा की रफ़्तार 111 से 148 किलोमीटर प्रति घंटा थी.

80 लोगों की मौत हुई और 40 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.

8-12 नवंबर 1977

Image caption भारत के पूर्वी तट पर आने वाले तूफ़ानों से हर साल सैकड़ों करोड़ रुपए का नुकसान होता है.

तमिलनाडु और केरल के तटों पर तूफ़ान ने नुकसान पहुंचाया. हवा की अधिकतम रफ़्तार थी 120 किलोमीटर. तंजावुर, तिरुचिरापल्ली और पोदुकोट्टाई इलाके में तूफ़ान से भारी तबाही हुई.

तूफ़ान से जुड़े हादसों में 560 लोगों की मौत हुई और 10 लाख से ज़्यादा लोगों के घर छिन गए. इसके अलावा उनकी रोज़ी-रोटी को भी नुकसान पहुंचा. तूफ़ान की वजह से 23 हज़ार मवेशी मारे गए और

आकलन के मुताबिक निजी और सार्वजनिक संपत्ति को होने वाला नुकसान 155 करोड़ रुपए का था.

14-19 नवंबर 1977

इस तूफ़ान को 70 के दशक के सबसे भयंकर तूफ़ानों में माना जाता है. इसका असर दक्षिण पूर्वी मध्य प्रदेश (अभी के छत्तीसगढ़) तक था. ओडीशा और आंध्र प्रदेश में इससे काफ़ी नुकसान पहुंचा.

हवा की रफ़्तार को जगतस्वामी नाम के एक जहाज़ ने 193 किलोमीटर प्रति घंटे तक मापा.

माना जाता है कि इस तूफ़ान की वजह से 10 हज़ार लोगों की जान गई और 27 हज़ार मवेशियों की मौत हो गई.

सरकारी अनुमानों के मुताबिक फसलों और संपत्ति को होने वाला नुकसान 350 करोड़ रुपए का था.

10-13 मई 1979

आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में तूफ़ान ने नुकसान पहुंचाया. नेल्लोर में हवाओं की रफ़्तार 100 से 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक मापी गई. पेद्दागंजम में समुद्र से 12 फीट तक ऊंची लहरें उठीं.

Image caption तूफ़ानों की वजह से मछुआरों की जीविका पर गंभीर असर पड़ता है.

तूफ़ान की वजह से 700 लोगों की मौत हुई और 3 लाख से ज़्यादा मवेशी मारे गए. माना जाता है कि तूफ़ान से करीब 40 लाख लोगों पर असर पड़ा.

वहीं सात लाख घरों को नुक्सान पहुंचा.

9-14 नवंबर 1984

श्रीहरिकोटा के आसपास के इलाकों में तूफ़ान ने तबाही मचाई. कई गांवों में समुद्र का पानी घुस गया. तमिलनाडु में 54 लोगों की मौत हो गई. 90 हज़ार से ज़्यादा मवेशी मारे गए. वहीं आंध्र प्रदेश में तीन लाख से ज़्यादा घर पूरी तरह तबाह हो गए.

23-30 नवंबर 1988

पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में तूफ़ान की वजह से संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा.

बांग्लादेश में तूफ़ान ने दो हज़ार से ज़्यादा जानें लीं. छह हज़ार से ज़्यादा लोग लापता हो गए.

4-9 मई 1990

आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम में तूफ़ान की वजह से 967 लोगों की मौत हो गई.

36 लाख से ज़्यादा मवेशी मारे गए. 14 लाख से ज़्यादा घरों को नुकसान पहुंचा. माना जाता है कि तूफ़ान से संपत्ति को करीब 2248 करोड़ का नुकसान पहुंचा.

5-7 नवंबर 1996

आंध्र प्रदेश के तट को 6 नवंबर को पार किया. अलग-अलग स्रोतों के मुताबिक तूफ़ान से 978 से 2000 लोगों की मौत हो गई. 900 से 1375 लोग लापता हुए. आंध्र प्रदेश में

Image caption तूफ़ानों की वजह से कई दिनों तक जनजीवन असामान्य हो जाता है.

तूफ़ान की वजह से 1380 गांवों को नुकसान पहुंचा. समुद्र में 6464 नावें लापता हो गईं.

25-31 नवंबर 1999

इस दौरान आए महाचक्रवात ने ओडीशा में ज़बरदस्त तबाही मचाई. हवाओं की रफ़्तार 260 किलोमीटर प्रति घंटे तक थी. भुबनेश्वर में हवाओं की रफ़्तार 148 किलोमीटर मापी गई.

तूफ़ान की वजह से समुद्र में छह से सात मीटर तक ऊंची लहरें उठीं.

माना जाता है कि इस चक्रवात की वजह से 8960 लोगों की मौत हुई और 2142 लोग ज़ख्मी हो गए. तीन लाख सत्तर हज़ार से ज़्यादा मवेशी मारे गए.

साढ़े सोलह लाख हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर फसलों को नुकसान पहुंचा.

4-10 जून 1998

भारत के पश्चिमी तट पर इस दौरान ज़बरदस्त तूफ़ान आया. गुजरात के पोरबंदर-जामनगर में तूफ़ान से सबसे ज़्यादा विध्वंस हुआ.

जामनगर में हवाओं की गति 182 किलोमीटर प्रति घंटा मापी गई. 1173 लोगों की मौत हुई और 1774 लोग लापता हुए.

सरकारी अनुमानों के मुताबिक संपत्ति को हुआ नुकसान 1865 करोड़ रुपए से ज़्यादा था.

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