रेत माफ़िया के ख़िलाफ़ एक महिला की जंग, केरल से दिल्ली तक

  • 11 अक्तूबर 2013
जंतर मंतर पर जज़ीरा
Image caption जज़ीरा इससे पहले केरल में 60 दिनों तक धरने पर बैठीं थीं.

दक्षिण भारत के एक गांव में अवैध रेत खनन का विरोध करने के लिए 2000 किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर अपने तीन बच्चों के साथ दिल्ली पहुंची जज़ीरा वी इन दिनों जंतर मंतर पर धरने पर बैठी हैं.

उनका इरादा जंतर मंतर पर तब तक धरना देने का है जब तक कि केंद्र सरकार केरल के कन्नूर ज़िले के पझयानगड़ी के तट पर रेत का खनन रोकने के लिए कड़े क़दम नहीं उठाती.

हालांकि कन्नूर ज़िला के अधिकारी उनके आरोपों को ख़ारिज करते हुए उन पर चीज़ों को बढ़ा चढ़ा कर पेश करने का आरोप लगाते हैं.

एक ग़रीब मुस्लिम परिवार में जन्मी और बुर्क़ा पहनने वाली यह 31 वर्षीय महिला केवल अपनी मातृभाषा मलयालयम बोलती हैं. क़रीब दो साल पहले गर्भावस्था के अंतिम समय में जज़ीरा अपने ससुराल से अपने पैतृक घर पहुंची तो समुद्र तट पर कटाव को देखकर आश्चर्यचकित रह गईं. और यहीं से शुरू हुई रेत माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ उनकी लंबी लड़ाई.

उन्होंने इलाक़े से अवैध तरीक़े से रेत की ढुलाई के ख़िलाफ़ प्रशासन के पास शिकायत की. उन्होंने कहा, ''गर्भवती होने के बावजूद रेत माफ़िया ने मेरी पिटाई की. जब मैंने स्थानीय अख़बारों से सहायता की गुहार लगाई तो उन्होंने मुझे मानसिक बीमार क़रार देते हुए मुझपर प्रचार के लिए भूखा होने का आरोप लगाया.''

तिरूवनंतपुर में दो माह तक धरना

परेशान होकर वह एक स्थानीय पुलिस स्टेशन के पास धरने पर बैठ गईं. वहां भी जब बात नहीं बनी तो वो राजधानी तिरूवनंतपुरम में राज्य सचिवालय के सामने धरने पर बैठ गईं.

कुछ दिनों के बाद मुख्यमंत्री ने उन्हें मिलने का न्यौता भी दिया और उनकी मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिया.

लेकिन जज़ीरा के लाख कहने के बावजूद जब मुख्यमंत्री लिखित में कुछ भी देने को तैयार नहीं हुए तो वो सचिवालय के ही सामने पूरे दो माह तक धरने पर बैठी रहीं.

उन्होंने कहा, ''मैं नहीं जानती कि जो मैं कर रही हूं उसे 'हड़ताल' कहा जाता है, मीडिया ऐसा कह रहा है. मैं यह भी नहीं जानती थी कि बीच पर्यावरण का हिस्सा है. मैं प्रशासन की लापरवाही को देखकर दुखी हूं.''

ज़ज़ीरा के लिए रेत ख़नन के ख़िलाफ़ संघर्ष घर से शुरू होती है. उन्होंने रेत खनन से दूर रहने के लिए अपने भाई को समझाया. उनके गांव की कुछ महिलाएं सोचती हैं कि वह बदला लेने के लिए यह मुद्दा उठा रही है.

उनका कहना था, ''वे सोचती हैं कि मैं उनसे नाराज़ हूँ क्योंकि जब मेरा भाई मुझे पीट रहा था तो वे मूकदर्शक बनी हुईं थीं. दरअसल, मैं टीवी देखती थी तो मेरा भाई मुझे मारता था.''

Image caption जज़ीरा के तीन बच्चे हैं. दो बेटियां और एक बेटा. ये तीनों भी इनके साथ जंतर मंतर पर ही रहते हैं.

वह कहती हैं, ''मैं एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार से हूँ. मेरे भाई मुझे अकेले बीच पर जाने की अनुमति नहीं देते थे. मुझे झूले पर खेलने की अनुमति नहीं थी. क्योंकि मैं एक लड़की थी. मुझे अख़बार पढ़ने की अनुमति नहीं थी. जब लड़के दोस्त बाहर खेलते थे तो मैं उन्हें खिड़की से देखती थी और दुखी महसूस करती थी.''

जज़ीरा को इस बात का दुख है कि उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी नहीं की. उन्होंने कहा, ''दसवीं में दो माह की पढ़ाई करने के बाद मुझे पीरियड आ गया और मुझसे घर पर रहने को कहा गया. हमारे यहां परंपरा है कि शादी के लायक़ मान लिए जाने के बाद आपको घर पर ही रहना होता है.''

17 साल की उम्र में हो गई थी शादी

केवल 17 साल की उम्र में जज़ीरा की शादी एक ऐसे व्यक्ति से कर दी गई जिन्होंने उनके अनुसार उन्हें रेडियो सुनने, टीवी देखने, अख़बार या कहानी की किताब पढ़ने तक की अनुमति नहीं दी थी.

सालों की पीड़ा सहने के बाद वह अपनी बड़ी बेटी के साथ घर से भाग गई और एर्नाकूलम शहर में एक नौकरानी बन गई. उन्होंने एक सेल्सवूमेन की तरह काम किया और बाद में एक पब्लिकेशन कंपनी में एक सेल्स एजेंट का काम किया. उन्होंने कहा, ''वहीं मैंने दुनिया के लोगों से संवाद शुरू किया.''

दुनिया को जानने के लिए जज़ीरा ने ऑटो-रिक्शा चलने का फ़ैसला किया. उन्होंने कहा, ''मैंने ऑटो रिक्शा चलाने का फ़ैसला इसलिए नहीं किया था कि यह ढेर सारे रूपए कमाने का ज़रिया था या फिर बहुत आसान काम था. बल्कि घर में बंद रहने के बाद मैं आज़ादी चाहती थी और दुनिया के लोगों के बात करना चाहती थी.''

वो अपने पैतृक घर तभी वापस आईं जब उन्होंने फ़ैसला कर लिया था कि अब वो अपने पति के साथ नहीं रहेंगी और उनसे तलाक़ ले लिया.

जब वह अपने गृह नगर पहुंची तो वहां पर उन्हें पुरुष ऑटो-रिक्शा चालकों का विरोध झेलना पड़ा. उन्होंने जज़ीरा से कहा कि एक मुस्लिम महिला होने के नाते उन्हें गाड़ी नहीं चलाना चाहिए. जज़ीरा का मानना है कि ज्यादा सवारियों के उनके पास आने के कारण वे उनसे जलते थे.

Image caption जज़ीरा से मिलने के लिए दिल्ली के पत्रकार भी जंतर मंतर पर पहुंचने लगे हैं.

आज भी जज़ीरा से उनके परिवार पर उनके पर्यावरण से जुड़े कामों के असर को लेकर सवाल उठाए जाते हैं. जज़ीरा का मानना है कि इन सवालों के जवाब देने की ज़रूरत नहीं है. उन्होंने कहा, ''यदि हम केवल अपने घर, बच्चे और परिवार पर ही ध्यान देंगे तो पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को भूल जाएंगे.''

2011 में की दूसरी शादी

उन्होंने इस अभियान को चलाने के लिए दूसरे पति के समर्थन को लेकर आभार जताया. साल 2011 में उन्होंने एक धार्मिक स्कूल के शिक्षक से शादी कर ली. जज़ीरा ने कहा, ''वह मुझसे शादी करना चाहते थे क्योंकि उन्होंने मेरी निर्भिकता के बारे में सुन रखा था.''

रेत के अवैध खनन के ख़िलाफ़ जज़ीरा के विरोध को मीडिया और सामाजिक संगठनों का समर्थन मिल रहा है, लेकिन कन्नूर ज़िला प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि इस मुद्दे को ''बढ़ाचढ़ा कर'' पेश किया जा रहा है. कन्नूर के ज़िलाधिकारी रतन केलकर ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा कि जज़ीरा की शिकायत पर एक जांच कार्रवाई गई जिसमें पाया गया कि कुछ महिलाएं अपने घर रेत ले जा रही थीं.

केलकर ने कहा, ''स्थानीय लोग वहां पर पुलिस पिकेट बनाए जाने से परेशान हैं और वे कह रहे हैं कि उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है.'' उनका कहना है कि स्थानीय लोगों को लगता है कि इससे उनकी शादी की संभावना प्रभावित हो रही है.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का नोटिस

तिरूवनंतपुरम में दो महीने तक धरने पर बैठने के बाद उन्होंने दिल्ली आने का फ़ैसला किया. वो अक्तूबर के पहले हफ़्ते में दिल्ली आ गईं और छह अक्तूबर से दिल्ली के जंतर मंतर पर धरने पर बैठी हुई हैं.

इस बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य और ज़िला प्रशासन को नोटिस भेजकर पूछा है कि जज़ीरा के केरल में धरने पर बैठने के बाद क्यों नहीं ठोस परिणाम निकला. आयोग ने यह भी पूछा है कि क्या जज़ीरा अपने दो बच्चों की शिक्षा को नज़रअंदाज़ कर रही हैं.

अपने साथ बच्चों को दिल्ली लाने के फ़ैसले का बचाव करते हुए जज़ीरा ने कहा, ''तीन दिन की पढ़ाई की दो दिन में भरपाई की जा सकती है लेकिन यदि आप एक मुट्ठी रेत को सीमेंट में मिला देंगे तो वो रेत फिर कभी बीच पर नहीं आएगी.'' उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र उनकी बेटियों को ट्यूशन दे रहे हैं.

आगे कि योजना के बारे में उन्होंने कहा, ''मैं भविष्य के बारे में सोचने वाली इंसान नहीं हूं. मैं ईश्वर में भरोसा करती हूं और मैंने ये चीज़ें उनके लिए छोड़ दी है.'' उनका कहना है कि वह केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन से मिलने की कोशिश कर रही हैं.

अगस्त में एक न्यायाधिकरण ने केरल और तमिलनाडू के बीच पर रेत खनन पर रोक लगा दी थी. जज़ीरा का कहना है कि जब उन्हें इस क़ानून को लागू करने को लेकर आश्वासन मिलेगा और वह संतुष्ट महसूस करेंगी तब यह लड़ाई रोक देंगी.

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