लक्ष्मणपुर बाथे: 'लाशें ट्रैक्टर में भरकर लाई गई थीं'

  • 15 अक्तूबर 2013
लक्ष्मणपुर बाथे, बिहार, नरसंहार, पार्वती देवी
Image caption लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार में पार्वती देवी के परिवार के नौ लोग मारे गए थे.

सोलह साल पहले बिहार के लक्ष्मणपुर-बाथे नरसंहार में कई परिवार अनाथ हो गए थे. यहां तक कि कुछ घरों में घर संभालने वाली एक महिला तक नहीं बची थीं. कुछ परिवारों में सभी बुज़ुर्ग या जवान मौत की नींद सो गए. पीछे बच गए थे सिर्फ बच्चे.

मारे गए लोगों में तीन साल के बच्चे से लेकर 65 साल के बुज़ुर्ग तक शामिल थे.

नरसंहार में इन परिवारों ने जो भुगता वह एक तरफ़, इसके बाद इन पर जो गुज़रा, वह दास्तां भी कम दर्दनाक नहीं है.

ऐसे ही तीन लोगों की कहानियां, जिन्होंने हत्याकांड के बाद किसी तरह अपनी बिखरी हुई ज़िंदगी को समेटा और भविष्य को संवारने में जुट गए.

'लाशें ट्रैक्टर में भरकर ले गए थे'

एक दिसंबर 1997 का दिन लड्डू चंद चौधरी के परिवार के लिए मौत लेकर आया था. हत्यारों ने एक ही आंगन में नौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया था.

Image caption दुखिया के पति और और उनके दो बेटों को हत्यारों ने गांव के बाहर क़त्ल कर दिया था.

लड्डू के माता-पिता, उनके भाई, दो भाभियां, दो भतीजे और दो भतीजियों के निर्जीव शरीर उनकी आंखों के सामने थे. वह ख़ुद नहीं समझ पाए कि आख़िर उनके परिवार का दोष क्या था. घर संभालने के लिए एक महिला भी नहीं बची थी.

नरसंहार की ख़बर मिली तो लड्डू की बहन पार्वती देवी तुरंत अपने मायके पहुंचीं. उनकी शादी क़रीब दस साल पहले लक्ष्मणपुर के पास ही गांव बेलाग में हुई थी.

उस दिन का मंज़र आज भी पार्वती को ऐसे याद है मानो कल की बात हो. ग़ुस्से और डर की मिली-जुली भावनाएं उनके चेहरे पर आकर चली जाती हैं.

वे बताती हैं, ''लाशों को ट्रैक्टर में भरकर सोन नदी के किनारे ले जाया गया था. आदमी तो आदमी जानवर तक महीने भर रोए थे.''

पार्वती ने फ़ैसला लिया, ससुराल नहीं जाएंगी. आख़िर अनाथ बच्चों को कौन संभालता. वह कहती हैं, ''घर में छोटे-छोटे भाई-भतीजे रह गए थे. ऐसे में मैं उन्हें बनाने-खिलाने के लिए मायके में ही रह गई.''

पार्वती अपना ससुराल छोड़कर अगले क़रीब पांच साल मायके में ही रहीं, जब तक कि घर में नई बहू नहीं आ गई.

'बेवा की शादी की दूसरे बेटे से'

Image caption दुखिया देवी की बहू पुनिया देवी अब अपनी सास के साथ छोटी सी दुकान चलाकर गुज़र-बसर करती हैं.

दुखिया देवी के पति और दो बेटे भी उन दुर्भाग्यशाली लोगों में थे जिन्हें हत्यारों ने मौत के मुंह में धकेल दिया. मछुआरा समुदाय के ये पिता-पुत्र उस रात सोन नदी में मछली मारने गए थे.

तीनों लौटे तो गांव में घुसने से पहले ही सोन नदी के किनारे हत्यारों ने उनकी गला रेतकर हत्या कर दी.

हत्यारों का मक़सद यह था कि हमले की ख़बर न फैलने पाए. अगर वो जाते तो यह ख़बर फैल सकती थी.

मारे गए बेटों में से दुखिया के एक बेटे की शादी कुछ ही दिन पहले हुई थी.

इसके बाद बीते 16 साल दुखिया के लिए बेहद संघर्ष भरे रहे. बकौल दुखिया उन्हें सामान्य होने में ही क़रीब दो साल लग गए. दूसरी ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ उनके सिर पर जवान विधवा बहू पुनिया देवी की चिंता भी सवार थी.

नरसंहार के बाद उन्होंने अपनी बहू को उसके मायके भेजा. घर में पीछे बचे दो बेटों में से सबसे छोटे बेटे डेमन को विधवा बहू से शादी करने को तैयार किया और एक साल के भीतर डेमन से पुनिया की शादी करवाकर बहू को वापस घर ले आईं.

Image caption विमलेश तब नाबालिग़ थे जब लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार में उनके सभी घर वाले मार दिए गए थे.

मुआवजे के पैसों से दुखिया ने पक्का मकान बना लिया था. उसी के एक हिस्से में अब एक साल से दुखिया बहू पुनिया के साथ महिलाओं के श्रृंगार की सामग्री बेचकर कुछ पैसे कमा लेती हैं.

'नहीं मिली नौकरी'

लक्ष्मणपुर बाथे के रहने वाले विमलेश राजवंशी को छोड़ उनके परिवार में कोई नहीं बचा था. हत्यारों ने सभी पांच लोगों को मार दिया था. इनमें उनके पिता, दो भाई और दोनों भाभियां शामिल थीं.

इत्तेफ़ाकन दोनों भाइयों की शादी इस वारदात के कुछ दिन पहले हुई थी और दोनों के कोई संतान नहीं थी. विमलेश हमले में बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए थे. हत्यारों की गोली उनके चेहरे को पार कर निकल गई थी.

एक महीने तक वह पटना के पीएमसीएच में भर्ती रहे. इलाज ख़त्म होने पर घर लौटे तो मानो सूना घर काटने को दौड़ता था.

सरकारी मरहम के बतौर विमिलेश को भी नौकरी का भरोसा मिला था. तब वह नाबालिग़ थे. मगर बालिग़ होने के बावजूद आज तक उन्हें नौकरी नहीं मिली है. वह बताते हैं कि सालों जूते घिसने और 50 हजार रूपए सिर्फ़ नौकरी के लिए दौड़भाग और घूस में खर्चने के बावजूद उन्हें सिर्फ़ आश्वासन मिले. सिर्फ़ पांचवीं तक पढ़ाई कर पाना भी उनकी नौकरी की राह में बाधा बन गया.

मगर अब विमलेश ने अपने सपने पूरे करने की ठान ली है. किसी पारिवारिक ज़िम्मेदारी को उन्होंने पत्नी रीता की पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया और उन्हें इंटरमीडिएट कराया. रीता अब सरकारी नौकरी पाने की कोशिश कर रही हैं.

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