मुज़फ्फ़रनगर दंगे : मुस्लिम महिला जो अनाथ बच्ची को माँ का प्यार दे रही है

पिछले महीने उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों ने कई लोगों की जान ले ली. लेकिन एक गरीब मुस्लिम महिला ने मानवीयता की मिसाल देते हुएएक छोटी अनाथ बच्ची को जिंदगी दी है.

मुजफ्फरनगर में हुई हिंसा के बीच आशा की किरण दिखाती है यह कहानी.

दंगों के दौरान पूरे शहर में दोनों समुदायों में हिंसा का माहौल था. पड़ोसी, पड़ोसी के खिलाफ़ खड़ा था और दंगाई शहर में घूम रहे थे.

एक समुदाय के मुखिया के मुताबिक सालों से दोनों समुदाय के लोग यहाँ अमन और चैन के साथ रह रहे हैं. लेकिन इन दंगों के बाद लोगों को अपनी जान की फिक्र होने लगी है.

मुखिया के बात करने के साथ ही लगभग सौ लोगों की भीड़ हमारे आसपास जमा हो गई. माहौल में एक अनजाना सा भय था. लेकिन हम उस 'आशा की किरण' के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते थे.

जान की फिक्र

कुछ आदमियों के साथ गंदे पानी को पार करते हुए एक लोहे के गेट को पार कर हम ईटों से बने एक छोटे मकान के आंगन में जा पहुँचे.

वहाँ सात साल का एक बच्चा हाथ में एक नवजात छोटी बच्ची को पकड़े हुए था. वहाँ मौजूद व्यक्तियों ने कहा कि यह बच्ची दस दिन पहले एक नाले में पड़ी मिली थी, उसकी गर्भनाल भी अलग नहीं की गई थी और कुत्तों ने उसे क्षत-विक्षत कर दिया था.

उनका मानना था कि यह एक हिंदू बच्ची है लेकिन एक अच्छी मुस्लिम महिला की उदारता की वजह से वह बच गई.

महिला के पहले से आठ बच्चे होने के बावजूद उसने इस बच्ची को अपने पास रखा.

हम उस महिला से बात करना चाहते थे.हमने दूसरों से कहा कि वे चले जाएँ ताकि हम महिला से बात कर सकें. वे थोड़ा पीछे तो हट गए और महिला को हमारे सामने लाकर खड़ा कर दिया लेकिन वहाँ से गए नहीं. . कद-काठी में छोटी होने के बावजूद महिला अच्छी खासी तंदुरस्त थी.

बच्ची को अपने हाथों में लिये 36 वर्षीय यह महिला अपनी उम्र से कहीं ज्यादा दिख रही थी.

लाल रंग के बड़े से कपड़े में लिपटी बच्ची हरे रंग की टोपी पहनी थी. आँखों में काजल लगायी उस छोटी बच्ची की आवाज भी बहुत मुश्किल से निकल रही थी. शायद पीलिया होने के कारण उसकी त्वचा पीली पड़ गई थी.

Image caption मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के कारण क्षेत्र में कई दिनों तक तनाव रहा था.

उम्मीद

यह पूछने पर कि पहले से ही आठ बच्चे होने के बावजूद उन्होंने एक और बच्ची को क्यों अपनाया? उस पर महिला का कहना था, ''मुझे उम्मीद है कि वह बड़ी होगी और स्कूल जाएगी. मुझे आशा है कि वह पढ़ाई में बहुत तेज होगी औऱ सरकारी नौकरी करने के साथ-साथ मेरी देखभाल भी करेगी.''

उस छोटी बीमार बच्ची को देखने पर मुझे लग रहा था कि वो ज़िंदा भी रह पाएगी या नहीं. मुझे घर में खाना नहीं दिखा और न ये लगा कि बच्ची को पालने पोसने के लिए पर्याप्त पैसे हैं.

पत्रकारिता के नियम के हिसाब से साक्षात्कार देने वाले व्यक्त की कोई वित्तीय मदद नहीं की जा सकती है. मैं हमेशा इस नियम का पालन किया है. लेकिन उस बच्ची के खाने की चिंता ने मुझे यह नियम तोड़ने पर मजबूर कर दिया.

मैंने कैमरे को बैग में रखने के बहाने से बैग में हाथ डाला और एक नोट अपने हाथ में ले लिया. हाथ मिलाने का बहाना करते हुए मैने उस महिला को जैसे-तैसे पैसे दिए. वो पैसे ज़्यादा नहीं थे लेकिन कुछ दिनों तक बच्ची खाना खा सकती थी.

वहाँ मौजूद लोगों की भीड़ ने हमें घेर रखा था, और कार तक पहुँचने से पहले ही भीड़ में से एक व्यक्ति हमारे सामने खड़ा होकर रुपये माँगने लगा.

मुझे लगा कि वह मुझ पर हमला करने वाला है तभी उस महिला के स्पर्श का अहसास हुआ और मैंने देखा कि यह ये वही महिला थी जिसने अनाथ बच्ची को बचाया था. उसने प्यार से अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया और भीड़ से बचाते हुए मेरी कार तक ले गई.

मैंने धीरे से महिला से कहा कि ये पैसे खुद के लिए रखना. वो मुझे जाने नहीं दे रही थी.

इसके बाद एक व्यक्ति आकर मेरे सामने चिल्लाने लगा, लेकिन उस महिला ने मुझे तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि मैं सुरक्षित अपनी कार मैं नहीं पहुँच गई.

जो पैसे मैने दिए वो कुछ भी नहीं था, बच्ची के खाने की समस्या बस कुछ दिन के लिए हल हो जाएगी. मैं बदले में कुछ नहीं चाहती थी. पर मुझे लगा कि उस महिला ने मुझे 100 गुना वापस कर दिया...अपनी ऐसी अंदरूणी शक्ति और प्यार से जिसने मुझे कृतज्ञ कर दिया.

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