ओडिशा: जान बची पर बिना नाव क्या करें मछुआरे....

  • 14 अक्तूबर 2013
Image caption गोपालपुर के मछुआरों की ज्यादातर नावें बह गईं, जो बचीं वो खराब हो चुकी हैं

ओडिसा के गोपालपुर में दो दिन पहले आए चक्रवाती पायलिन तूफ़ान में किसी की जान तो नहीं गई लेकिन वो मछुआरे क्या करें जिनकी करीब 200 नावें बह गईं. उनके सामने तो रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है.

गोपालपुर तटवर्ती इलाके में मछुआरे रहते हैं. सरकार ने तूफ़ान से पहले ही उन्हें सुरक्षित शिविरों में भेज दिया था.

400 से 500 मछुवारे तट के किनारे बने सरस्वती विद्या मंदिर के भवन में रह रहे हैं. यहां उन्हें सुबह-शाम खाना मिलता है. रात में वह यहां सो भी रहे हैं.

खाने में दाल-चावल और नाश्ते में बिस्किट व उपमा दिया जा रहा है.

इसके बाद भी मछुआरों के चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ़ पढ़ी जा सकती हैं. रोजी-रोटी का मुख्य साधन नावें ही नहीं रहीं. सभी का एक ही सवाल है कि अब वो कैसे पैसा कमाएंगे, कैसे घर चलाएंगे.

सवाल मुआवज़े का

साईं बाबा बस्ती के अन्गुरैय्याह कहते हैं कि मछुआरे के लिए उसकी नाव ही सब कुछ है. वही उसका घर-आँगन है. उनका कहना है कि हर मछुआरे को अपनी नाव से भावनात्मक लगाव होता है.

वह आगे कहते हैं, '' मछुआरे ज़्यादा वक़्त अपनी नाव पर ही बिताते हैं. इसी से हमारा घर और संसार चलता है. आपको क्या पता एक मछुआरे का उसकी नाव से कैसा लगाव होता है बाबू, दुआ करना किसी मछुआरे की नाव उससे कभी दूर नहीं हो."

Image caption राहत शिविरों में तूफ़ान से प्रभावित मछुआरों के खाने की व्यवस्था की गई है

हरिपुर के रहने वाले राम बाबू का कहना है कि कुछ कश्तियों को तूफ़ान के अगले दिन समुद्र ने वापस तट पर फ़ेंका लेकिन वो पूरी तरह से नष्ट हो चुकीं हैं.

वह कहते हैं: "अब हमारे सामने रोज़गार का बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. पहला ये कि हम अपने घर कैसे बनायेंगे. दूसरा ये कि परिवार का पेट कैसे भरेंगे"

दो दिन पहले शनिवार को पायलिन तूफ़ान गोपालपुर में तट से टकराया था. तब उसकी स्पीड 270-280 किलोमीटर प्रति घंटा की थी. ये तो शुक्र है कि सरकार ने अलर्ट जारी करते हुए तुरंत सभी मछुआरों को राहत शिविरों में भेज दिया था. लिहाज़ा इस इलाके में किसी की जान नहीं गई.

हर ओर बर्बादी के निशां

गोपालपुर समुद्री तट पर मछुआरों की दो बस्तियां गोपालपुर और साईं बस्ती है. कुल मिलाकर 700 से 800 कच्चे घर हैं. कोई भी साबुत नहीं बचा. सभी टूट-फूट गए.

तट की ओर मजबूती से बांधी गईं करीब 200 नावें बह गईं. कुछ नावों को तूफ़ान के बाद समुद्र ने वापस ला पटका, लेकिन अब वो इतनी ख़राब हालत में हैं कि किसी काम लायक नहीं रहीं.

इस इलाके में पैदल ही पहुंचा सकता है. तूफ़ान से बर्बादी हर ओर दिखती है. लगता है मानो इलाके को किसी ने निचोड़ लिया.

Image caption यही वो तट है, जहां पायलिन तूफ़ान सबसे पहले टकराया था, अब यहां सन्नाटा है

नज़र आते हैं - टूटे हुए घर, बिखरे हुए सामान, टेढ़े-मेढ़े बिजली के खंबे.

मछुआरे और उनका परिवार अपने घरों को दुरुस्त करने में लगे हैं. लेकिन साफ़ दिखता है यहां सरकार के मदद की भरपूर जरूरत है.

सौ साल पुराना बरगद भी नहीं बचा

इस इलाके में सौ साल पुराना एक बरगद का पेड़ है, जो 1999 में आए तूफ़ान में मजबूती से खड़ा रहा लेकिन अबकी बार ऐसा नहीं हुआ. अब वह लकड़ी की ठूंठ की मानिंद रह गया है.

इलाके में बनाये गये तीन राहत शिविरों के प्रभारी अशोक पंडा कहते हैं, '' हमने 700-800 लोगों की खाने-पीने और रहने की व्यवस्था की है. बिजली के लिए जेनरेटर है. मछुआरे यहां रह रहे है.''

तूफ़ान के बाद इलाके के विधायक जरूर यहां का हाल देखने आए लेकिन उसके अलावा अभी यहां कोई अधिकारी नहीं आया है. न ही अब तक नुकसान का आकलन किया गया है.

ओडिशा राज्य सरकार का आकलन है कि पायलिन तूफ़ान से राज्य में 2400 करोड़ रुपयों से ज़्यादा का माली नुकसान हुआ है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार