मुज़फ़्फ़रनगर दंगे: शिविरों में दम तोड़ती उम्मीदें

बहुत से दंगा पीड़ित अब भी शिविरों में रह रहे हैं

पानीपत की ऐतिहासिक रणभूमि से तक़रीबन तीस किलोमीटर दूर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ ग्रामीण इलाकों में जगह-जगह रंग बिरंगे शिविरों की बस्तियां नजर आएंगी.

ये शिविर भले ही रंगीन हैं लेकिन इनके नीचे अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वालों की जिंदगी में कोई रंग नहीं.

पिछले महीने जब मुज़फ़्फ़रनगर के ग्रामीण इलाके दंगों की आग में जल रहे थे तो ये लोग जान बचाने के लिए अपने घर बार छोड़कर भागे थे और एक महीने बाद भी वापस लौटने के लिए तैयार नहीं हैं.

सलमा और उनके पति भी हज़ारों मुसलमानों के इस हुजूम में शामिल हैं जिन्होंने कैराना के करीब मलकपुर के शिविर में शरण ले रखी है.

उनका कहना है, “सात सितंबर की शाम एलान किया गया कि गांव के मुसलमानों पर हमला करो लेकिन कुछ जाटों ने हमसे आकर कहा कि परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. आपको कुछ नहीं होगा, हम आपकी हिफ़ाज़त करेंगे... लेकिन अगले दिन सुबह मार काट शुरू हो गई.. हमारा घर जला दिया गया. हम जान बचाने के लिए खेतों में भागे. इस अफ़रातफ़री में मेरी चार महीने की बच्ची घर पर ही रह गई. उसे ज़िंदा जला दिया गया.”

इस दंगे में एक तरफ जाट थे और दूसरी तरफ मुसलमान. इस इलाक़े में जाटों का दबदबा है और मुसलमान ज़्यादातर उनके खेतों में काम करते हैं.

दंगों में लोगों की मौत तो हुई ही, हज़ारों लोगों ने भाग कर राहत शिविरों में शरण ली.

'उन्हीं की गुलामी करते थे'

जमीला ख़ातून (असली नाम नहीं) की बेटी इनमें शामिल नहीं है. जब जमीला और उनके पति बच्चों को लेकर भाग रहे थे तो उनकी एक बेटी को हमलावरों ने पकड़ लिया. इस बच्ची का शव नहीं मिल सका है.

उनका कहना है, “हमने मुड़ कर देखा, उन्होंने हमारी बेटी को पकड़ रखा था. हम वापस नहीं गए क्योंकि वो हमें भी मार देते.”

Image caption राहत शिविरों में रह रहे लोग घर नहीं लौटना चाहते हैं

दंगों के दौरान यौन उत्पीड़न के बहुत से आरोप तो सामने आए हैं, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी कहती हैं कि इनकी सही संख्या का किसी को अंदाज़ा नहीं है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में औरतें बदनामी के डर से ख़ामोश रह जाती हैं.

हिंसा तो अब ख़त्म हो गई है लेकिन ख़ौफ़ का माहौल नहीं. अभी भी सैकड़ों लोग इन अस्थायी शिविरों में नई ज़िंदगी शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं. ये ज़्यादातर मेहनत मजदूरी करने वाले ग़रीब लोग हैं. जिससे भी बात करें, सबकी ज़बान पर एक बात है.

“हम तो उन्हीं की ग़ुलामी करते थे. उन्होंने हमारे साथ नाइंसाफ़ी की है. हम किसी भी हालत में वापस नहीं जाएंगे. सरकार हमसे कह रही है कि तुम्हारे पक्के घर बनवा देंगे. लेकिन इन लोगों का क्या भरोसा, जिन्होंने हम पर हमला किया था. हम सड़क पर जिंदगी बिता लेंगे, लेकिन वापस नहीं जाएंगे. अब कोई हमारी मदद करे या न करे.”

मंज़िल बहुत दूर है

उत्तर प्रदेश सरकार और ज़िला प्रशासन का दावा है कि सभी अभियुक्तों के खिलाफ़ कार्रवाई की जा रही है.

दो विधायकों समेत दो दर्जन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है जबकि एक सांसद को गिरफ़्तार करने की कोशिशें जारी हैं. इसके अलावा सरकार ने मरने वालों के परिजनों के लिए सरकारी नौकरियों और तमाम पीड़ितों के लिए मुआवज़े का एलान किया है.

स्थानीय लोग भी मानते हैं कि दंगा पीड़ितों के लिए अपने घरों को लौटना आसान नहीं होगा, क्योंकि ‘ग्रामीण इलाकों में दुश्मनियां आसानी से ख़त्म नहीं होती हैं. सब एक दूसरे को जानते हैं. सबको मालूम होता है कि उन पर हमला करना वाले कौन थे. ये ग़रीब लोग हैं. ये हमला करने वालों के सामने खड़े नहीं हो सकते.’

बुनियादी सुविधाओं से वंचित इन गंदे शिविरों में अब मदद का सिलसिला भी ख़त्म होता जा रहा है और प्लास्टिक के इन रंग बिरंगे शिविरों के नीचे उम्मीद दम तोड़ रही है. यहां नई ज़िंदगी की शुरुआत भी है और अंधेरे भविष्य का ख़ौफ़ भी.

इन लोगों के घर तो क़रीब हैं लेकिन मंज़िल बहुत दूर है.

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