जब छात्र नेता हों पचास साल के तो...

छात्र राजनीति

भारत में छात्र राजनीति विश्वविद्यालयीय शिक्षण व्यवस्था का अहम घटक रही है. चाहे वो जेएनयू हो, डीयू हो, एएमयू हो या फिर लखनऊ, इलाहाबाद या बनारस हिंदू विश्वविद्यालय - शिक्षा के इन महत्वपूर्ण केंद्रों में आज़ादी के बाद से छात्र राजनीति ने न केवल छात्रों की समस्याओं को केंद्र में रखकर अपनी गतिशीलता बनाए रखी है बल्कि छात्र राजनीति से निकले नेताओं ने देश की राजनीति के वृहत्तर फलक पर भी अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई है.

हालांकि बीएचयू के संस्थापक मदन मोहन मालवीय ने 'छात्र और राजनीति' नामक लेख में लिखा था कि जब तक राष्ट्र पर कोई बड़ा संकट न हो तब तक छात्रों को राजनीति से दूरी रखनी चाहिए और अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित करना चाहिए ताकि वो एक बुद्धिजीवी नागरिक बन सकें और देश की उन्नति में ज़्यादा बेहतर योगदान दे सकें.

आज़ादी के बाद

लेकिन भारत की आज़ादी के बाद कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में पढ़नेवाले और आदर्श से भरे छात्रों ने मालवीय जी की इस राय से शायद ही कभी इत्तेफ़ाक़ रखा और लगातार विश्वविद्यालय की राजनीति सक्रिय राजनीति की पाठशाला के रूप में ही विकसित होती रही.

इसके कारण भी थे. आज़ादी पाने के बाद देश के युवाओं में रोज़गार, खुशहाली के जो सपने जगे थे वो जल्दी ही चकनाचूर हो गए और इसकी सबसे पहली मार विश्वविद्यालयों में शिक्षा ले रहे छात्रों पर ही पड़ी.

ये वो युवा थे जो शिक्षित थे, रोज़गार के क़ाबिल थे, देश के विकास में अहम भूमिका निभाने को तैयार बैठे थे. लेकिन एक पिछड़े देश के पास इतनी सहूलियतें नहीं थीं कि वो सभी शिक्षित युवाओं को रोज़गार के अवसर दे पाता.

छात्र एक दोराहे पर खड़ा था. या तो वो अपने टूटे सपनों के साथ जीना सीख लेता या फिर व्यवस्था के खिलाफ़ आंदोलन करता.

ऐसे ही छात्रों की उम्मीदों की रोशनी बने थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण जिनके व्यवस्था विरोधी आंदोलन ने हज़ारों की संख्या में छात्रों को प्रेरित किया था और देखते ही देखते लालू, नीतीश, सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, शरद यादव, अरुण जेटली, विजय गोयल जैसे छात्र नेताओं की एक पूरी पीढ़ी तैयार हो गई थी.

जेपी आंदोलन

कह सकते हैं कि देश और समाज में व्याप्त अव्यवस्थाओं ने ही इन छात्रों को प्रेरित किया था और जब इंदिरा गांधी ने जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के जवाब में इमरजेंसी घोषित कर दी तो अपना घरबार छोड़ आंदोलन करनेवाले सैकड़ों छात्र नेता

सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए थे. रिहाई के बाद कालक्रम में इनमें से कई छात्र नेता बड़े राजनेता के रूप में उभऱे.

जेपी से पहले गुजरात में छात्रों की अगुवाई में नवनिर्माण आंदोलन ने कथित रूप से भ्रष्ट गुजरात सरकार को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर कर दिया.

लेकिन पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में छात्र राजनीति में एक गिरावट का रुख देखने को मिल रहा है.

हालांकि इसमें एक ज़बर्दस्त उबाल तब आया जब 90 के दशक की शुरुआत में मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के आधार पर आरक्षण की नीति लागू हुई थी.

बीएचयू और जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे और प्रसिद्ध समाजशास्त्री आनंद कुमार इसे याद करते हुए कहते हैं, "ये वो दौर था जब अस्मिता की राजनीति ने अस्तित्व और साझेदारी के सवालों को पीछे छोड़ दिया था. ये दौर मंडलीकरण का था, मंदिर मस्जिद का था और भूमंडलीकरण का था."

बीएययू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष आनंद प्रधान कहते हैं कि ये उबाल दरअसल छात्र राजनीति को कमज़ोर करने वाला साबित हुआ क्योंकि अपनी एकता के लिए जानी जानेवाली छात्र राजनीति में जाति, धर्म और क्षेत्रीय पहचान प्रमुख हो गए.

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में मध्य पूर्व में हुई जैस्मिन क्रांति में छात्रों की भूमिका, अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में छात्रों की भूमिका, तेलंगाना आंदोलन में ओस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्रों की भूमिका में हम देख चुके हैं कि छात्र एकता और आंदोलन ने किस तरह सत्ता को चुनौती दी है.

छात्र नेता ही बने विरोधी

आनंद प्रधान कहते हैं, "लालू प्रसाद हों या नीतीश कुमार हों - ये लोग जिस छात्र राजनीति से निकले उसे ही इन्होंने हाशिए पर धकेलने का काम किया. लालू प्रसाद 15 साल बिहार की सत्ता पर रहे लेकिन उस दौरान उन्होंने छात्र संघ चुनाव नहीं कराया. उन्हें ये डर लगता था कि अगर छात्र संघ चुनाव हुए तो नए नेता निकलेंगे जो उन्हें चुनौती दे सकते हैं."

80 के दशक के बाद छात्र राजनीति को कमज़ोर करनेवाली एक और वजह रही विश्वविद्यालय परिसरों में होनेवाले हंगामों, हड़तालों और आंदोलनों को क़ानून और व्यवस्था का मामला बनाकर कैंपस में पुलिस की तैनाती कर दी गई.

आनंद प्रधान इसे सत्ता की साज़िश के रूप में देखते हैं, "छात्र संघों को सत्ता विरोध के केंद्र के रूप में देखे जाने की वजह से पहले उन्हें भ्रष्ट बनाया, उन्हें पैसे खिलाए, उसमें ठेकेदारों और अपराधियों को घुसने दिया. दूसरे चरण में उनको बदनाम करना शुरू किया और जब वो बदनाम हो गए तो एक तरह से विद्यार्थियों से भी कट गए और फिर उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया गया जिसका विद्यार्थियों ने भी विरोध नहीं किया. जो तर्क दिया जाता है कि छात्र संघ के न रहने से शिक्षा की स्थिति में सुधार होता है उसका जवाब यही है कि बिहार में 1987 से छात्र संघ चुनाव नहीं हुए तो क्या वहां शिक्षा की स्थिति सुधर गई बल्कि वो और बदतर हुई है."

जेबी संगठन

छात्र राजनीति में गिरावट आने की दूसरी वजह ये थी कि वो अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों के जेबी संगठन बन गए थे. जब राजनीतिक दलों में गिरावट आई तो उसका प्रभाव छात्र राजनीति पर भी दिखाई दिया.

प्रोफ़ेसर आनंद कुमार कहते हैं, "पिछले बीस वर्षों में देखने में आया है कि छात्र राजनीति का अपने-अपने दलों के लिए तो रुझान है लेकिन विद्यार्थियों के सहज सवालों के लिए आज कोई विद्यार्थी मंच उपलब्ध नहीं है अपनी-अपनी राजनीतिक सीमाओं के कारण. और यही वजह है कि आज आइसा, एसएफआई, समाजवादी छात्र संघ, एनएसयूआई, एबीवीपी जैसे छात्र संगठन तो हैं लेकिन जब विद्यार्थी से पूछा जाता है तो वो यही कहते हैं ये हमारे कम हैं और अपने दलों के ज़्यादा हैं."

Image caption दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ में संयुक्त सचिव राजू रावत कहते हैं कि लिंग्दोह समिति ने छात्र राजनीति को नुकसान पहुंचाया है.

दूसरी बात ये कि आइसा, एसएफआई जैसे वामपंथी संगठन जो जेएनयू जैसे कैंपसों में काफ़ी मज़बूत नज़र आते हैं वो कैंपस के बाहर वैसे प्रभावी नज़र नहीं आते. इसकी वजह बताते हुए जेएनयू की पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष अल्बीना शकील कहती हैं, "जहां-जहां विश्वविद्यालय परिसरों में विचारधारा की लड़ाई होती है वहां वामपंथ का बेहतर प्रदर्शन हमेशा रहा है, लेकिन यूनिवर्सिटी से निकलकर आम जनता के बीच काम करना मेरे ख़्याल से पूरे देश में कुछ पॉकेट्स को छोड़कर वामपंथी राजनीति की चुनौती रही है. चुनाव के नतीजे तो यही बताते हैं."

लिंग्दोह समिति

कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव को लेकर साल 2006 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेम्स माइकल लिंग्दोह ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को जो रिपोर्ट दी थी उसमें उम्मीदवारों की आयु, उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड, क्लास में उपस्थिति के प्रतिशत पर इतना ज़ोर दिया कि छात्र संघ राजनीति में संभावनाएं तलाश रहे तमाम उम्मीदवार तकनीकी रूप से चुनाव मैदान से ही बाहर हो गए और इसका देश भर में विरोध भी हुआ.

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने छात्र संघ चुनावों के लिए ये बाध्यकारी कर दिया कि लिंग्दोह समति के सुझावों के आधार पर ही छात्र संघ चुनाव कराए जाएं अन्यथा उन पर रोक लगा दी जाए.

इस वजह से तमाम राज्यों में छात्र संघ चुनाव कई साल तक बाधित रहे. अपने कम खर्च और बेहद लोकतांत्रित तरीके से शैक्षणिक नुकसान के बिना छात्र संघ चुनाव करवाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी छात्र संघ चुनाव कई साल तक नहीं करवाए जा सके.

दिल्ली विश्वविद्यालय में 2013 में बने छात्र संघ में संयुक्त सचिव राजू रावत कहते हैं कि लिंग्दोह कमेटी की सिफारिशें लागू होने से छात्र राजनीति को नुकसान पहुंचा है.

वो कहते हैं, "लिंग्दोह कमेटी की वजह से अच्छे छात्र नेता नहीं उभर पा रहे. जैसे मुझे अगर मालूम हो कि अगले साल भी मैं चुनाव लड़ सकूंगा तो मैं छात्रों के बीच ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताऊंगा, समस्याएं सुलझाऊंगा. लेकिन मुझे पता है कि अगले साल मैं चुनाव नहीं लड़ पाऊंगा तो मैं छात्रों के बीच क्यों जाऊंगा. वैसे छात्र नेता जो छात्रों की समस्याएं सुलझाने में लगे होते हैं वो कक्षा में कम उपस्थित हो पाते हैं, लेकिन लिंग्दोह कमेटी ने शर्त लगा दी है कि 75 फीसदी से कम उपस्थिति वाला छात्र चुनाव लड़ ही नहीं सकता. इस वजह से अच्छे छात्र नेता नहीं उभर पा रहे."

छात्र राजनीति की ज़रूरत?

Image caption लालू प्रसाद यादव की तरह ही नीतीश भी जेपी आंदोलन की ही उपज हैं.

इस बीच एक विचार और ज़ोर पकड़ने लगा कि छात्र राजनीति की ज़रूरत ही क्या है. विश्वविद्यालय तो पढ़ने के लिए होते हैं वहां छात्र राजनीति कर बेवजह अपना वक्त ख़राब करते हैं. जेएनयू के पूर्व कुलपति बीबी भटटाचार्य कहते हैं कि कैंपस में राजनीति होनी ही नहीं चाहिए.

"राजनीति और विश्वविद्यालय दुनिया में कहीं एक साथ नहीं चलते, ऑक्सफ़ोर्ड में भी यूनियन नहीं है डिबेटिंग सोसायटी है. केंब्रिज में यूनियन होती ही नहीं है. आज शिक्षक की पहचान भी राजनीतिक दलों से होने लगी है. मेरे हिसाब से शिक्षा का भला इसी में है कि कैंपस में राजनीति न हो, छात्र वहां पढ़ने के लिए आते हैं, उन्हें पढ़ाई ही करनी चाहिए."

शायद इन्हीं सब वजहों से आज भारत के तमाम विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति का अस्तित्व तो है लेकिन उसमें वैसी धार नज़र नहीं आती जैसी पहले देखने को मिलती थी.

एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद अशोक तंवर कहते हैं, "मैं जब एनएसयूआई में था तो देश भर के कैंपसों में जाता था. वहां लोग बताते थे कि भैया छात्र नेता हैं जबकि उनकी उम्र होती थी 50 साल. ये छात्र राजनीति नहीं है. इसीलिए लिंग्दोह कमेटी की ज़रूरत पड़ी और उसके सुझाव छात्र राजनीति के हित में ही हैं."

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक बार दिलचस्प स्थिति पैदा हो गई जब एक पचास वर्षीय शक्स ने यूनियन के अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और उसी विश्वविद्यालय में पढ़ रहे उनके बेटे ने उनके पक्ष में चुनाव प्रचार किया.

भारत सरकार के उच्च शिक्षा सचिव अशोक ठाकुर इस बारे में कहते हैं, "लिंग्दोह कमेटी के सुझावों के दायरे में छात्रसंघ चुनाव एक सही क़दम है और इसका समर्थन किया जाना चाहिए. हो सकता है कि किसी-किसी विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति की दिशा सकारात्मक न रही हो और वहां के कुलपति ने विश्वविद्यालय के वृहत्तर हित के लिए उसपर रोक लगा दी, लेकिन मेरा मानना है कि यदि सही स्पिरिट में छात्र राजनीति की जा रही है तो ये बहुत अच्छी चीज़ है."

बहरहाल, आज भारत के तमाम विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति की वस्तुस्थिति यही है कि उनका अस्तित्व तो है लेकिन उसमें वैसी धार नज़र नहीं आती जैसी पहले देखने को मिलती थी. शायद इसी वजह से पिछले 10-15 सालों में शालू मलिक, अलका लांबा, रागिनी नायक, नकुल भारद्वाज, अशोक तंवर जैसे छात्र नेताओं की राजनीतिक उपस्थिति तो नज़र आती है लेकिन वैसा प्रभाव नज़र नहीं आता जैसा जेपी के ज़माने के छात्र नेताओं का था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार