'इंजीनियरिंग और प्रबंधन के आगे जहाँ और भी हैं'

  • 20 अक्तूबर 2013

दिल्ली के आलोक सक्सेना ने जब अपनी सीबीएसई परीक्षा के बाद विज्ञान में बारहवीं करने का फ़ैसला किया तो सबने यही सोचा कि ये बिल्कुल सही है.

कक्षा 10 में 95 फ़ीसदी अंक लाने वाले आलोक से यही अपेक्षा की जा सकती थी. लेकिन जब आलोक ने ग्यारहवीं कक्षा में अपनी पढ़ाई शुरू की तो उन्होंने पाया कि भौतिकी, रसायनशास्त्र और गणित का सिलेबस उनके मिजाज़ से मेल नहीं खाता.

कुछ ही दिनों में वो बोर हो गए और अपने आप को रोबोट जैसा महसूस करने लगे. उन्हें लगा कि दुनिया को अंकों, आंकड़ों और तथ्यों के नज़रिए से देखने में भी कोई मज़ा है भला! उन्होंने अपनी इस मुसीबत का इलाज संगीत और फ़ुटबॉल में ढूंढ़ा.

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ज़ाहिर है इसका असर उनके नंबरों पर पड़ा. उनके अध्यापक उनके ‘ख़राब प्रदर्शन’ से हक्के बक्के रह गए. आलोक दक्षिणी दिल्ली के सबसे नामी स्कूलों में पढ़ रहे थे जहाँ के छात्रों का 12वीं में औसत स्कोर 85 फ़ीसदी हुआ करता था. घरेलू परीक्षा में जब आलोक को इससे भी कम अंक मिले तो स्कूल की प्रिंसिपल का माथा ठनकना स्वाभाविक था.

'आर्ट यानी कमज़ोर छात्र'

आलोक के माता मिता को तलब किया गया और उनको उनके ही सामने डांट पिलाई गई कि पढ़ाई में लापरवाही करना बंद करें. आलोक किसी तरह 12वीं में 83 फ़ीसदी अंक से पास हो गए लेकिन कक्षा 12 के बाद आलोक ने अपने माता पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ तय किया कि वो राजनीतिशास्त्र में बीए (ऑनर्स) करेंगे.

Image caption भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद की लाइब्रेरी में पढ़ते युवा प्रबंधक.

वो लाखों भारतीय बच्चों की तरह आईआईटी-जी या किसी और इंजीनियरिंग या डॉक्टरी की प्रवेश परीक्षा में बैठ सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा किया नहीं. उनके इस फ़ैसले से कई भृकुटियाँ तनीं और उनके स्कूल के साथियों ने राय बनाई कि आलोक का सिर फिर गया है.

उनकी नज़र में लिबरल आर्ट में वही लोग दाखिला लेते हैं जो पढ़ाई में कमज़ोर होते हैं और उनके लिए नौकरी के बहुत कम विकल्प मौजूद होते हैं. आम राय यही है कि मानविकी में वही लोग आते हैं जिन्हें विज्ञान के कॉलेजों में या तो दाखिला नहीं मिल पाया है या उनके माता पिता बहुत अमीर हैं, इसलिए उन्हें नौकरी की कोई चिंता नहीं है.

आईटी कंपनियाँ जिस तरह इंजीनियरों की थोक के भाव भर्ती करती हैं उसके ठीक विपरीत मानविकी के स्नातक के लिए सिर्फ़ सरकारी विभागों या शिक्षा के क्षेत्र में ही नौकरियाँ उपलब्ध रहती हैं. भारत में लिबरल ऑर्ट्स की शिक्षा के न फलफूल पाने का एक और कारण है इसकी शिक्षा का स्तर.

मुझे याद है स्कूल में मेरे इतिहास और भूगोल के शिक्षक पाठ्यपुस्तक से सीधे पढ़ाते थे और लेक्चर के बाद पाठ के अंत में दिए प्रश्नों के उत्तर लिखवा देते थे. मेरे इतिहास में अच्छे नंबर ज़रूर आए थे लेकिन इसके पीछे शिक्षक की भूमिका कम और मेरी विषय में अतिरिक्त रुचि ज़्यादा ज़िम्मेदार थी.

शिक्षण के तरीकों पर सवाल

भारत के अधिकतर कला छात्रों के लिए यही कहानी कॉलेजों में भी दोहराई जाती है. हाँ कुछ गिने चुने कॉलेज ज़रूर अपवाद हैं जहाँ के शिक्षक अतिरिक्त जानकारी पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं. अगर आपको इन कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल पाता तो ले-दे कर आपके पास यही विकल्प बचता है कि किसी साधारण कॉलेज में दाखिला ले कर अपने पसंद का विषय पढ़ा जाए या फिऱ किसी मामूली इंजीनियरिंग कालेज का रुख किया जाए.

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एक साधारण इंजीनियर के लिए एक साधारण समाजशास्त्री या राजनीति शास्त्र के छात्र से बेहतर नौकरी के अवसर मौजूद रहते हैं. कुछ जानेमाने कॉलेजों जैसे सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज, एलएसआर, प्रेसिडेंसी या लॉयोला कॉलेज की बात छोड़ दी जाए, तो बीए में दाखिला लेने में छात्रों की उतनी ही रुचि रहती है जितनी शायद सोमालिया की नागरिकता लेने में.

Image caption भारत में हावर्ड जैसे उच्च कोटि के शिक्षण संस्थानों की कमी महसूस होती रही है.

पिछले दिनों आईसीआईसीआई बैंक के पूर्व प्रमुख केवी कामथ से बिज़नेस स्टैंडर्ड के संवाददाता ने एक सवाल पूछा, "आप किसी चीज़ में अपने आप को कम पाते हैं?"

कामथ ने काफ़ी देर सोचने के बाद जवाब दिया, "मैं शायद बहुत टेक्निकल इंसान हूँ. ट्रेनिंग से मैं एक इंजीनियर हूँ जिसने एमबीए भी किया है. लेकिन काश मुझे लिबरल आर्ट्स का भी अनुभव मिला होता. अगर ऐसा हो पाता तो मैं शायद बेहतर इंसान और बेहतर लीडर होता."

कुछ वर्षों पहले नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ कॉलेजेज़ एंड एम्पलॉयर्स ने नियोक्ताओं के बीच एक सर्वेक्षण किया था जिसमें ये बात निकल कर सामने आई कि वोडिग्री से अधिक निपुणताओं को ज़्यादा तवज्जो देते हैं.

'निपुणता ज़्यादा महत्वपूर्ण'

निपुणता तो सीखने से आती है लेकिन अच्छे विचार प्रोफ़ेशनल डिग्री भर से नहीं लाए जा सकते.

आर्ट्स के अंदर भी शायद अर्थशास्त्र की वक़त किसी भी भाषा के साहित्य से अधिक है. साहित्य की पढ़ाई के खिलाफ़ अक्सर ये तर्क दिया जाता है कि इसे तो आप अपने खाली समय में भी पढ़ सकते हैं. लेकिन यह सवाल उभरता है कि हम में से कितने लोग अपने खाली समय में खालिस साहित्य पढ़ते हैं?

सिर्फ़ साहित्य ही लिबरल आर्ट्स की श्रेणी में नहीं आता. इस श्रेणी में इतिहास, दर्शन शास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और राजनीतिशास्त्र सभी को रखा जा सकता है.

अमरीका में तो संगीत, कला और यहाँ तक कि प्राकृतिक विज्ञान (भौतिकी, रसायनशास्त्र और जीव विज्ञान) भी इसी श्रेणी में रखे जाते हैं. आम मध्यम वर्ग तबके में ये एक आम सोच है कि अगर आप विज्ञान नहीं पढ़ना चाहते तो उससे थोड़ा कम बेहतर विकल्प कॉमर्स है.

सच्चाई ये है कि कॉमर्स की डिग्री, ह्यूमेनिटीज़ की डिग्री से न तो बेहतर है और न बेकार. ये भी एक भ्रांति है कि कॉमर्स की पढ़ाई से एमबीए में मदद मिलती है. लेकिन ये तथ्य दिलचस्प हैं कि आईआईएम अहमदाबाद के 2012 के बैच में कॉमर्स के 12 फ़ीसदी छात्रों की तुलना में सिर्फ़ 4 फ़ीसदी छात्र आर्ट्स पृष्ठभूमि के थे और पूरे बैच के 75 फ़ीसदी छात्र इंजीनियरिंग करके आए थे.

'मौलिकता की कमी'

इस समय भारत में ऊँचे स्तर के लिबरल आर्ट्स कॉलेज खोले जाने की ज़रूरत है. आईआईटी, आईआईएम और एम्स जैसे संस्थानों के लिए ही ‘उत्कृष्ट संस्थान’ विशेषण इस्तेमाल किया जाता है लेकिन ये हारवर्ड, वॉर्टन या स्टैनफ़र्ड की तरह मल्टी डिसिपलिनरी संस्थान नहीं हैं जहाँ एक परिसर के अंदर ही इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, मेडिसिन और लिबरल आर्ट्स की शिक्षा दी जाती है.

अगर आप नौकरी की संभावनाओं को एक तरफ़ कर दें और इंजीनियरों और डॉक्टरों के सामाजिक पक्ष पर ही ध्यान दें तो आप पाएंगे कि इनमें से अधिकतर में रचनात्मकता और मौलिकता का नितांत अभाव है.

ये लोग आईटी आउटसोर्सिंग कंपनी के एक अच्छे कर्मचारी तो हो सकते हैं लेकिन ये मामूली कम्यूनिकेटर, विचारक या दार्शनिक साबित होते हैं. भारत में जहां अक्सर दुनिया में सबसे अधिक तकनीकी स्नातक होने की शेख़ी बघारी जाती है, हंगरी जैसे छोटे देश से कम नोबेल पुरस्कार आए हैं.

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मज़े की बात ये है कि हंगरी की ख्याति लेखकों और संगीतकारों की वजह से ज़्यादा है न कि इसके डॉक्टरों या इंजीनियरों की वजह से. एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक कृष्ण कुमार तो यहाँ तक मानते हैं कि भारतीय समाज में लिबरल आर्ट्स पर ज़ोर न दिए जाने के कारण ही भारतीय समाज में असहिष्णुता व्याप्त है.

'कल्पनाशीलता ज़्यादा ज़रूरी'

Image caption भारत में चेन्नई का लोयला कॉलेज विज्ञान विषयों के नजरिए से उच्च शिक्षा का अहम केंद्र है.

शिक्षा के क्षेत्र में ख़ासी रुचि रखने वाले प्रताप भानु मेहता कहते हैं, "कोई कविता पढ़ना चाहे या माइक्रोस्कोप से कोई सूक्ष्म चीज़ देखना चाहे या किसी की रुचि अमाल अल्लाना के किसी नाटक को देखने में हो या कोई मध्ययुगीन पांडुलिपी में छिपे किसी रहस्य को ढ़ूँढ़ने में दिलचस्पी रखता हो – ये सभी गतिविधियाँ इंसान को स्वतंत्र रूप से सोचने और फ़ैसले लेने में मदद करती हैं. इनसे मनुष्य का दायरा बढता है, वो नए परिपेक्ष्य की खोज करते हैं और अपने दृष्टिकोण को और मज़बूत बनाने के लिए नए साधनों को ईजाद करते हैं."

उदार शिक्षा का अर्थ है अपने आप को पूरी तरह से बदल डालना. लिबरल आर्ट्स की शिक्षा मस्तिष्क को न सिर्फ़ पूरी तरह से आज़ाद करती है बल्कि उन बिंदुओं को जोड़ने में मदद करती है जिनकी तरफ़ पहले आपका ध्यान ही नहीं गया था. इसकी वजह से ही इंसान किसी विषय पर अपनी सोच बना पाता है.

अल्बर्ट आइंसटीन ने सही कहा है, ''कल्पनाशीलता ज्ञान से ज़्यादा ज़रूरी है. ज्ञान संकुचित है, कल्पनाशीलता कालजयी है.''

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