क्यों बढ़ रही है मानसिक रोगियों की संख्या?

  • 24 अक्तूबर 2013
रांची मानसिक अस्पताल

तेज़ भागती ज़िंदगी और सामाजिक, आर्थिक तानेबाने के बदलने से समाज में मानसिक परेशानियां बढ़ती जा रही हैं, 'रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइकिएट्री एंड एलायड साइंसेज़' (रिनपास) के आंकड़े यही बताते हैं.

12 साल पहले (2001-02) मानसिक अस्पताल में इलाज के लिए 16 हजार 175 मरीज़ आए थे. साल 2012-13 में इनकी संख्या बढ़कर 90 हजार 716 हो गई, ये संख्या ओपीडी की है.

इस साल अप्रैल से सितंबर तक छह महीने में 47 हजार 217 लोग इलाज कराने आ चुके हैं. अमूमन इलाज कराने वालों में 30 फीसदी युवा वर्ग से आते हैं.

मानसिक तौर पर परेशान इंसान जब नियंत्रण से बाहर होते हैं, तब उन्हें भर्ती किया जाता है. अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती किए जाने वाले मरीज़ों की संख्या भी लगातार बढ़ रही हैं.

साल 2001-02 में मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती किए जाने वाले मरीजों की संख्या जहां 1297 थी, वहीं 2012-13 में ये संख्या बढ़कर 2494 हो गई.

अभी अस्पताल में 610 मानसिक रोगी भर्ती हैं. रिनपास के निदेशक डॉक्टर अमूल रंजन सिंह के मुताबिक इनमें लगभग 40 फीसदी महिलाएं हैं. ओपीडी में भी इलाज कराने वाली महिलाओं की औसत संख्या ऐसी ही है.

Image caption डॉक्टर अमूल रंजन सिंह के मुताबिक युवा वर्ग तनाव से गुज़र रहा है.

रिनपास के मनोचिकित्सक महीने में चार दिन झारखंड में चार जगहों - जोन्हा, खूंटी, सरायकेला और हजारीबाग में कैंप लगाकर मनोरोगियों का इलाज करते हैं.

आंकड़े बताते हैं कि साल 2001 में शिविरों में इलाज कराने वालों की संख्या जहां 1321 थी, वहीं साल 2012-13 में ये संख्या बढ़कर 30,812 हो गई.

'इलाज की सुविधाएं बढ़ी'

हालांकि रिनपास के निदेशक डॉक्टर अमूल रंजन सिंह का कहना है कि समाज में जागरूकता बढ़ने, नई दवाइयों के इजाद होने और इलाज की बेहतर सुविधाओं की वजह से मरीज़ों की संख्या बढ़ी है.

उनका कहना है कि अब लोग अस्पताल में इलाज कराने से संकोच नहीं करते और गांवों में चिकित्सा कैंप लगवाने के लिए भी लोग अस्पताल पहुंचने लगे हैं.

उनका कहना है कि तनाव, अवसाद, स्लीपिंग डिसऑर्डर, याददाश्त जाना, स्कित्ज़ोफ्रेनिया और नशे की लत जैसे लक्षण ज़्यादा सामने आ रहे हैं.

डॉक्टर अमूल रंजन सिंह कहते हैं, "एकैडमिक दबाव, बेहतर रोज़गार पाने और महत्वाकांक्षा के कारण युवा वर्ग तनाव से गुज़र रहा है."

इलाज कराने आए एक युवक जीतेंद्र सिंह से हमारी बात हुई. वे बीए पार्ट टू के छात्र हैं. वे बताते हैं कि उन्हें बहुत तनाव रहता है और किसी काम में मन नहीं लगता. लगता है कि वे कुछ खोते जा रहे हैं.

रिनपास के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर कप्तान सिंह सेंगर कहते हैं, "ज़िंदगी की रफ्तार तेज़ होती जा रही हैं. कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा हासिल करने की प्रवृति बढ़ी है. लिहाज़ा जब तनाव एक स्तर से ज़्यादा हो जाता है तो यह डिप्रेशन में बदल जाता है."

'गांवों का टूटता तानाबाना'

मानसिक रोग विशेषज्ञ मानते हैं कि गांवों में सामाजिक, आर्थिक तानाबाना बदलने से परेशानियां बढ़ी हैं. परिवार टूट रहे हैं, बेरोज़गारी और अशिक्षा की वजह से भी मानसिक परेशानियां बढ़ रही हैं.

बिहार के भभुआ से अपने बेटे भरत का इलाज कराने के लिए संतोष तीन साल से रिनपास आ रही हैं.

उन्होंने बताया कि उनके बेटे मज़दूरी करते हैं और परिवार चलाने का ज़िम्मा उन्हीं के कंधों पर है.

बिहार के खगड़िया से इलाज कराने आए 16 साल के अंकित अस्पताल के एक कोने में गुमसुम बैठे है.

अंकित पूछने पर बताते हैं कि उन्हें कुछ याद नहीं रहता. गरीबी की वजह से वो केवल आठवीं तक ही पढ़ पाए. डॉक्टर कहते हैं कि इलाज से अंकित पूरी तरह ठीक हो सकते हैं.

'आदिवासी भी परेशान'

रिनपास में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि झारखंड के 21 से 40 साल की उम्र के आदिवासी युवाओं में मनोरोग की समस्या ज्यादा है.

Image caption रिनपास के अध्ययन के मुताबिक मानसिक रोगों को गांवों में अक्सर कुदरती परेशानी माना जाता है.

रिनपास के सामाजिक मनोचिकित्सक राजकिशोर मुंडा ने 389 आदिवासी मनोरोगियों को अध्ययन में शामिल किया.

राजकिशोर मुंडा ने बताया कि 10 फीसदी से ज़्यादा लोग डिप्रेशन और 22 फीसदी से ज्यादा लोग स्कित्ज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित थे.

राजकिशोर मुंडा के मुताबिक अध्ययन में पता चला है कि आज़ाद जीवन जीने वाले आदिवासी युवाओं पर जब ज़िम्मेदारी बढ़ती है तो वे मानसिक संतुलन खो बैठते हैं.

कई मनोरोगियों और उनके परिजनों से बातचीत करने पर यह तथ्य भी उभर कर सामने आए कि गांवों में मानसिक परेशानी को रोग समझने के बजाय कुदरती परेशानी माना जाता है.

इसके बाद लोग लंबे समय तक ओझा-गुनी, झाड़-फूंक के चक्कर में रहते हैं और फिर अस्पताल आते हैं.

हालांकि डॉक्टर कप्तान सिंह सेंगर का कहना है कि अब परिस्थितियां बदल रही हैं. वो बताते हैं कि समय पर और नियमित तौर पर दवा खाने से 40 फीसदी रोगी सामान्य जीवन हासिल कर लेते हैं.

(पहचान छिपाने के लिए कुछ मरीज़ों और उनके परिजनों के नाम बदल दिए गए हैं.)

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