बिहारः मोदी की रैली से पहले भाकपा ने दिखाई ताकत

आगामी आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए बिहार में भी राजनीतिक दलों ने ज़ोरदार तैयारी शुरू कर दी है. इसी के मद्देनजर पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में एक-के-बाद एक तीन राज्य स्तरीय रैलियां तय थीं.

शुक्रवार को भाकपा ने जनाक्रोश रैली से इसका आगाज़ किया. रैली में जुटी भीड़ पार्टी के लिए उत्साहवर्द्धक रही. रैली में आए कई पार्टी समर्थकों ने इसे पिछले साल पार्टी कांग्रेस के दौरान हुई रैली के मुकाबले सफल रैली करार दिया.

रैली में पार्टी के महासचिव एस सुधाकर रेड्डी ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को पूंजीवादी पार्टी बताया और कहा कि इनका मूल उद्देश्य संपन्न लोगों के हित में काम करना है. साथ ही उन्होंने राज्य सरकार पर भी विकास के नाम पर आंकड़ों की बाज़ीगरी करने का आरोप लगाया.

Image caption पटना में इस समय राजनीतिक दलों के पोस्टरों की भरमार है

दूसरी ओर सुधाकर रेड्डी ने भाजपा जैसी सांप्रदायिकत ताकतों को देश के लिए खतरा भी बताया.

वहीं भाकपा नेता एबी बर्द्धन ने महंगाई के लिए केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि धरती माता ने प्याज उपजाना बंद नहीं किया है लेकिन केंद्र सरकार जमाख़ोरी रोककर दाम बांधने में असफल रही है.

उन्होंने साथ ही अनाज और खाद्य पदार्थों की फॉरवर्ड ट्रेडिंग रोकने की मांग भी की.

पार्टी नेता और सांसद गुरुदास दासगुप्ता ने आरोप लगाया कि महंगाई के कारण बिहारी मज़दूरों को सत्तू के साथ अब प्याज़ खाने को नहीं मिल रहा है और दाल अब गरीब शादी जैसे आयोजनों में ही खा पाते हैं.

भाकपा ने बदली रणनीति

भाकपा ने यह रैली मई में तब तय की थी जब राज्य में एनडीए की सरकार थी. लेकिन समय बीतने के साथ सूबे के राजनीतिक हालात भी बदले और भाकपा की रणनीति और तेवर भी. बिहार में जब एनडीए की सरकार थी तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पार्टी के सीधे निशाने पर होते थे.

लेकिन अब पार्टी राज्य सरकार की तीखी आलोचना से बचती है. शुक्रवार को भी ऐसा ही देखने को मिला.

रैली में भाकपा नेताओं ने एकाध मौकों को छोड़कर नीतीश सरकार की सीधी आलोचना नहीं की. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि जदयू और भाकपा आगामी लोक सभा चुनाव साथ मिल कर लड़ सकते हैं.

बहुचर्चित हुंकार रैली रविवार को

जदयू ने भाजपा में नरेंद्र मोदी के बढ़ते कद के कारण जून में उससे गठबंधन तोड़ लिया था. गठबंधन टूटने के बाद भाजपा ने 27 अक्तूबर को गांधी मैदान में हुंकार रैली करने का घोषणा की थी.

Image caption भाकपा ने भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश की

इस तरह बिहार में भाजपा को नरेंद्र मोदी के कारण ही यह रैली करने के लिए कमर कसनी पड़ी है.

नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा से अलग होकर जदयू ने यह संदेश दिया था कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा अब राजनीतिक दलों के बीच स्वीकार्य नहीं होगी. ऐसे में आम जनता के बीच मोदी की स्वीकार्यता दिखाने के लिए पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है.

रैली के राजनीतिक उद्देश्यों के संबंध में बिहार भाजपा अध्यक्ष मंगल पांडेय ने बताया, ‘यह रैली नीतीश कुमार के विश्वासघात को धिक्कारने और कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के आह्वान के लिए की जा रही है. साथ ही रैली में केंद्र से बिहार के लिए पचास हजार करोड़ के विशेष पैकेज की मांग भी की जाएगी.’

विवाद के बहाने चर्चा

पटना का ज्यादातर हिस्सा पार्टी के झंडे, पोस्टर, तोरणद्वार, बैनरों से अटा पड़ा है. साथ ही इनके कारण विवाद भी हुए हैं.

आम लोगों और पटना नगर-निगम की यह शिकायत है कि बैनर, होर्डिंग्स आदि बेतरतीब ढंग से और बिना पूर्व अनुमति के लगा दिए गए हैं. प्रशासन ने कई जगहों से अवैध बैनर आदि को हटाया भी है.

दूसरी ओर 24 अक्तूबर को भाजपा के कुम्हरार विधायक अरूण कुमार सिन्हा ने राजधानी के कदमकुंआ इलाके में नरेंद्र मोदी के पोस्टरों को फाड़ने और उनपर कालिख पोतने के संबंध में अज्ञात लोगों के खिलाफ एक प्राथमिकी भी दर्ज करवाई है.

वैसे रैली की घोषणा के बाद से ही भाजपा की कोशिश रही है कि छोटे-बड़े विवादों के बहाने इसे चर्चा में बनाए रखा जाए. पहले पार्टी ने आधा गांधी मैदान दिए जाने के कारण विरोध दर्ज कराया तो उसके बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बिहार यात्रा के बहाने राज्य सरकार पर निशाना साधा.

पार्टी का कहना था कि रैली को विफल करने के लिए सरकार ने 27 अक्तूबर को राष्ट्रपति का बिहार दौरा तय करवाया है.

बिहार में नरेंद्र मोदी की जातीय पृष्ठभूमि भी महत्त्वपूर्ण हो गई है. उन्हें सूबे में विकास पुरूष के साथ-साथ पिछड़े वर्ग से आने वाले नेता के रूप में भी पेश किया जा रहा है.

यह रणनीति नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के काट के बतौर अपनाई गई है. बिहार के ये दोनों कद्दावर नेता भी पिछड़े वर्ग से आते हैं.

भाजपा का ‘मोदी टी स्टॉल’

पटना में भाजपा की पहल पर कई चाय दुकानों में मोदी के बड़े-बड़े तस्वीरों वाले फ्लैक्स टांग कर उन्हें ‘मोदी टी स्टॉल’ का नाम दिया गया है. साथ ही इसके लिए हामी भरने वाले दुकानदारों को पार्टी द्वारा आर्थिक मदद दिए जाने की भी खबरें हैं.

इसके पीछे भाजपा की सोच यह प्रचारित करना है कि नरेंद्र मोदी चाय की दुकानदारी से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी तक पहुंचे हैं.

हालांकि खबरों के अनुसार कई चाय दुकानदार इस सोच के साथ मोदी की तस्वीरें टाँगने को तैयार नहीं हुए कि इससे मादी विरोधी या तटस्थ लोग उनकी दुकानों पर शायद न आएं.

खबरदार करेगी भाकपा (माले)

तीन रैलियों में अंतिम रैली है भाकपा (माले) द्वारा आयोजित होने वाली ख़बरदार रैली. यह रैली आगामी बुधवार 30 अक्तूबर को आयोजित होगी. भाजपा की तरह ही माले की रैली में भी केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही निशाने पर रहेंगे.

इस रैली के ज़रिए माले की योजना देश के वर्तमान आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार, महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी, सांप्रदायिकता और फासीवाद आदि के खतरे के प्रति आम जनता को सचेत करने की है. रैली के लिए पार्टी ने नारा दिया है, ‘सामंती-सांप्रदायिक ताकतों खबरदार, बिहार की जनता है तैयार’.

रैली की तैयारी में माले ने पूरी ताकत झोंक दी है. राज्य भर में पार्टी जन-संपर्क, नुक्कड़ नाटक औार छोटी-छोटी सभाओं के जरिए रैली के लिए समर्थन जुटा रही है. साथ ही पार्टी के सांस्कृतिक संगठन हिरावल के गीतों की ऑडियो सीडी भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो चुकी है.

खासकर ग्रामीण इलाकों में समता राय की आवाज में ‘चाहे चले लाठी-गोलियां... करबई खबरदार रैलियां’ गीत काफी पसंद किया ज रहा है.

दूसरी ओर लक्ष्मणपुर-बाथे नरसंहार के फैसले ने पार्टी के लिए इस रैली का महत्व बढ़ा दिया है. संसदीय दलों में भाकपा (माले) ही सबसे मुखर रूप से नरसंहार पीडि़त परिवारों के लिए राजनीतिक और कानूनी लड़ाई लडत़ी रही है.

ऐसे में पार्टी में पूरी कोशिश होगी कि वह अपने समर्थक आधार को उस हताशा और डर से बाहर निकालने के लिए रैली के माध्यम से जोश भरे जो हाइकोर्ट के फ़ैसले के बाद उनमें घर कर गया है.

कांग्रेस भी कस रही है कमर

आम चुनावों को देखते हुए कांग्रेस बिहार में भी पूरी जोर आज़माइश की तैयारी में है. पार्टी द्वारा सोमवार 21 अक्तूबर को बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की जयंती मनाई गयी. कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश और सचिन पायलट ने भी इसमें शिरकत की थी.

इस मौके कुछ नेताओं ने नाम लेकर भाजपा नेता नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा तो कुछ ने इशारों-इशारों में. दूसरी ओर कार्यक्रम में कांग्रेस नेताओं ने नीतीश सरकार पर जोरदार हमला नहीं बोला.

गौरतलब है कि बिहार में एनडीए के टूटने के बाद से ही जदयू और कांग्रेस अमूमन एक-दूसरे पर हमलावर होने से बचते रहे हैं. दोनो दलों को संभावित राजनीतिक सहयोगी के रूप में भी देखा जा रहा है.

समारोह में पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांगेस नेता अखिलेश सिंह ने घोषणा की कि जल्द ही पार्टी गांधी मैदान में बड़ी रैली करेगी.

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