ये हैं मंगल के भारतीय 'वास्को डी गामा'

  • 5 नवंबर 2013
मार्स मिशन भारतीय आवेदक

वास्को डी गामा ने 15वीं सदी में हिंदुस्तान की खोज की थी. उसी हिंदुस्तान के बाशिंदे 21वीं सदी में वास्को डी गामा के नक़्शे क़दम पर चलकर मंगल को फ़तह करना चाहते हैं.

यह मिशन है मार्स-वन. डच उद्यमी बास लैंसडॉर्प का वो मिशन जिसके तहत इतिहास में पहली बार चार इंसानों को मंगल पर उतारने का ख़्वाब बुना जा रहा है. इसका पहला चरण पूरा हो चुका है और दुनियाभर से दो लाख लोगों ने अपना आवेदन पेश कर दिया है.

बीबीसी ने मंगल पर जाने के इच्छुक कुछ ऐसे भारतीयों से बात की. उनसे जानना चाहा कि आख़िर वो अपनी दुनिया, बसा-बसाया घर-संसार, परिवार-बच्चे छोड़ मंगल पर क्यों जाना चाहते हैं?

'मज़ाक उड़ाया लोगों ने'

शादीशुदा विनोद कोटिया ऐसे ही एक आवेदक हैं, जिन्होंने मार्स वन मिशन के लिए सबसे पहले आवेदन भेजा. उन्होंने जब अपने घर पर अपने इस फ़ैसले का ज़िक्र किया तो पत्नी को यह मज़ाक लगा. पत्नी प्रियंका ने उनसे मज़ाक में कह भी दिया कि अगर वे चुने गए तो वे रॉकेट के सामने जाकर लेट जाएंगी. वे कहते हैं कि उनके मार्स वन मिशन में आवेदन करने के बाद बचपन के साथी तो उनका मज़ाक उड़ाते हैं, पर उनके दफ़्तर के लोगों को उन पर गर्व है.

Image caption विनोद बचपन से ही एस्ट्रोनॉट बनना चाहते थे. उनके मुताबिक़ मार्स वन के ज़रिए शायद उनका ख़्वाब पूरा हो सकता है.

31 साल के विनोद एक सरकारी कंपनी में मैनेजर हैं. उनकी क़रीब डेढ़ साल की बेटी है, जिसे वह दिलो-जान से चाहते हैं. उसका प्यार भी उन्हें उनके इरादों से पीछे नहीं खींच पाया.

वे कहते हैं, "कोई भी दुनिया में हमेशा के लिए नहीं रहता और न कोई हमेशा अपने परिवार के साथ रह सकता है. एक दिन जब मौत आती है, तो आपको दुनिया छोड़नी ही होती है."

विनोद बचपन से ही अंतरिक्ष यात्री बनना चाहते थे. उन्होंने एयरफ़ोर्स में दाखिल होने की सोची, मगर नाकामयाब रहे. मगर सपना ज़िंदा रहा. मार्स वन की शक्ल में उनके सपने को पंख मिल गए हैं.

मगर क्या वह ख़तरों से परिचित हैं? विनोद कहते हैं, "इस मिशन में उतना ही ख़तरा है, जितना युद्ध में जाने पर होता है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के मुक़ाबले मंगल पर वातावरण तो होगा. हां, रेडीएशन की वजह से आपको सुपर ह्यूमन की तरह ज़िंदा रहना पड़ेगा."

विनोद मानते हैं कि अगर वे मंगल की यात्रा करते हैं तो उन्हें अपना परिवार छोड़ने का दुख ज़रूर होगा, लेकिन इसके लिए वे कुछ नहीं कर सकते. वे कहते हैं कि मानव जाति के लिए 'कुछ लोगों को तो बलिदान करना ही होगा.'

‘मम्मी तो बहुत डर गईं थीं’

तमिलनाडु के कोयंबटूर की श्रद्धा प्रसाद मंगल पर जाने की सबसे ज़्यादा इच्छुक हैं. एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए तैयारी कर रहीं श्रद्धा अभी सिर्फ़ 18 साल की हैं.

जब उन्होंने मार्स वन मिशन के लिए अपना आवेदन भेजा, तो उनके घर में किसी को यक़ीन नहीं था कि वह ऐसा कर सकती हैं. उनके माता-पिता उनके फ़ैसले के सख़्त ख़िलाफ़ थे.

Image caption कोयंबटूर की श्रद्धा अभी सिर्फ़ 18 साल की हैं. इसलिए मार्स वन के लिए आवेदन करने के बाद उन्हें अपने घर में काफ़ी विरोध झेलना पड़ा.

श्रद्धा ने बीबीसी को बताया, "मम्मी सोचने लगीं कि मैं बकवास कर रही हूं. जब मैंने उन्हें अपनी एप्लीकेशन दिखाई, तो वो बोलीं कि तुम ऐसा कैसे कर सकती हो, कैसे दूसरे ग्रह पर जाने का सोच सकती हो, जहां से कोई वापसी नहीं होगी. मम्मी तो बहुत ही डर गई थीं. बाद में मान गईं. मगर मेरे पापा अभी भी इसके लिए तैयार नहीं हैं. शायद वक़्त के साथ वे भी बदल जाएं."

इस फ़ैसले के पीछे क्या प्रेरणा काम कर रही थी. इसके जवाब में वे कहती हैं, "मैं जब 11वीं में थी, तो मैं नासा के लोगों से मिली, जो यहां आए थे. इनमें क्यूरियॉसिटी मिशन के प्रमुख भी थे. इनसे मेरी लंबी बातचीत हुई. स्पेस साइंस में अमूमन लोगों की रुचि जल्दी ख़त्म हो जाती है, पर मेरी दिलचस्पी इसके बाद जुनून में बदल गई है."

श्रद्धा भविष्य में स्पेस कंपनियों के लिए अंतरिक्ष यान और रोवर डिज़ायन करने वाली टीम में काम करना चाहती हैं.

"आपको आख़िरकार एक दिन मरना ही है. मगर मार्स वन कोई सुसाइड मिशन नहीं है. यह पूरी मानवजाति के लिए बेहतर विकल्प की तलाश की कोशिश है."

‘पृथ्वी छोड़ने की ज़रूरत’

दिल्ली के सौरभ रॉडी कहते हैं कि वैसे भी आज लोग धीरे-धीरे अपनी वर्चुअल दुनिया में सिमट रहे हैं. ‘’लोग आजकल अपने घरवालों से फ़ेसबुक-ट्विटर के ज़रिए मिलते हैं. हो सकता है कि आप मंगल पर हों और तब भी आप अपने परिवार को अपनी ख़ैरियत का संदेश भेज सकें.’’

Image caption सौरभ कहते हैं कि ज़रूरी नहीं कि वे इस मिशन के लिए सलेक्ट हों ही, पर अपनी भागीदारी को वे काफ़ी अहम मानते हैं.

हालांकि सौरभ कहते हैं कि उनका मंगल पर जाना इतना अहम नहीं, पर इस मिशन में अपनी भागीदारी को वह अहम मानते हैं.

बास लैंसडॉर्प के मिशन पर आपको कितना यक़ीन है? इस पर वे कहते हैं, "कहना बहुत मुश्किल है. हो सकता है कि यह बुलबुला हो. कम से कम इससे हमें यह तो पता चला है कि कुछ करने की ज़रूरत है. हमें पृथ्वी से कहीं और जाना चाहिए क्योंकि अगर हम इसी ग्रह पर टिके रहे, तो मुमकिन है कि मानव सभ्यता एक हज़ार साल भी न जी पाए."

सौरभ के मुताबिक़ मंगल की यात्रा में सबसे बड़ी चुनौती 'अंतरिक्ष यान के एक छोटे से कमरे में तीन लोगों के साथ सात-आठ महीने वक़्त बिताना होगा.'

मंगल की ज़मीन पर उतरने की तमन्ना रखने वाले मार्स वन के इन आवेदकों में से अगर कोई चुना गया, तो वो उन चार अंतरिक्ष यात्रियों में होंगे, जिन्होंने मंगल को अपना नया घर बनाने का फ़ैसला किया है.

दस साल बाद सन 2023 में एक रॉकेट धरती से चार मुसाफ़िरों को लेकर मंगल की तरफ़ रवाना होगा. क़रीब आठ महीने तक एक छोटे से कमरे में काले अंतरिक्ष में वे सफ़र करेंगे. एक दिन उनका यान लाल ग्रह की ज़मीन छुएगा, कभी वापस न लौटने के लिए.

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