बस्तर के रास्ते बनेगी छत्तीसगढ़ में सरकार

बस्तर

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के पहले चरण में कुल मिलाकर 18 सीटों पर मतदान होना है. इनमें से 12 सीटें अकेले बस्तर में हैं. इस कारण बस्तर का महत्व काफ़ी बढ़ जाता है.

अविभाजित मध्य प्रदेश के दिनों में भी चुनाव के दौरान ये इलाक़ा बहुत महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि 12 सीटें काफ़ी उलट-पलट करने का माद्दा रखती हैं.

बाक़ी छह सीटें राजनांदगांव और डोंगरगढ़ की हैं. राजनांदगांव से मुख्यमंत्री रमण सिंह एक बार फिर चुनाव लड़ रहे हैं.

भाजपा की मुश्किल

इस बार के चुनाव में बस्तर को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दल यानी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टीने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.

यहाँ 12 में से 11 सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं जबकि कांग्रेस को सिर्फ एक ही सीट मिल पाई.

इसलिए यहां कहा जा रहा है कि "बस्तर में भाजपा के पास खोने के लिए सब कुछ और पाने के लिए कुछ भी नहीं" है.

Image caption बस्तर में 12 में से 11 सींटे भाजपा के पास हैं. इसलिए भाजपा के सामने अपनी सीटों को बचाने की चुनौती होगी.

भाजपा की कोशिश है कि इस बार बस्तर इलाक़े से वह अपनी छह सीटें भी बचाने में कामयाब रहे, तो गद्दी का रास्ता साफ़ हो जाएगा.

मगर पार्टी के लिए बस्तर की डगर उतनी आसान भी नहीं है क्योंकि यहां से चुने गए उनके कई विधायकों के ख़िलाफ़ 'एंटी-इनकम्बेंसी' का मुद्दा बड़ी चुनौती है.

बस्तर से भाजपा के तीन मंत्री चुनाव लड़ रहे हैं, जिनमें कोंडागांव से लता उसेंडी, नारायणपुर से केदार कश्यप और अंतागढ़ से विक्रम उसेंडी शामिल हैं.

इसके अलावा बीजापुर से संसदीय सचिव महेश घाघडा की किस्मत भी दांव पर है. इत्तेफ़ाक़ से इन चारों को इस बार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

कांग्रेस की उम्मीद

बस्तर में इस बार कांग्रेस को काफ़ी उम्मीदें हैं. ख़ासतौर पर 28 मई को बस्तर के दर्भा इलाक़े में हुएनक्सली हमले के बाद से ये उम्मीदें बढ़ी हैं, जिसमें सलवा जुडूम के जन्मदाता महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल मारे गए थे.

कांग्रेस सुहानुभूति लहर के सहारे बस्तर में चुनाव लड़ना चाह रही है. यही वज़ह है कि जगह-जगह पार्टी ने महेंद्र कर्मा और नंदकुमार पटेल की तस्वीरें लगाकर लोगों से उनकी क़ुर्बानी याद रखने की अपील की है.

Image caption बस्तर के दर्भा में हुए नक्सली हमले की घटना के बाद कांग्रेस को सहानुभूति मिलने की उम्मीद है.

पार्टी को लगता है कि बस्तर की आम जनता की हमदर्दी उनके साथ है. इसलिए वे इस बार अपनी स्थिति को बेहतर मान रहे हैं.

वैसे भी कांग्रेस को यहां पिछले चुनाव में सिर्फ़ एक ही सीट मिली थी और वह भी कोंटा से कवासी लखमा की.

सहानुभूति की राजनीति

मगर इस बार भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई को भी बस्तर से दो सीटों की उम्मीद है.

एक सीट कोंटा की जहाँ से आदिवासी नेता मनीष कुंजाम लड़ रहे हैं और दूसरी सीट दंतेवाड़ा की जहाँ बोदाराम कवासी लड़ रहे हैं. कांग्रेस ने महेंद्र कर्मा की विधवा देवती कर्मा को दंतेवाड़ा से खड़ा किया है.

हालांकि पिछले चुनाव में इस सीट पर महेंद्र कर्मा तीसरे स्थान पर आए थे और सीट भारतीय जनता पार्टी के भीमा मंडावी की झोली में गई थी.

कांग्रेस का मानना है कि महेंद्र कर्मा की हत्या के बाद लोगों में देवती के प्रति सुहानुभूति है. हालांकि सब कुछ मतदान के प्रतिशत पर निर्भर करता है क्योंकि सुदूर इलाक़ों में कम या नहीं के बराबर मतदान होता आया है.

पूरे बस्तर में अस्सी प्रतिशत मतदान केंद्र अति संवेदनशील घोषित किए गए हैं.

इस बार भी प्रतिशत ज्यादा न होने के आसार हैं क्योंकि दक्षिण बस्तर के बड़े इलाक़े में बहुत से लोग अपना मत इसलिए नहीं डाल पाएंगे क्योंकि उनके मतदान केंद्र स्थानांतरित कर दिए गए हैं.

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