'आज जैसे हालात में ही पैदा हुए थे हिटलर'

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी

भारत में प्रजातंत्र आए 50 वर्ष से अधिक हो गए हैं लेकिन अभी भारतीय जनता की सोच पूरी तरह से प्रजातांत्रिक नहीं हो पाई है.

प्रजातंत्र में राजनीतिक दल ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और उन्हीं के बीच में राजनीतिक शक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा होती है.

लेकिन हम अब भी किसी ऐसे व्यक्तित्व की तलाश में रहते हैं जो राजनीतिक क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान कर सके.

राजनीतिक दलों के लीडर भी धीरे-धीरे निरंकुश प्रजातंत्रवादी हो गए हैं और वे अपने दल में किसी भी लीडर का क़द ऊपर नहीं उठने देते ताकि वह कभी भी उनके लिए एक चुनौती बनकर न उभरे.

राजनीतिक दलों के पास भी आम तौर पर कोई ठोस राजनीतिक एजेंडा नहीं होता है और उसके अभाव में उनके पास किसी करिश्माई राजनेता को बढ़ावा देने के अलावा कोई चारा नहीं होता है.

मीडिया का किरदार

कभी-कभी किसी नेता में कुछ करिश्माई तत्व होते हैं और कभी-कभी उनके अभाव में उसके व्यक्तित्व में ज़बरदस्ती वो तत्व पैदा करने या दिखाने की कोशिश की जाती है. मुद्दों के अभाव में राजनेता ख़ुद ब ख़ुद महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

Image caption कुछ नेताओं के आभामंडल में कई बार मुख्य मुद्दों से ध्यान भटक जाता है

इस प्रक्रिया में मीडिया की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. इन नेताओं को जोर शोर से पेश कर मीडिया का काम आसान हो जाता है. उन्हें मुद्दों की तलाश नहीं करनी पड़ती, न ही उनकी समझ पैदा करनी पड़ती है बल्कि उनकी पूरी ख़बरें नेताओं के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमती हैं.

इस प्रकार की ख़बरें बनाना भी आसान है और जनता जो इन ख़बरों को देखती और पढ़ती है, उसके लिए भी यह काफ़ी रोचक होती हैं. जब मीडिया का हमारे जीवन पर इस कदर नियंत्रण नहीं था, उस समय भारतीय राजनीति में इतना व्यक्तित्व वाद नहीं था.

परन्तु आज मीडिया के इस दौर में लगभग सभी राजनीतिक दल पर्सनेलिटी कल्ट यानी अवतारवाद के शिकार हैं. आजकल जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं उन पर जो भी चर्चाएं हो रही हैं वो सभी वहां के नेताओं के आस-पास घूम रहीं हैं.

ऐसा नहीं है कि उन राज्यों में मुद्दे नहीं हैं लेकिन उनमें किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है. जो विपक्षी दल हैं वे भी नहीं चाहते कि राजनीतिक क्षेत्र में वास्तविक मुद्दों की चर्चा हो बल्कि वे चाहते हैं कि राजनीतिक खेल छद्म मुद्दों के मैदान में हो.

यह सभी राजनीतिक दलों के हित में है.

नेहरू से शुरुआत

इस अवतारवाद की शुरुआत भारत में जवाहर लाल नेहरू से होती है, बाद में इंदिरा गांधी ने इसको बहुत बढ़ावा दिया और इसे एक कला का रूप दे दिया. उनके चाटुकारों ने तो यहां तक कह दिया, “इंदिरा ही इंडिया है और इंडिया ही इंदिरा है.”

Image caption इंदिरा गांधी के दौर में उनका व्यक्तित्व भी कांग्रेस पार्टी पर छाया हुआ था

आज के दौर में इसका उदाहरण राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी हैं. कांग्रेस में भले ही कितने बड़े और ऊंचे क़दम वाले राजनेता हों लेकिन राहुल गांधी के सामने किसी और का क़द ऊंचा नहीं होने दिया जा सकता. किसी चुनावी जीत में उनकी कोई भूमिका हो या न हो लेकिन पार्टी के सभी लोग उसका श्रेय कांग्रेस उपाध्यक्ष को देते हैं.

आज कांग्रेस जो भी करती है उसका श्रेय राहुल गांधी को मिलता है और बीजेपी जो भी करती है उसका श्रेय नरेंद्र मोदी को दिया जाता है.

साफ है कि आज राजनीतिक दलों के नेताओं का क़द अपने दल से ऊँचा हो गया है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने इतना अच्छा काम किया है कि परन्तु उन्होंने अपने दल की अपेक्षा अपने क़द को इस प्रकार प्रचारित किया है कि उनके दल को उनके व्यक्तित्व से पहचाना जाता है.

उनकी पार्टी जो कुछ भी करती है वह हर कार्य का श्रेय खुद ही ले लेते हैं और इस प्रकार पार्टी को या उसके किसी सदस्य को किसी कार्य का श्रेय नहीं मिलता. अतः उनकी पहचान पार्टी या उसके किसी भी नेता से अधिक उजागर हो जाती है.

हानिकारक सोच

इस प्रकार का अवतारवाद किसी भी प्रजातंत्र के लिए अच्छा नहीं है. आने वाले समय में यह क्या रूप ले सकता है, उसकी मिसाल नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व की जिस प्रकार से बेचा गया है, उसमें मिलती है.

Image caption कांग्रेस और भाजपा के अलावा कई क्षेत्रीय पार्टियों में भी नेताओं को मुद्दों से बड़ा बना दिया जाता है

मोदी ने जिस प्रकार मीडिया और सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने व्यक्तित्व को बेचने में किया है वह एक शोध का विषय है.

अभी हाल में गुजरात के गठन के 50 वर्ष पूरे होने पर वहां की राजधानी में एक समारोह आयोजित किया गया. वहां अगर कोई व्यक्ति दूसरे ग्रह से पहुंच जाता तो उसे ऐसा प्रतीत होता कि भारत वर्ष के प्रजातांत्रिक इतिहास में सबसे बड़े नेता नरेन्द्र मोदी रहे हैं और महात्मा गांधी और सरदार पटेल उनकी अपेक्षा बहुत छोटे कद के नेता गुज़रे हैं.

यह उसी प्रकार की राजनीति है जो प्रजातंत्र को फासीवाद की ओर ले जाती है. इसी प्रकार के अवतारवाद की स्थापना जर्मनी में हिटलर ने और इटली में मुसोलिनी ने की थी.

हमें इस प्रकार के अवतारवाद से सावधान रहना चाहिए क्योंकि जब किसी व्यक्तित्व का जादू हमारे मस्तिष्क पर छा जाता है तो उस समय हमारी सोचने समझने की शक्ति शिथिल पड़ जाती है और हम उस व्यक्तित्व के दास बन जाते हैं और हमें वही दिखाई और सुनाई देता है जो वह व्यक्ति दिखाना चाहता है.

जर्मनी और इटली का इतिहास बताता है कि इस प्रकार की सोच हमारे लिए कितनी हानिकारक हो सकती है.

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