झारखंड: अब विशेष राज्य के दर्जे की मांग हुई तेज़

Image caption 15 नवम्बर को झारखंड बना और इसी दिन बिरसा मुंडा का जन्मदिन भी है

15 नवम्बर झारखंड के लिए अहम है. 13 साल पहले इसी दिन झारखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला था. लेकिन इतने समय में झारखंड कहां से कहां तक पहुंचा.

अब झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग जोर पकड़ने लगी है.

राज्य के स्थापना दिवस पर पखवाड़े भर सरकारी समारोह की तैयारी है.

इस बीच अलग राज्य की लड़ाई में अहम भूमिका अदा करने वाली ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन 'आजसू' के हजारों कार्यकर्ता विशेष राज्य की मांग लेकर दिल्ली पहुंचे हैं.

पिछले दिनों रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट में झारखंड को सबसे अल्प विकसित राज्यों की श्रेणी में पांचवें नंबर पर रखा गया था.

हालांकि राजन कमेटी ने राज्यों को विशेष श्रेणी का दर्जा देने संबंधी मानदंडों को समाप्त कर दिया है.

अब विशेष राज्य की लड़ाई

झारखंड के लिए अब विशेष राज्य की लड़ाई लड़ी जा रही है.

हजारों कार्यकर्ताओं के साथ आंदोलन की राह पर उतरे आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश कुमार महतो कहते हैं, '' देश का 40 प्रतिशत खनिज झारखंड में हैं. लेकिन विकास के पैमाने पर राज्य लगातार पिछड़ रहा है. लिहाजा विशेष राज्य का दर्जा मिलने पर ही झारखंड का नवनिर्माण हो सकेगा."

Image caption आजसू पार्टी के कार्यकर्ता और नेता आंदोलन के लिए दिल्ली रवाना होने की तैयारी में

बढ़ गए बीपीएल

राज्य सरकार की रिपोर्ट बताती है कि प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से झारखंड देश में सिर्फ बिहार से ऊपर है. बाकी सभी राज्यों से झारखंड पीछे है.

झारखंडकी प्रति व्यक्ति आय 31982 रुपए है.

अलग राज्य का जब निर्माण हुआ था, तब झारखंड में बीपीएल परिवारों की संख्या 23.94 लाख थी.

झारखंड सरकार की रिपोर्ट के अनुसार बीपीएल परिवारों की संख्या अब बढ़कर 35.38 लाख हो गई है.

92.3 फीसदी आदिवासी परिवारों के पास मिट्टी के घर हैं.

अर्थशास्त्री प्रो रमेश शरण कहते हैं, '' 13 साल में अपेक्षा के अनुरूप झारखंड तरक्की नहीं कर सका. आदिवासी इलाके की चुनौतियां और समस्याएं बहुआयामी हैं. आधारभूत संरचना खड़ा करने के लिए झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए.''

बुनियादी सुविधाओं का अभाव

राज्य सरकार की रिपोर्ट बताती है कि प्रति एक लाख आबादी पर सड़क की लंबाई 58 किमी है. जबकि राष्ट्रीय पैमाना 277 किमी है.

इसी तरह 1000 वर्ग किमी पर स्टेट, मेजर व एनएच 88.44 किमी है, जबकि राष्ट्रीय पैमाना 182.4 किमी है.

झारखंड में 1000 वर्ग किमी पर ग्रामीण सड़क 304.86 किमी है जबकि राष्ट्रीय पैमाना 806.6 किमी है.

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में महज सात फीसदी लोगों को पाइप से पीने का पानी मिलता है.

राज्य के 24 में से 9 जिलों में बिजली की आपूर्ति अत्यंत खराब है.

पर कैपिटा बिजली उपभोग 552 केडब्लूएच है, जबकि राष्ट्रीय औसत 720 केड्ब्लूएच है.

वहीं भारतीय जनगणना की रिपोर्ट (2011) बताती है कि झारखंड में 43.8 फीसदी परिवार चापाकल 38.4 फीसदी परिवार कुएं का पानी पीते हैं.

साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता बीपी केसरी कहते हैं, '' झारखंड निर्माण के भले ही तेरह साल हुए, खुशियां नहीं आईं.''

24 में 21 जिले उग्रवाद प्रभावित

Image caption झारखंड में तैयारी अब विशेष राज्य का दर्जा लेने की

झारखंडजब अलग राज्य बना था, तो इसके 14 जिले उग्रवाद प्रभावित थे. अब ये संख्या बढ़कर 21 हो गई है.

राज्य में 24 जिले हैं. राज्य सरकार की रिपोर्ट बताती है कि 142 थाने नक्सल प्रभावित हैं.

25 प्रखंड नक्सल गतिविधियों की टॉप सूची में शामिल हैं.

इस साल के आठ महीने ( जनवरी से अगस्त तक) 58 नक्सली हत्याएं हुई हैं.

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा कहते हैं कि उग्रवाद की समस्या के समाधान के लिए झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए.

न सिंचाई न खेती

राज्य सरकार की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट बताती है कि राज्य में 29.74 लाख हेक्टेयर जमीन कृषि योग्य है. लेकिन सिंचाई की सुविधा महज 25 फीसदी है.

कुल आबादी के 58 फीसदी लोग किसान और खेतिहर मजदूर हैं.

80 फीसदी लोग एक से दो हेक्टेयर जमीन के जोतदार हैं.

राज्य में पर कैपिटा 250 ग्राम अनाज उपलब्ध है, जबकि राष्ट्रीय पैमाना 583 ग्राम है.

शिक्षा व स्वास्थ्य में भी पीछे

राज्य में कुल साक्षरता दर 67.63 प्रतिशत है. इनमें महिलाओं के बीच साक्षरता दर 56.21 फीसदी है.

जनजातीय महिलाओं में साक्षरता दर 39. 35 प्रतिशत है.

राज्य के 30 फीसदी बच्चे ही पूरी तरह प्रतिरक्षित हैं.

राज्य में संस्थागत प्रसव की दर लगभग 40 प्रतिशत है.

जनजातीय इलाकों में 72 फीसदी युवतियों की शादी कम उम्र में होती हैं.

झारखंड में मातृ मृत्यु दर 261 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 212 है।

महिला कार्यकर्ता चारूबाला कहती हैं, ''ये आंकड़े गवाह हैं कि विशेष राज्य की मांग वाजिब है.''

महिला कार्यकर्ता सुनीता के मुताबिक झारखंड अलग राज्य बने भले 13 साल हुए, लेकिन महिला विकास व कल्याण के सवाल अब भी मौजूद हैं.

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