बिजली चोरों की कहानी है 'कटियाबाज़'

कटियाबाज़ का एक दृश्य

मैं सरकार से क्यों डरूं जब बिजली मुझे नहीं डराती? यह कहना है लोहा सिंह का, जो कि 'कटियाबाज़' नाम की एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म का पात्र है. भारत में बिजली चोरी पर बनी यह एक दिलचस्प फ़िल्म है.

लोहा सिंह एक ग़ुस्सैल युवक हैं और फ़िल्म उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है.

वह एक तबाह हो रहे शहर में बिजली लाइन पर तार फंसाकर बिजली लेते हैं. इससे घरों को रोशन करता है. उनके ग्राहक उनके आभारी हैं. चूंकि वो बिजली नहीं खरीद सकते, इसलिए बिजली चोरी को वो अपना हक़ मानते हैं.

फ़िल्म का सबसे मार्मिक क्षण वह है, जब लोहा सिंह अपने ढहते हुए घर में पहुँचते हैं. वहाँ उनकी बूढ़ी माँ उनसे यह ख़तरनाक़ काम छोड़कर परिवार चलाने के लिए कोई सम्मानजनक काम करने को कहती हैं. यह सुनकर उनकी आँखें खुली रह जाती हैं. उन्हें अपने धूमिल और निराशाजनक जीवन का अहसास होने लगता है.

पूरब का मैनचेस्टर

इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म का निर्देशन किया है दीप्ति कक्कड़ और फ़हद मुस्तफ़ा ने. फ़िल्म कानपुर पर आधारित है, जो एक समय अपनी फैक्ट्रियों की वजह से पूरब का मैनचेस्टर कहा जाता था. मगर आज यह एक उजाड़ होता शहर है. लोगों से भरा हुआ और आभाव से जूझता शहर.

संकरी सड़कों पर लगे बिजली के खंभों पर तार ख़तरनाक़ ढंग से लटके हैं. यहाँ के निवासी एक दिन में 16 घंटे की बिजली कटौती का सामना करते हैं. यहां के 30 लाख निवासी बिजली के बिना रहते हैं. वाहनों के शोर और प्रदूषित हवा. पानी की कमी के बीच.

दीवालिया हो चुकी सरकार बिजली आपूर्ति कंपनी में एक योग्य महिला अधिकारी काम संभालती हैं. वह घाटे को कम करने का संकल्प लेती हैं. वह उपभोक्ताओं को समय पर बिजली बिलों का भुगतान करने को कहती हैं और बिजली चोरों के खिलाफ़ एक अभियान शुरू करती हैं. वह एक क्षेत्रीय पार्टी के नेता को इसके लिए डांटती भी हैं. इस नेता ने उनके अभियान के ख़िलाफ़ एक बार रैली भी निकाली थी.

वह कहती हैं, ''अमीर और ग़रीब दोनों ही बिजली चुराते हैं. सरकार कितना आर्थिक सहायता दे सकती है.''

वह सही कह रही हैं. कानपुर देश के राजनीतिक रूप से प्रभावशाली और बिजली संकट का सामना कर रहे प्रदेशों में से एक उत्तर प्रदेश में है. ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल ने पाया है कि राज्य में बिजली आपूर्ति करने वालों की पहचान भ्रष्ट लोगों के रूप में है.

राजनीतिक संरक्षण

एक अध्ययन में पता चला कि राज्य में बिजली चोरी स्थानीय चुनाव से पहले काफी बढ़ जाती है. अध्ययन के मुताबिक़ सबसे अधिक बिजली वो चुराते हैं, जो एक स्थानीय नेता को वोट देते हैं. वह नेता इस समस्या की ओर से अपनी आँख फेर लेता है.

'कटियाबाज़' में बिजली चोर और उसके उपभोक्ता दोनों ही गरिमा और बिजली के साथ जीने के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं.

फ़िल्म बनाने में दो साल का समय लगा और दो करोड़ रुपए ख़र्च आया. फ़िल्म में बिजली चोर, नौकरशाहों और नेताओं की किस्मत को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की कुछ घटनाओं के ज़रिए दिखाया गया है.

इस फ़िल्म के अंत में मुफ़्त बिजली के समर्थक लोकप्रिय नेता की जीत होती है. महिला अधिकारी का एक कम महत्वपूर्ण शहर में तबादला हो जाता है. परेशान उपभोक्ता राहत की सांस लेते हैं. बिजली कंपनी बिजली चोरी की वजह से हो रहे एक तिहाई घाटे के साथ ही आगे बढ़ती है. कानपुर में एक दिन में 15 घंटे की बिजली कटौती जारी है. लोहा सिंह का बिजली चोर के रूप में ख़तरनाक जीवन चलता रहता है.

अपने सरकारी बंगले में मच्छरों के भनभनाहट के बीच महिला अधिकारी कहती हैं, ''बदलाव बहुत कठिन है. मध्यम मार्ग का इस्तेमाल करते हुए शुरुआत में मुझे नरम विकल्पों को अपनाना होगा. अगर मैं शुरुआत ही कठिन करूंगी तो मैं जाऊंगी.''

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