'...इसलिए नहीं है राज्यों में मोदी फ़ैक्टर'

नरेंद्र मोदी

दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों की लय-ताल तय करेंगे.

तो क्या भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी इन चुनावों में एक अहम 'फ़ैक्टर' होंगे? इस सवाल के जवाब के लिए पहले हमें इन राज्यों में दोनों बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की स्थिति को देखना होगा.

चुनावी सर्वेक्षणों के मुताबिक राजस्थान और मध्य प्रदेश की सत्ता भाजपा के हाथों में जाती दिख रही है.

मध्य प्रदेश में पार्टी ने गुजरात जैसा मॉडल स्थापित किया है जिसमें मज़बूत सवर्ण वर्ग और किसानों के गठजोड़ और सुशासन ने बीजेपी को सत्ता से हटाना मुश्किल बना दिया है.

राजस्थान में भी जातिगत समीकरण भाजपा के पक्ष में दिख रहे हैं. ताक़तवर राजपूत समुदाय में भाजपा की पकड़ मज़बूत है.

हालाँकि मराठा राजकुमारी वसुंधरा राजे के नेतृत्व को लेकर राजपूतों में हुई अंदरूनी कलह पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर चुकी है. लेकिन इस बार यह समस्या इतनी बड़ी नहीं है और भाजपा के सत्ता में आने की संभावना है.

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राज्यों में मोदी फ़ैक्टर नहीं

लेकिन मोदी जिस 'बदलाव' के विचार के मज़बूत ध्वजवाहक बने हुए हैं, वो न तो राजस्थान में मुद्दा है और न ही मध्य प्रदेश में. केंद्र में कई मोर्चों पर कांग्रेस की वास्तविक या काल्पनिक अक्षमता भी मध्यप्रदेश या राजस्थान में मुद्दा नहीं है.

Image caption राजस्थान में वसुंधरा राजे सत्ता में वापस आती दिख रही हैं.

इस आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दोनों ही राज्यों में मोदी कोई बड़ा मुद्दा नहीं हैं. छत्तीसगढ़ और दिल्ली जैसे छोटे राज्यों में लड़ाई नज़दीकी है लेकिन यहाँ भी भाजपा के ही सत्ता में आने की संभावना है.

दिल्ली के चुनाव में आम आदमी पार्टी प्रभाव छोड़ सकती है. चुनाव विश्लेषकों के मुताबिक आम आदमी पार्टी को 15 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं, जो किसी भी मुद्दा आधारित पार्टी के लिए बड़ी बात होगी. यदि ऐसा हुआ तो राज्य में त्रिशंकु विधानसभा होगी और भाजपा और कांग्रेस के बीच बहुत कम ही अंतर होगा.

आम आदमी पार्टी न होती तो भाजपा के जीतने की प्रबल संभावना थी. लेकिन उसे इस नई नवेली पार्टी की वजह से अब होने वाले नुकसान को मोदी के खाते में नहीं डाला जा सकता है.

अगर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी मध्य वर्ग के वोटरों को रिझाने में कामयाब रहती है तो इसे मोदी के लिए सकारात्मक संदेश के रूप में ही देखा जाएगा क्योंकि राष्ट्रीय परिदृश्य में उनकी अपील भी इन्हीं कारणों से है.

मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव आयोग पहुँची कांग्रेस

मददगार मोदी

जिन राज्यों में मोदी फ़ैक्टर नहीं है वहां भी वो पार्टी के लिए मददगार ही साबित हो रहे हैं. पहली बात तो यह है कि भाजपा एक कैडर आधारित पार्टी है जबकि कांग्रेस का स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुआ कैडर कब का गायब हो चुका है.

Image caption भारत का मध्यम वर्ग नरेंद्र मोदी के रूप में सभी समस्याओं का समाधान देख रहा है.

भाजपा के ज़मीनी कार्यकर्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हैं जो हिंदुत्व की विचारधारा के कारण पार्टी से जुड़े हैं.

ये कार्यकर्ता वैचारिक सैनिक हैं और इसलिए ही पार्टी के लिए ज़्यादा प्रतिबद्ध हैं. ये कैडर नेता के रूप में सबसे ज़्यादा मोदी को पसंद करता है. मोदी हिंदुत्व के पोस्टर ब्वॉय भी हैं.

एक राष्ट्रीय नेता के रूप में मोदी के उदय ने भाजपा के कैडर में नई जान फूंक दी है और यह पार्टी के लिए हर राज्य में मददगार भी साबित होगा.

दूसरे, मोदी की स्टार पावर और करिश्मा भाजपा के पारंपरिक वोटरों को अपनी ओर खींच रहा है. यही मोदी की सार्वजनिक सभाओं की कामयाबी की वजह भी है. वोटरों के समूह को रैली में लाने की क्षमता मोदी की सबसे बड़ी ताक़त है.

तीसरे, मीडिया और नेताओं के बीच यह राय आम हो गई है कि 2014 के चुनावों के नतीज़े कांग्रेस के ख़िलाफ़ और भाजपा और मोदी के पक्ष में होंगे. राजस्थान और मध्य प्रदेश के नतीज़े इस भावना को और मज़बूत करेंगे.

वे वोटर जिन्होंने अभी तक फ़ैसला नहीं लिया है, वे इस भावना से प्रभावित होकर मोदी की ओर चले जाएंगे.

मुसलमानों के नज़दीक आने की कोशिश

लोकप्रियता

मोदी की लोकप्रियता के भी दो पहलू हैं जो एक दूसरे से भिन्न हैं. सबसे पहले तो हिंदुत्व को लेकर उनकी ठोस और समझौता न करने वाली विचारधारा.

वे भारतीय जो हिंदुत्व की इस विचारधारा की ओर आकर्षित होते हैं और जिनका चरित्र आवश्यक रूप से मुस्लिम विरोधी हैं, उन्हें मोदी के रूप में एक हीरो मिल गया है. मोदी भाजपा के चर्चित चेहरे रहे अटल बिहारी वाजपेयी के मुक़ाबले में एक ज़्यादा कठोर चेहरा हैं.

Image caption मोदी फ़िलहाल कांग्रेस पर निशाना साधने की राजनीति पर ही ज़ोर दे रहे हैं. समस्याओं के समाधान अभी वो नहीं सुझा रहे हैं.

गुजरात दंगों के दौरान महिलाओं और बच्चों समेत 95 लोगों की मौत के मामले में दोषी क़रार दी गईं अपनी सरकार की पूर्व महिला एवं बाल कल्याण मंत्री माया कोडनानी पर कोई टिप्पणी न करना या फ़ैसला न लेना मोदी के इस कठोर चेहरे को दर्शाता है.

मुस्लिम टोपी पहनने और इफ़्तार पार्टी देने जैसे समावेशी धर्मनिरपेक्षता के जिन प्रतीकों को अन्य नेता अक्सर अपनाते देखे जाते हैं, उन से दूरी बनाए रखना मोदी की इस कठोर छवि को और मज़बूत करता है.

दूसरा पक्ष थोड़ा नया है. एक बड़े मध्यम वर्ग के लिए मोदी सरकार की अक्षमता से बचाने वाले रक्षक का रूप ले रहे हैं. इस मध्य वर्ग के लिए समस्याएं समाज से नहीं बल्कि सरकार में पैदा होती हैं.

यह वर्ग मानता है कि एक ठोस सरकार ग़रीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और सीमा पर कमज़ोर रुख जैसी समस्याओं को दूर कर देगी. मोदी इन सभी समस्याओं को निपटाने का वादा कर रहे हैं और एक समाधान के रूप में खुद को बेचने में कामयाब भी रहे हैं.

राज्य चुनावों में भले ही मोदी इस समय बड़ा फैक्टर न हों लेकिन इन विधानसभा चुनावों के नतीज़े राष्ट्रीय परिदृश्य में नरेंद्र मोदी को मज़बूत ही करेंगे.

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