...तो भारत का अमरीका जैसा हश्र होगा: महबूबा

अगर आप भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर राज्य में किसी महिला नेता के बारे में सोचें तो एक ही नाम ध्यान में आता है और वो है पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष, 54 साल की महबूबा मुफ़्ती का.

भारत प्रशासित कश्मीर में नेताओं को दो श्रेणियों में रखा जाता है- भारत समर्थक और भारत विरोधी. बोलने में तेज़ तर्रार और अपने विचारों को सामने रखने में हमेशा आगे रहने वाली महबूबा मुफ़्ती पहली श्रेणी में आती हैं, इसके बावजूद अगर उनको भारत से शिकायत है तो लोग उसे गंभीरता से सुनते हैं.

दिल्ली में बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि अगर कश्मीर की समस्या को गंभीरता से हल नहीं किया गया तो एक दिन भारत का वही हाल हो सकता है जो अमरीका का वियतनाम में हुआ था.

'अमरीकी सैन्य वापसी का असर पड़ेगा'

महबूबा मुफ़्ती कहती हैं कि कश्मीर पर 65 सालों से सेना और पुलिस बल के सहारे राज किया जा रहा है. कश्मीर की जनता खुद को पहले से कहीं अधिक अलग-थलग महसूस कर रही है. इस कारण अगले साल अमरीकी सेना की अफ़गानिस्तान से वापसी का असर कश्मीर पर भी पड़ सकता है.

उनका कहना था कि राज्य में उग्रवाद कम हो गया है लेकिन आम युवाओं के खिलाफ अत्याचार बढ़ गया है जिसके कारण वहाँ के लोग देश की मुख्य धारा से और भी कट कर रह गए हैं.

वो कहती हैं कि अगर इसे रोका न गया तो भारत का वही हाल होगा "जो अमरीका का विएतनाम में हुआ और अफ़ग़ानिस्तान में हो रहा है."

उन्होंने कहा, "हज़ारों लड़कों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और बेगुनाह लोगों को मारा गया है."

सेलेक्टिव डेमोक्रेसी

महबूबा मुफ़्ती कहती हैं कि कश्मीर में लोकतंत्र कमज़ोर है. कश्मीर को केवल किसी तरह से मैनेज किया जाता है. उनके मुताबिक कश्मीर में 'सेलेक्टिव डेमोक्रेसी' चलाई जाती है.

Image caption पीडीपी चाहती है कि वाजपेयी की ओर से शुरू की गई शांति प्रक्रिया को फिर से शुरू किया जाए

उनकी शिकायत थी कि देश के लिए उठाए गए हर अच्छे क़दम को कश्मीर में लागू नहीं किया जाता.

उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि जब देश भर में वोटिंग मशीन पर 'नो वोट' का विकल्प दिया गया तो पूरे देश ने इसका स्वागत किया, लेकिन कश्मीरियों को इसका मौक़ा नहीं दिया गया, क्योंकि राज्य में ये विकल्प नहीं दिया गया है.

'नोटा यहां क्यों नहीं'

वो कहती हैं, "लोग डर गए हैं. कश्मीरी पहले ही चुनाव का बहिष्कार करते आए हैं. अगर लोगों ने 'नो वोट' का बटन दबाया तो ये इस बात का संकेत हो सकता है कि वो चुनाव की प्रक्रिया को पूरी तरह से रद्द करते हैं."

भारत के पूर्व गृह मंत्री मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ़्ती के अनुसार कश्मीरियों को देश की मुख्य धारा से जोड़ने का एक ही तरीक़ा है और वो है पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की शुरू की गई शांति प्रक्रिया को दोबारा शुरू करना.

'शांति प्रक्रिया बहाल हो'

उनके अनुसार शांति प्रक्रिया के रुक जाने से और केंद्र का ध्यान उनके राज्य की तरफ से उठ जाने से कश्मीरी खुद को देश की मुख्यधारा से अलग-थलग महसूस करने लगे हैं.

महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि कश्मीरियों और भारतीय सरकार के बीच एक दूसरे के लिए भरोसे की कमी है जिसको दूर करना बहुत ज़रूरी है.

अटल बिहारी वाजपेयी की तारीफ़ करते हुए उन्होंने कहा कि न सिर्फ उन्होंने शांति प्रक्रिया शुरू की बल्कि कश्मीरियों से हमदर्दी से बात की, जिसके कारण केंद्र सरकार की साख कश्मीर में बेहतर हुई.

'मोदी की यात्रा पर ऐतराज नहीं'

उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के बारे में कहा कि अगर वो चुनाव प्रचार के लिए कश्मीर आते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं.

हालांकि भविष्य में गठबंधन को लेकर उनका कहना था कि बीजेपी का समर्थन वो इसलिए नहीं करेंगी क्योंकि बीजेपी कश्मीर के लिए धारा 370 का विरोध करती है.

वो कहती हैं, ''हम वाजपेयी जी की प्रशंसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्होंने शांति के लिए बातचीत की पहल की.''

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