'जासूसी में सरकारी तंत्र का इस्तेमाल उद्योग बना'

  • 21 नवंबर 2013

भारत में सरकारी निगरानी तंत्र एक कुटीर उद्योग के रूप में फैल रहा है यह बात गुजरात के पूर्व गृह मंत्री अमित शाह के एक लड़की की 'जासूसी' कराए जाने संबंधी टेप के सामने आने से एक बार फिर साफ़ हो गई है.

इस टेप की रिकार्डिंग को लेकर सरकार पर आरोप है कि गुजरात के पूर्व गृह मंत्री नेसरकार के संसाधनों का इस्तेमाल एक महिला पर नज़र रखने के लिए किया.

इस मामले में दिलचस्प पहलू यह भी है कि लड़की के पिता ने कथित तौर पर राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी बेटी पर नज़र रखने में मदद मांगी थी, क्योंकि वो लड़की के बॉय फ़्रेंड को पसंद नहीं करते थे.

इस तर्क के आधार पर एक नागरिक के व्यक्तिगत अनुरोध पर दूसरे नागरिक की जासूसी के लिए खर्चीली सरकारी मशीनरी और संसाधानों के इस्तेमाल को उचित ठहराया गया और महिला के निजी जीवन से जुड़ी हर गतिविधि पर नज़र रखी गई.

इस मसले पर जिस तरह महिला संगठन सामने आए हैं उनकी नाराज़गी एक हद तक सही है, लेकिन इस पूरे मामले को केवल महिला अधिकारों से जोड़कर देखना शायद सही दिशा नहीं.

'गंभीर है समस्या'

यह केवल महिला अधिकारों से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि भारत में व्याप्त एक बड़ी समस्या से जुड़ा सवाल है कि किस तरह से व्यक्तिगत उद्देश्यों के लिए सरकारी मशीनरी का दुरूपयोगकिया जाता रहा है. इसमें महिलाओं की तुलना में शायद पुरुषों को कहीं ज़्यादा निशाना बनाया गया है.

वित्तीय मामलों की निगरानी का मसला सरकारी निगरानी के दुरुपयोग का सबसे आम उदाहरण है.

उदाहरण के लिए संदेह के आधार पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक वरिष्ठ अधिकारी की जासूसी की गई. छानबीन के सिलसिले में उनके बैंक स्टेटमेंट और अन्य दस्तावेज़ों के अतिरिक्त उनकी टेलीफ़ोन कॉल का विस्तृत ब्योरा (सीडीआर) आयकर अधिकारियों ने प्राप्त किया.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ऐसा कराए जाने से उन्हें कोई विशेष जानकारी हासिल नहीं हुई, लेकिन इस दौरान उस अधिकारी के कॉल डिटेल्स से ये सामने आया कि वह शादीशुदा अधिकारी देर रात किसी अन्य शादीशुदा महिला को फोन किया करता था.

ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल

इस जानकारी का फायदा उठाते हुए एक आयकर अधिकारी ने उस वरिष्ठ अधिकारी को ब्लैकमेल करने की कोशिश की.

अक्सर ये मामले दबा दिए जाते हैं लेकिन उस वरिष्ठ अधिकारी ने इसे धोखा मानते हुए ब्लैकमेल किए जाने की शिकायत की, जिसके बाद सतर्कता विभाग ने न सिर्फ़ जांच की बल्कि उसकी बेहद आलोचना भी हुई.

कर संबंधित मामलों में व्यक्तिगत जानकारी का खूब इस्तेमाल होता है और ज़्यादातर मामले रिश्वत देकर सुलझा दिए जाते हैं ताकि और कच्चा चिट्ठा न खुले.

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती.

यह समस्या देश की कई जांच एजेंसियों के इस दिशा में काम करने के चलते बड़े पैमाने पर मौजूद है. करीब एक दर्जन जांच एजेंसियों को अलग अलग कारणों से आम लोगों की निगरानी करने का अधिकार है.

उन्हें विभिन्न कानून जिनमें मुख्य तौर पर टेलीग्राफ एक्ट, 1885 और सूचना प्रोद्यौगिकी एक्ट, 2008 के तहत इलेक्ट्रानिक निगरानी करने का भी अधिकार है.

इन एजेंसियों में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और खुफ़िया जांच एजेंसी (आईबी) के अलावा इकॉनामिक आईबी, राजस्व निदेशालय, डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी शामिल है.

इनके अलावा राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संस्थान (एनटीआरओ) पर भी अन्य विभागों के साथ लोगों की निगरानी करने का आरोप लगता रहा है.

सीएमएस बढ़ाएगी समस्या

इन विभागों को इंडियन टेलीग्राफ़ी एक्ट, 1985, इंडियन टेलीग्राफ़ नियम, 1951, सूचना प्रोद्यौगिकी कानून, 2000 और सूचना प्रोद्यौगिकी नियम 2009 के तहत इलेक्ट्रॉनिक निगरानी का अधिकार मिला हुआ है.

समस्या ये है कि ये कानून फिलहाल आधे-अधूरे हैं और भारतीय संविधान के तहत लोगों को मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का सम्मान नहीं करते हैं.

भारत की सर्वोच्च अदालत ने साल 1996 में दिए अपने एक आदेश में इंडियन टेलीग्राफी एक्ट के तहत इलेक्ट्रॉनिक निगरानी को मान्य बताया लेकिन कहा कि टेलीफ़ोन टैपिंग से संविधान के तहत मिले जीवन के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होता है.

अब भारत सरकार 'केंद्रीय निगरानी व्यवस्था' (सीएमएस) के बैनर तले एक व्यवस्था बनाने की तैयारी कर रही है जिसके ज़रिए एक साथ एसएमएस, सोशल मीडिया कमेंट, फोन कॉल्स और ईमेल पर नज़र रखी जाएगी.

कुछ लोग ये मानते हैं कि एक दर्जन निगरानी एजेंसियों की जगह एक 'सीएमएस' के होने से लोगों का उत्पीड़न कम होगा, लेकिन सही कानून और आम लोगों में निजता के अधिकार संबंधी जागरुकता के बिना क्या वाकई बात बनेगी?

सरकार की ओर से लगातार निगरानी की दूसरी कोशिशें भी हो रही हैं. हाल के सालों में गूगल के ज़रिए निजी जानकारियां जुटाने और इंटरनेट से जानकारियां हटाने के मामले में भारत अमरीका के बाद दूसरे नंबर पर रहा है.

'जनहित' के नाम पर 'सीएमएस' और निगरानी प्रणालियों के ज़रिए बड़े स्तक पर जब डाटा रिकॉर्ड किया जाएगा तो उसका 'रियल टाइम' आकलन करने के लिए जिस तकनीक की जरूरत है उस मामले में भारत अभी कई पीढ़ी पीछे है.

ऐसे में सवाल ये भी है कि फिर इन एजेंसियों को काम पर लगाने और जानकारियां जुटाने का मकसद क्या है?

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