प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों पर होगी कार्रवाई

उल्हास नदी

मुम्बई के पास उल्हास नदी में हो रहे प्रदूषण को लेकर पुणे स्थित नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को प्रदूषण करने वाली कंपनियों पर पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 के तहत कार्रवाई कर 16 दिसंबर को हलफनामा दायर करने के आदेश दिए हैं.

उल्हास नदी का उद्गम मुंबई से 100 किमी दूर कर्जत के पास है. अपने उद्गम स्थान से बदलापुर शहर तक उल्हास नदी का पानी एकदम शुद्ध और साफ़ है.

यही पानी नवी मुंबई, बदलापुर, अंबरनाथ, उल्हासनगर, कल्याण और डोंबीवली शहरों में पीने और अन्य उपयोगों के लिए दिया जाता है.

प्रदूषित होती नदी

बदलापूर निवासी नंदकुमार पवार मछुवारे हैं. वो कहते हैं, "बदलापुर शहर तक उल्हास नदी का पानी एकदम साफ़ और शुद्ध है."

लेकिन बदलापुर के बाद उल्हास नदी में प्रदूषण बढ़ रहा है जिसके कारण यह पानी न तो पीने के काबिल है और न ही किसी अन्य उपयोग के.

यहां तक कि इस नदी से सारा का सारा जल जीवन ख़त्म हो चुका है.”

पवार ने बताया, "उनके पिता और दादा, इसी नदी में मछली पकड़कर अपना जीवन यापन करते थे. उन दिनो उल्हास नदी में पर्याप्त मात्रा में मछलियां थी जो हमारे सारे मछुवारों का पेट पालने के लिये काफ़ी थीं. लेकिन पिछले 15-20 सालों से यह सब ख़त्म हो गया है और अब हमारे लोग मजदूरी करने को बाध्य हैं.”

पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली मुम्बई की सेवाभावी संस्था वनशक्ति ने उल्हास नदी में हो रहे प्रदूषण के खिलाफ ‘सेव उल्हास रिवर’ प्रकल्प के मध्यम से पिछले डेढ़ साल से मुहिम छेड़ी है.

इसके संचालक स्टॅलिन डी ने बताया, "डोम्बिवली, अम्बरनाथ और उल्हासनगर में स्थित कारख़ानों से निकलने वाले प्रदूषित पानी को बिना किसी प्रक्रिया के उल्हास नदी में छोड़ा जा रहा है."

स्वास्थ्य समस्याएं

हालांकि यह प्रदूषण पिछले 20-25 सालों से चला आ रहा है, लेकिन संबंधित सरकारी अधिकारियों ने हमेशा इसे अनदेखा किया है."

डोम्बिवली में रहने वाली रश्मि येवले ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस प्रदूषण के ख़िलाफ़ लोगों को जागरूक किया.

उन्होंने कहा, "हमारे घर औद्योगिक इलाक़े में हैं और हम पर इस प्रदूषण का सीधा असर होता है. इस प्रदूषण के कारण यहाँ के कई लोगों को स्वास्थ्य की शिकायत रहती है. डॉक्टरों ने भी इन स्वास्थ्य समस्याओं के लिए यहाँ हो रहे प्रदूषण को जिम्मेदार बताया है."

डोम्बिवली के रामचंद्र नगर में पिछले 15 सालों से कार्यरत डॉ योजना नाफडे ने इस बारे में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 5 सितंबर 2012 को चिठ्ठी लिखकर सूचित किया था.

डॉ नाफडे के मुताबिक़ इस इलाक़े के नालों मे छोड़े जाने वाले रसायन मिश्रित पानी की वज़ह से लोगों में त्वचा रोग, सांस की बीमारी, पेट की बीमारी तथा कर्क रोग के मामले बढे है.

प्रदूषण की जाँच

डोम्बिवली निवासी राजू नलावडे पिछले बीस सालों से यहाँ होने वाले प्रदूषण की शिकायत कर रहे है.

उन्होंने बताया, "हमने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अनगिनत शिकायतें की है लेकिन अधिकारियों ने कभी इस विषय को गम्भीरता से नहीं लिया. आखिरकार हमने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियोंको उनके दफ़्तर में जाकर रसायन मिश्रित पानी की बोतलें भेट की."

"हमने नदी के उद्गम से लेकर उसके समुद्र में मिलने तक के रास्ते में कई जगह नमूने इकठ्ठे किये.

इस दौरान हमने सूचना के अधिकार के तहत प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जो जानकारी माँगी उसमें भी कई बातें सामने आईं.

उनका कहना था कि हमने इस मामले में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वन तथा पर्यावरण मंत्रालय में भी शिकायतें दर्ज़ की. जिसके बाद महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हमारी संस्था के साथ नमूने लेकर उनकी जाँच करने का प्रस्ताव रखा. यह संयुक्त जाँच अगस्त महीने में की गयी.

सख़्त कार्रवाई

इस जाँच के नतीजों के बाद भी अधिकारियों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया.

वो कहते हैं कि आखिरकार हमने नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में इस प्रदूषण के ख़िलाफ़ मामला दायर किया.

स्टॉलिन ने कहा कि यह सब बातें हमने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों को बताई जिसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को प्रदूषण करने वाले कारख़ानों के खिलाफ सख़्त कार्रवाई करने का आदेश दिया.

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कल्याण प्रादेशिक अधिकारी भगवानदास सालुंके के इस मामले में टिप्पणी करने से यह कहते हुए इंक़ार किया. उन्होंने इसी महीने अपना पदभार संभाला है और मामले की पूरी जानकारी उनके पास नहीं है.

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