पीएमओ नहीं चाहता, पूछा जाए नेताजी के बारे में

  • 22 नवंबर 2013
नेताजी सुभाष चंद्र बोस

भारत के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस के विवादास्पद तरीके से गायब होने की घटना के 68 सालों के बाद भी प्रधानमंत्री कार्यालय इसके बारे में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है. उसका कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों के साथ भारत के संबंधों पर असर पड़ेगा.

यहां तक कि इस मुद्दे को संसद में उठाए जाना भी प्रधानमंत्री कार्यालय को नागवार गुजरता है.

हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा गृह मंत्रालय को भेजे गए एक नोट में कहा गया है, ''नेताजी के गायब होने के संबंध में कार्यालय के पास 20 गुप्त दस्तावेज हैं. इन गुप्त दस्तावेजों में से किसी एक को भी सार्वजनिक नहीं किया गया है क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों से संबंधों पर असर पड़ेगा.''

इस नोट की प्रतिलिपि बीबीसी के पास मौजूद है.

पीएमओ का आग्रह

यह नोट राज्य सभा में इस मुद्दे को उठाने की कई असफल कोशिश कर चुके एक सांसद को जवाब को रूप में मिला.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने बीबीसी को बताया,''मैंने कम से कम सात से आठ बार इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की. लेकिन मेरे प्रश्न को कभी इजाजत नहीं दी गई. जब मैंने दो दिन पहले राज्य सभा के सचिव से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है, तो उन्होंने पीएमओ का यह नोट मुझे प्रेषित किया.''

इस नोट में कहा गया है, "गुजारिश की जाती है कि इस संबंध में किसी सवाल को स्वीकार नहीं किया जाएगा."

अब सुखेंदु कानूनी सलाह ले रहे हैं. उनका कहना है, ''देश को यह जानने का अधिकार है कि स्वतंत्रता आंदोलन का एक हीरो किस तरह अचानक गायब हो गया.''

वर्ष 1941 में सुभाष चंद्र बोस कोलकाता में अंग्रेजों को चकमा देकर अपने घर से भाग निकले थे. उस समय वो नज़रबंद थे.

संदेह और संशय

अफ़गानिस्तान के रास्ते बोस जर्मनी पहुंचे और एडोल्फ हिटलर से मुलाकात कर सैन्य मदद मांगी ताकि ब्रिटिश शासन से भारत को मुक्त कराया जा सके.

जर्मनी से सुभाष चंद्र बोस जापान गए और जापान की मदद से उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) का गठन किया.

आईएनए में जापान में बंद भारतीय मूल के युद्धबंदियों के साथ ही मलय प्रायद्वीप और बर्मा में निर्वासित भारतीयों को शामिल किया.

अंततः आईएनए बर्मा की ओर से भारत की तरफ बढ़ने लगी. यहां तक कि इसने पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों पर कब्जा भी कर लिया था. लेकिन आईएनए को ब्रितानी सेना के सामने 18 अगस्त 1945 में हथियार डालने पड़े. बोस को अंतिम रूप से ताइहोकु हवाइअड्डे पर देखा गया.

तब से यह रहस्य ही है कि आखिर बोस के साथ क्या घटित हुआ.

क्या वो वाकई प्लेन क्रैश में मारे गए या जैसा कि कुछ लोगों का मानना है, वो एक हिंदू भिक्षु के वेश में भारत लौट आए.

कुछ लोगों का यह भी दावा है कि बोस को साइबेरिया में एक जेल में बंद रखा गया है.

जांच आयोगों में मतभेद

आज़ादी मिलने के बाद इस मामले की जाँच के लिए कई जांच आयोगों का गठन हुआ.

दो जांच आयोगों (शाह नवाज़ कमेटी और खोसला आयोग) ने निष्कर्ष दिया कि वर्ष 1945 में ताइहोकु में बोस की एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी.

हालांकि पूर्व न्यायमूर्ति मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में गठित तीसरे और अंतिम जांच आयोग ने पाया कि 18 अगस्त 1945 को ताइहोकु में कोई भी हवाई दुर्घटना नहीं हुई थी. इसलिए बोस ऐसी किसी दुर्घटना में नहीं मरे. भारत सरकार ने इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया.

मुखर्जी आयोग ने ताइहोकु, जापान, रूस और इंग्लैंड की यात्राएं कीं और बोस से संबंधित दस्तावेज इकट्ठा किया.

किसे बचा रही सरकार

सुखेंदु शेखर रॉय ने आरोप लगाया कि यह बहुत संभव है कि यदि गोपनीय दस्तावेज सामने आ जाएँ तो कुछ देशों के साथ हमारे संबंध तनावपूर्ण हो जाएंगे क्योंकि वे भी इस साजिश में शामिल थे.

रॉय यह भी कहते हैं, "मुझे संदेह है कि उस समय के कुछ नेता भी इसमें शामिल थे और सरकार उन नेताओं बचाने की कोशिश कर रही है, जिनकी अभी भी भारत में भारी इज्जत है. यदि सच्चाई सामने आती है तो उस राजनीतिक परिवार और उससे जुड़ी पार्टी को भारी नुकसान होगा."

रॉय का कहना है कि अगर यह प्लेन क्रैश होता तो क्या सरकार इन गोपनीय फाइलों पर बैठी रहती?

बोस के परिजनों और उनके प्रशंसकों की भी इस बारे में सूचना हासिल करने की सभी कोशिशें अब तक नाकाम रही है.

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