मध्य प्रदेश: पांच सीटें जिन पर है हर नज़र

मध्‍यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए राज्य में मतदान शुरू हो गया है. इस चुनाव में कई दिग्‍गजों की प्रतिष्‍ठा दांव पर है. वोटिंग के साथ ही इन सभी की क़िस्‍मत ईवीएम मशीनों में क़ैद हो जाएगी.

रीवां में मौजूद बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद ने बताया कि फ़िलहाल वोट डालने आ रही महिलाओं की तादाद कम है. यहां से भाजपा के दो बार मंत्री रहे राजेंद्र शुक्ल चुनाव लड़ रहे हैं. इस सीट पर बीएसपी के उम्मीदवार ने मुक़ाबले को दिलचस्प बना दिया है.

आठ दिसंबर को मतगणना के बाद पता चलेगा किनके भाग्‍य जागे और किनकी क़िस्‍मत फूटी. मध्यप्रदेश में विधानसभा की पांच ऐसी सीटें हैं, जिन पर चुनाव पंडितों की नज़र है.

पांच राज्यों में चुनाव: आंकड़ों का आईना

विदिशा- शिवराज सिंह चौहान

पहली सीट है विदिशा. मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के एकाएक इस सीट से लड़ने के फ़ैसले ने रातों-रात यहां की रंगत बदल दी. चौहान राज्‍य में ऐसे अकेले उम्‍मीदवार हैं, जो एक साथ दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं. विदिशा के अलावा बुदनी उनकी घरेलू सीट है.

विदिशा शिवराज को मजबूरी में जाना पड़ा. यदि वे विदिशा से नहीं लड़ते, तो हो सकता था कि यह सीट भाजपा के हाथ से निकल जाती.

इसकी वजह दावेदारों की मारामारी और पुरुष सहकर्मी के यौन उत्‍पीड़न के आरोपों के बाद पार्टी से निष्‍कासित पूर्व मंत्री राघवजी द्वारा अपनी बेटी को टिकट दिलाने के लिए दी जा रही ध‍मकियां हैं.

शिवराज सिंह: यह चुप्पा चौहान नहीं चूकता

पिछले दो चुनावों से राघवजी यहां से विधायक चुने जाते रहे हैं. इस बार वे चाहते थे कि पार्टी उनकी बेटी को उम्‍मीदवारी दे. ऐसा न होने पर उन्‍होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की धमकी दी थी. विदिशा, भाजपा मानसिकता की सीट मानी जाती है.

वर्तमान में लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्‍वराज यहां की सांसद हैं. सुषमा के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी यहां से चुनाव जीत चुके हैं.

सुषमा नहीं चाहती थीं कि टिकटों की मारकाट में उनकी लोकसभा सीट की मुख्‍य विधानसभा सीट कांग्रेस की झोली में जा गिरे, इसलिए उन्‍होंने ख़ुद शिवराज से आग्रह किया कि वे विदिशा से चुनाव लड़ें. शिवराज के लिए विदिशा नया नहीं है. वे चार बार यहां से सांसद रह चुके हैं, इ‍सलिए गांव-गांव तक उनकी मज़बूत पकड़ है.

कांग्रेस ने यहां से स्‍थानीय नेता शशांक भार्गव को उम्‍मीदवार बनाया है. पूरे राज्‍य में सघन प्रचार में व्‍यस्‍त शिवराज सिंह चौहान सिर्फ पर्चा दाख़िल करने आए थे. तभी उन्‍होंने सभा में कह दिया था कि वे अब प्रचार करने यहां नहीं आएंगे, जनता ख़ुद उनका चुनाव लड़े.

ऐसा ही वे बुदनी में भी कर रहे हैं. शनिवार शाम को प्रचार का तय समय ख़त्‍म होने के बाद शिवराज रात में विदिशा पहुंचे. प्रचार की कमान उनकी पत्‍नी साधना सिंह ने संभाल रखी थी. बुदनी में उनके बेटे चुनाव प्रचार कर रहे हैं.

भोजपुर- सुरेश पचौरी

बुदनी से लगी हुई है भोजपुर विधानसभा सीट, जहां कांग्रेस के बड़े नेता और केंद्र में विभिन्‍न विभागों के मंत्री र‍हे सुरेश पचौरी चुनाव लड़ रहे हैं. पचौरी पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. इससे पहले एक बार उन्‍होंने भोपाल से लोकसभा का चुनाव लड़ा था जिसमें उन्‍हें हार का सामना करना पडा था.

चुनावी जीत क्‍या होती है, इसका अनुभव पचौरी को अब तक नहीं हुआ है. वे पांच बार राज्‍यसभा के सदस्‍य रह चुके हैं. पचौरी के चुनाव लड़ने का फ़ैसला चौंकाने वाला था. वे पार्टी में हाई-लेवल के नेता हैं इसलिए उनके नाम पर न तो चुनाव समिति में कोई चर्चा हुई और न स्‍क्रीनिंग कमेटी में. उनका नाम सीधे सीईसी में आया और बिना किसी बहस के तय हो गया.

पचौरी का मुक़ाबला राज्‍य भाजपा के दिग्‍गज सुंदरलाल पटवा के भतीजे सुरेन्‍द्र पटवा से हो रहा है. सुरेन्‍द्र वर्तमान में यहां से विधायक हैं. भोजपुर सीट से सुंदरलाल पटवा तीन बार विधायक रह चुके हैं. उनके भतीजे सुरेंद्र का भी यह तीसरा चुनाव है.

पचौरी के बारे में क्षेत्र में यह प्रचार है कि यदि वे चुनाव जीते तो सीधे मुख्‍यमंत्री बनेंगे. उन्‍हें स्‍थानीय होने का फ़ायदा मिल रहा है. जबकि यहां से तीसरा चुनाव लड़ रहे सुरेंद्र को बाहरी बताया जा रहा है. फिलहाल यहां कांटे का मुक़ाबला है.

चुरहट- अजय सिंह

राज्‍य विधानसभा में विपक्ष के नेता और राजनीति के चाणक्‍य माने जाने वाले दिवंगत अर्जुनसिंह के पुत्र अजय सिंह अपनी पुश्‍तैनी सीट चुरहट से चुनाव लड़ रहे हैं. जब तक अर्जुनसिंह राज्‍य की राजनीति में सक्रिय रहे, तब तक वे ख़ुद इस सीट से चुनाव लड़ते रहे.

उनके केंद्र में सक्रिय होने के बाद से उनके पुत्र अजय सिंह ने पिता की विरासत को संभाला. वे पिछली चार बार से यहां से विधायक चुने जाते रहे हैं. भाजपा ने यहां से शरदेंदु तिवारी को टिकट दिया हैं. शरदेंदु के दादा चंद्रप्रताप सिंह भी चुरहट से विधायक रहे चुके हैं.

दोनों परिवारों की पुश्‍तैनी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता है. अर्जुन सिंह को विधानसभा चुनाव हराने का श्रेय शरदेंदु तिवारी के दादा चंद्रप्रताप तिवारी को ही जाता है. पिछले विधानसभा चुनाव में तिवारी ने गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्‍मीदवार के रूप में चुरहट से चुनाव लड़ा था.

उनके उसी प्रदर्शन को देखते हुए इस बार भाजपा ने उन्‍हें उम्‍मीदवारी दी है. वैसे यहां दिलचस्‍प मुक़ाबला हो रहा है.

महू- कैलाश विजयवर्गीय

शिवराज मंत्रिमंडल के सबसे चर्चित मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इंदौर ज़िले की महू विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में हैं. वे साल 2008 में भी इस सीट से चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन इस बार उन्‍हें कांग्रेस के अंतरसिंह दरबार कड़ी टक्‍कर देते नज़र आ रहे हैं.

विजयवर्गीय वर्ष 1990 से लगातार विधायक हैं. लंबे समय तक वे इंदौर शहर की सीट से लड़ते थे, लेकिन पिछली बार उन्‍होंने महू को चुनौती के तौर पर लेते हुए चुनाव लड़ने की पेशक़श की जो अब उनके गले पड़ गई है.

इस बार वे महू से पिंड छुड़ाना चाहते थे, लेकिन भाजपा में उनके विरोधियों ने ऐसा नहीं होने दिया. कैलाश विजयवर्गीय को भजन गाने का शौक़ है और सरकारी कार्यक्रम हो या चुनावी सभा, वे लोगों की फ़रमाइश पर भजन ज़रूर सुनाते हैं.

कांग्रेस उम्‍मीदवार दरबार पूर्व में यहां से विधायक रह चुके हैं. चुनाव आयोग की विशेष नज़रें इस सीट पर लगी हुई हैं क्‍योंकि सबसे ज्‍यादा पैसा इसी विधानसभा सीट पर ख़र्च हो रहा है और लड़ाई-झगड़े की ख़बरें भी यहीं से ज्‍़यादा आ रही हैं. पिछले दो दिनों में दो बार विजयवर्गीय के पुत्र के वाहन पर हमले हो चुके हैं.

शिवपुरी- यशोधरा राजे सिंधिया

सिंधिया राजघराने से इस बार विधानसभा चुनाव में यशोधरा राजे सिंधिया उतरी हैं. यशोधरा की प्रोफ़ाइल हाई है. उनकी बड़ी बहन वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्‍थान में बतौर भावी मुख्‍यमंत्री चुनाव मैदान में हैं, तो भतीजे ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया मध्‍यप्रदेश में कांग्रेस की ओर से मुख्‍यमंत्री की दौड़ में हैं.

ग्‍वालियर की सांसद यशोधरा शिवपुरी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रही हैं, जो उनके भतीजे और कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्‍यक्ष ज्‍योतिरादित्‍य के लोकसभा क्षेत्र का हिस्‍सा है. यशोधरा पहले भी इस सीट से विधायक चुनी जा चुकी हैं.

उन्‍होंने केंद्र की राजनीति में सक्रिय होने के इरादे से पिछले लोकसभा चुनाव में ग्‍वालियर से टिकट मांगा था, लेकिन दिल्‍ली की राजनीति उन्‍हें रास नहीं आई, लिहाज़ा वे दोबारा राज्‍य की राजनीति में लौट रही हैं. वे उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सरकार में मंत्री भी रह चुकी हैं.

शिवपुरी में उनका मुक़ाबला कांग्रेस के वीरेंद्र रघुवंशी से हो रहा है, जो राजघराने के प्रतिनिधि को कड़ी टक्‍कर दे रहे हैं. इस चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ है जब महल ने महल के ख़िलाफ़ प्रचार किया हो. आमतौर पर सिंधिया राजघराना ऐसी स्थिति को टालता आया है, लेकिन इस बार शायद टालना मुश्किल होगा.

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